दौर

जाने कैसे दौर से गुजर रहा हूँ मैं, वक़्त के हर मोड़ पे लड़खड़ाता हूँ, वो बन्दा ही जख्म-ए-संगीन देता है, जिसको पूरे दिल से…

तब

तबकी बात और है, ना करो तबकी बातें, थे तब भी लेकिन, जख्म हँसते ना थे। होंगे सांप तब भी, यकीनन आस्तीनों में, रहते थे…

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