विग्यान

मत करो महाभारत सब नाश हो जाता है
राम चरित मानस मन क्यूँ नहीं दुहराता है
लालच व भय के वशीभूत मत तुम हो
विग्यान है वरदान अभिशाप क्यूँ बनाता है

Comments

3 responses to “विग्यान”

  1. उत्कृष्ट रचना 

  2. बहुत सुंदर पंक्तियां

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