नील पदम्, Author at Saavan's Posts

*प्रकृति वर्णन*

*प्रकृति वर्णन* सुबह उठें हम सूरज की मखमली रोशनी को पायें, चिड़ियों का संगीत सुने और फूल कोई कविता गायें ।। भंवरों का संगीत मनोहर हरियाली स्वर्ग सी है, नदियों का मुड़ मुड़कर चलना जैसे कोई नर्तकी है ।। शाम ढ़ले तो चाँद चले तारों की बारात लिये, बूंदें पुलकित करती हैं जब हों बादल बरसात लिये ।। धरती, अम्बर, दरिया, जंगल क्या कुछ हमको देते हैं, प्रकृति की रक्षा करनी है ये शपथ आज हम लेते हैं ।। Copyright @ n... »

हाँ, मेरी माँ हो तुम

थकती हैं संवेदनाएँ जब तुम्हारा सहारा लेता हूँ, निराशा भरे पथ पर भी तुमसे ढाढ़स ले लेता हूँ, अवसाद का जब कभी उफनता है सागर मन में मैं आगे बढ़कर तत्पर तेरा आलिंगन करता हूँ, सिकुड़ता हूँ शीत में जब कभी एकाकीपन की खींच लेता हूँ चादर सा तुम्हें गुनगुना मन कर लेता हूँ । ॰ ॰ जब कभी भी घबराता हूँ अन्जान अक्षरों की भीड़ में, ओ माँ, मेरी मातृभाषा, तेरी गोद में जा धमकता हूँ ।। @*नील पदम्* १४•०९•२०१९ »

यूं ही चलते चलते

निगाहों के पैमाने से शख्शियत भांप लेते है, राह चलते ही बुलंदियों के कद मांप लेते हैं।। जलने वालों का कुछ हो नहीं सकता, वो तो मेरी बेफिक्री से भी जल बैठे ॥ सरहदें बदलती हैं दिनरात अपनी, चलो समझौता, सुलह, करार करें ॥ मेरे वश में नहीं है, तुम्हारी सजा मुकर्रर करना । तुम ही कर लो जिरह औ फैसला मुकम्मल कर लो ॥ वह चलते पानी से बह जाते हैं, थोड़ा गर उनको आजमाते हैं ॥ अपने वजूद से यूँ कतराते हैं, आइना देख ... »

यूं ही चलते चलते

निगाहों के पैमाने से शख्शियत भांप लेते है, राह चलते ही बुलंदियों के कद मांप लेते हैं।। जलने वालों का कुछ हो नहीं सकता, वो तो मेरी बेफिक्री से भी जल बैठे ॥ सरहदें बदलती हैं दिनरात अपनी, चलो समझौता, सुलह, करार करें ॥ मेरे वश में नहीं है, तुम्हारी सजा मुकर्रर करना । तुम ही कर लो जिरह औ फैसला मुकम्मल कर लो ॥ वह चलते पानी से बह जाते हैं, थोड़ा गर उनको आजमाते हैं ॥अपने वजूद से यूँ कतराते हैं, आइना देख क... »

चलते चलते

जलने वालों का कुछ हो नहीं सकता, वो तो मेरी बेफिक्री से भी जल बैठे ॥ @नील पदम् »

तुम धूप बुला लो

आँसुओं से भीगे हुए, तकिये को हटा लो, तुम आस के रूठे हुए, पंछी को बुला लो, अन्मनी रातों के चांद बुझा दोगे तुम, ये रात ढ़ल जायेगी गर, तुम धूप बुला लो ।। copyright@ नील पदम् »

प्यासा समंदर और मैं

मैं प्यासा था, समंदर में, दो अंजुली प्यास, खो आया । बड़ा आरोप लगा मुझ पर, मैं अपना आप खो आया ।। समंदर नें, उदासी को, मेरी आंखों में जब देखा । उदासी घुल गई उसमें, मैं पल्लव सा, निखर आया ।। समंदर को, शिकायत हो, तो हो जाये, ये जायज है । मगर उनको शिकायत है, मैं जिनको भूल ना पाया ।। समंदर तो, अभी भी है, किसी की प्यास, का प्यासा । मैं सचमुच में ही, घुल जाता, रहते वक़्त, निकल आया ।। समंदर की, कहानी भी, बड़ी... »

दौर

जाने कैसे दौर से गुजर रहा हूँ मैं, वक़्त के हर मोड़ पे लड़खड़ाता हूँ, वो बन्दा ही जख्म-ए-संगीन देता है, जिसको पूरे दिल से मैं अपनाता हूँ ।। *नील पदम् * »

तब

तबकी बात और है, ना करो तबकी बातें, थे तब भी लेकिन, जख्म हँसते ना थे। होंगे सांप तब भी, यकीनन आस्तीनों में, रहते थे खामोश, तब ये डसते ना थे ।। Copyright@ नील पदम् »

छब्बीस ग्यारह (मुम्बई) 26/11

सागर के सीने से निकले थे, काल सरीखे नाग। मुम्बई में बरसाने आये थे, जो जहरीली आग ।। रण रिपु छेड़ रहा था लेकिन, हम थे इससे अन्जान। छब्बिस ग्यारह दिवस ले गया, कई निर्दोषों की जान ।। तांडव करती मौत फिरी थी, शहर में लेने जान। बरस रहे थे गली गली में, बुझे सन्खिया बाण ।। कपट भरे दुश्मन के छल को, जब तक समझा हमने। कितने हुए अनाथ, विधवाएं, खोये भाई और बहनें ।। दुश्मन की इस धृष्टता का, बदला हमको लेना था । हर ... »

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