मनोरम रात है बिखरी हुई है चांदनी तुम्हारी मुस्कुराहट सी दिखाई दे रही है चांदनी। जिस तरह चाँद खिलता है कभी कुछ दिन महीने में, उसी की भांति तुम भी हो जो हंसते हो महीने […]

दिन गुजर जाते हैं हम वहीं रह जाते हैं नये दिनों की तरह कहां नये हो पाते है पुराने जख्म मिले कहीं क्यों न भुला पाते हैं आये नये जो पल हाथ बीती बातों को […]

सो जा मजे से चैन से तू सोमरस पीकर न कर चिंता हमारी हम भले, भूखे ही मर जाएं, तेरे नशे ने ही हमें सड़कों में ला पटका, तुझे अब भी नहीं है लाज जाएं […]

जब मेरा अंत समय है नज़दीक हो, तब आँखों में छवि मेरे बच्चों की हो, और मेरे हाथों में हाथ तेरा हो… आयी थी जिस क़दर वद्दू बनकर इस घर में, उसी जोड़े में विदा […]

पड़ चुकी है साँझ घर घर में चमकते बल्ब ऐसे लग रहे हैं, जैसे तारों ने किया धरती में डेरा। और चंदा आसमां में आ चुका है, फुल चमक में, चाँद-तारे और बल्बों का मिलन […]

पापा की प्यारी हूँ मैं फूलों की क्यारी हूँ मैं पर सबसे पहले नारी हूँ मैं… अहिल्या हूँ मैं सीता हूँ मैं पवित्र पावन गीता हूँ मैं कभी शेरनी तो कभी चीता हूँ मैं पर […]

अचरज भरा आकाश है कहीं धूप है कहीं छांव है आसमान की चादर में सितारों के बूटे हैं बादलों के घोड़े हैं जो दौड़ते हैं इधर-उधर जुगनू भी अपनी प्रेयसी को ढूंढते हैं रात भर […]

कविता- सयानी ———————– तेरी एक ज़िद से, सभी रो रहे हैं| पापा मम्मी चिंता करके, ओ भी रो रहे हैं| इण्टर के बाद दीदी, घर से ही बाहर हो SSC मे जाॅब बा, देके गई […]

दूर – दूर से कवि पधारे, कोई पर्वतीय, कोई मैदानों से । यहां पे आकर , धूम मचा कर, लिखें बड़े अरमानों से । मैं भी आई, नाम है गीता , लिख दी मैनें, भी […]

अचरज भरा आकाश है कहीं धूप है कहीं छांव है आसमान की चादर में सितारों के बूटे हैं बादलों के घोड़े हैं जो दौड़ते हैं इधर-उधर जुगनू भी अपनी प्रेयसी को ढूंढते हैं रात भर […]

नीले आसमान पर सूरज की उपस्थिति सौंदर्य की पराकाष्ठा किरणों की लालिमा से चमक रहा है पृथ्वी का हर कण हर क्षण…. पत्तियों की सरसराहट से मधुमास का सुंदर आगमन चमन की सुगंध से महक […]

विविध काव्यों से सजा है न्यारा कविवर ने है जिसे संवारा समालोचना की मुखरता से मिलकर सबने जिसे निखारा छन्द- अलंकार की बहती धारा हाँ, वह है “सावन” मंच हमारा। बनी एक पहचान हमारी खुद […]

कोई ख्वाहिश कहाँ कोई पछतावा भी नहीं पतझङ-सी है वीरानी बसंत आया ही नहीं दूर तक फैला है सूनापन जैसे शून्य निकल आया हो हाँ, कुछ इस तरह तेरा ख़याल आया हो । काली निशा […]

कुछ वक्त की ज़िन्दगी है, फ़िर तो हमको है जाना कुछ समझौते भी हुए यहां, कुछ उपहार मिले माना खाली हाथ ही तो आए थे, खाली हाथ ही है जाना ये तो निर्भर, करता है […]

चाँद देखो, चाँद की शीतल छटा का लाभ लो। दाग-धब्बे खोजने की मंद आदत त्याग दो। इंसान में कमियां भी होंगी और अच्छाई भी होगी बस कमी ही खोजने की मंद आदत त्याग दो। हो […]

दिल वालों की दिल्ली देखो , हो गई है बीमार कहीं किसी का साथी छूटा, कहीं किसी का प्पार दिल्ली का तो अब ये नसीब हो गया हो गया वहीं दूर, जो करीब हो गया […]

कड़ी बेरोजगारी से दुखी है हर युवा देखो धरी ही रह गई तैयारियां परीक्षा रुक गयीं देखो। निराशा के भंवर में पड़ न जाए देश का यौवन समय रहते करो मिलकर संवारो देश का यौवन।

तुम्हारे हाथ में अपनत्व की जो कुछ लकीरें हैं उन्हीं में एक मैं भी हूँ जरा सा गौर से देखो। आईना सामने रख खुद की नजरों में जरा देखो, मिलूंगा नीलिमा में तुम जरा सा […]

वे सो रहे हैं व्यवस्था को, जेब में लेकर, हम रो रहे हैं , हाथ में मोमबत्तियां लेकर! वे जागते हैं अक़्सर चुनाव में, और हम हादसों में ….

निरुत्तर हो गए हम आपकी बात सुनकर निकल पाया न मुंह से एक भी शब्द छनकर। कह दिया आपने सब कह नहीं पाए थे जो हम, आपकी बात सुनकर सोचते रह गए हम। कभी उस […]

वो कहते हैं बलात्कार की घटना हमने सबसे पहले दिखलाई है पीड़िता के घर तक सबसे पहले हमारी पत्रकार पहुंच पाई है हमने दिखलाया सबसे पहले पीड़िता के भाई को पीड़िता की आवाज सबसे पहले […]

मैं जब-जब अकेला होता हूं, दर्द के संताप को, बाहों में लेकर रोता हूं। खो जाता हूं ,उन यादों में, उलझे हुए उन ख्वाबों में, वक्त की जबरई को, गले लगाकर; खोता हूं, जब-जब अकेला […]

स्वपन में मैं रसोई में खड़ी थी, रसोई में रखे, कैंची, चाकू और बेलन में, ज़बरदस्त जंग छिड़ी थी कि यदि चाहे, तो कौन दे सकता है, ज्यादा घाव मुझे भी हुआ सुनने का चाव.. […]

वित्त – विभूति कहीं जले तो, जल ही उस बुझाए कहीं दिल जले तो क्या किया जाए.. अम्बर से पानी बरसे, तो , छतरी को लिया जाए नयनों से पानी बरसे, तो क्या किया जाए […]

दो पंक्तियों से मेरी ऐसी मिठास फैले, मिट जायें नफ़रतें सब दूर हों झमेले। कविता तो प्रेम को है बस प्रेम ही हो मकसद लिखूं प्रेम लिख दूँ निकलें न पद विषैले। क्या पा सकूँगा […]

छोटी सी मासूम कली थी, अपने घर में, मां की गोद में बड़े लाडों से पली थी मुस्कान के आगे जिसकी, पूरा घर था खिल गया उसको शर्म सार करके, किसी को क्या मिल गया […]

बेटियों के साथ क्यूँ होता यह बार बार मानसिक विचलन है ये कहते जिसे बलात्कार यह सामान्य नहीं क्रूरतापूर्ण व्यवहार है मानसिक विकृति की ओर बढतो की पहचान है