जिन्दगी में भले ही हमें
आलसी लोग काफी दिखें,
पर कई इस तरह के हैं कर्मठ
अंत तक काम करते दिखे।
एक काकी है दुर्बल मगर
ऊंचे-नीचे पहाड़ी शहर में,
सिर से ढोती है भारी सिलिंडर
हांफती जा रही है वो दिनभर।
वृद्ध दादा जी फुटपाथ पर
उस कड़ी धूप में बैठकर
फर्ज अपना निभाते दिखे
जूते-चप्पल की मरमत में खप कर।
वो मुआ तो है चौदह का बस
जब से होटल में बर्तन घिसे हैं,
माँ बहन आदि परिवार के
तब से सचमुच में गेहूँ पिसे हैं।
एक है हाथ उस आदमी का
बस उसी से हथौड़ा उठा कर
पत्थर की रोड़ी बनाता
परिवार को पालता है।
कर्मठ
Comments
5 responses to “कर्मठ”
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सही कहा आपने
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गरीबी के अथाह सागर से पार करनेवाली नौका केवल परिश्रम ही है..पर गरीबी के हालात के आसूं एक कवि हृदय ही समझ सकता है..आपने कविता में उस वेदना को शव्दों मे वयाँ किया.. भावपूर्ण कविता…
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कर्मठता ही जीवन है ,इस सच्चाई को प्रस्तुत करती हुई कवि सतीश जी की बेहद शानदार रचना ।गरीब हो या अमीर परिश्रम के बिन सब बेकार है , परिश्रम ही सुखी जीवन का सार है । कविता में कवि ने जरूर एक गरीब परिवार का उदाहरण दिया है लेकिन परिश्रम तो मध्यम वर्ग और अमीर वर्ग सभी करते हैं । बहुत ही शानदार कविता बेहतर शिल्प और खूबसूरत प्रस्तुति
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अतिसुंदर
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लाजवाब सर👌✍✍✍
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