Tag: संपादक की पसंद

संपादक की पसंद

  • आओ सब मिलकर नव वर्ष मनाएं…

    सुखद हो जीवन हम सबका

    क्लेश पीड़ा दूर हो जाए

    स्वप्न हों साकार सभी के

    हर्ष से भरपूर हो जाएं

    मिलन के सुरों से बजे बांसुरी

    ये धरती हरी भरी हो जाए

    हों प्रेम से रंजीत सभी

    ऐसा कुछ करके दिखलायें

    आओ सब मिलकर नव वर्ष मनाएं ||

    हम उठें व उठावें जगत को

    सृजन का सुर ताल हो

    हम सजग हों

    सुखद हो जीवन हमारा

    उच्च उन्नत भाल हों

    अब न कोई अलगाव हो

    बस जोड़ने की बात हो

    बढ़ न पावे असत हिंसा

    शान्त सुरभित प्राण हों

    सतत प्रयास और लगन से ही

    हम अपना हर कदम बढ़ाएं

    आओ सब मिलकर नव वर्ष मनाएं ||

    मित्र सखा सत्कार करें सब

    जगत तुम्हारा यश गाए

    गुलशन सा महके सबका आंगन

    हर घर मंदिर सा पावन हो जाए

    बह उठे प्रेम की मन्दाकिनि

    मन में मिसरी सी घुलती जाए

    सबके आँगन हों सुखद सगुन

    कोकिल पंचम स्वर में गाए

    भूखा प्यासा रहे न कोई

    घर घर समता दीप जलाएं

    आओ सब मिलकर नव वर्ष मनाएं ||

  • नूतन-वर्ष मनाना है

    सागर की लहरों में जैसे खो जाएगा,
    2020 भी अलविदा हो जाएगा
    फ़िर नूतन-वर्ष मनाएंगे
    (2021) नूतन-वर्ष मनाने से पहले
    (2020) बीते वर्ष पर ग़ौर फरमाना है
    फ़िर नूतन-वर्ष मनाना है
    पिछला वर्ष कोरोना लाया था,
    लॉकडाउन लगवाया था
    तीन महीने की खातिर,
    घर में सब को बंद करवाया था
    लेकिन फिर भी कुछ महा-योद्धा,
    पुलिस, चिकित्सक और रिपोर्टर
    घर नहीं बैठे थे अपने,
    पूरे करने को कुछ सपने
    उन लोगों ने किए बहुत काम,
    उन सब को मेरा प्रणाम
    आज उन्हीं के सम्मान में,
    गीत नया एक गाना है
    फ़िर नूतन वर्ष मनाना है
    बीते वर्ष ने सागर सा सबक सिखाया है
    वह सबक अगली पीढ़ी तक ले जाना है
    फ़िर नूतन वर्ष मनाना है
    टीका इसका जब आएगा तब आएगा
    लेकिन उससे पहले हमको,
    कोई ढील नहीं दिखाना है
    दो गज़ की दूरी ज़रूरी
    और नक़ाब भी लगाना है
    फ़िर नूतन वर्ष मनाना है
    वर्ष के अंतिम दिन की चकाचौंध में,
    भूल ना जाना सागर जैसी
    उस विशाल बीमारी को
    जिस कोरोना के कारण,
    सारा संसार संकट में आया
    शांत लहर सा सब्र बना के
    इस कोरोना को भगाना है
    फ़िर नूतन वर्ष मनाना है
    ____✍️गीता

    नक़ाब——-मास्क

  • नव वर्ष से पहले

    ज़रा सा मुस्कुरा देना
    नव वर्ष से पहले
    हर पीर भुला देना
    नव वर्ष से पहले
    ज़रा सा प्यार दे देना
    नव वर्ष से पहले
    टूटे तार जोड़ लेना
    नव वर्ष से पहले
    ना सोचो किस-किस ने दिल दुखाया था
    नव वर्ष से पहले
    ना सोचो किस-किस का दिल दुखाया था
    नव वर्ष से पहले
    सभी को माफ कर देना
    नव वर्ष से पहले
    नव वर्ष की शुभकामनाएं
    नव वर्ष से पहले
    ______✍️गीता

  • बिना तुम्हारे

    बिना तुम्हारे
    इस ठंडक में
    बिस्तर से उठने का
    मन नहीं है,
    आ जाओ ना,
    चली आओ, उनके हाथ
    उनके साथ,
    ताजगी बनकर
    नाराजगी तजकर,
    अन्यथा उठने में
    हैं असहाय,
    आ जाओ ना चाय।

  • कविता-शिक्षा प्रेमी

    कविता -शिक्षा प्रेमी
    ———————–
    हे शिक्षा प्रेमी
    क्या बात कही तुमने
    सच्चाई संग प्रहार किया
    उतर गए कई नकाब,
    बेच रहे शिक्षा को,
    शहरों में खोलकर दुकान,
    फीस पर फीस,
    निकली जनता की खीस,
    बस्ते के बोझ तले दबता बच्चा,
    अच्छे नंबर के चक्कर में,
    बच्चा कोचिंग करता-
    कोचिंग के फीस से
    मां-बाप की निकली खीस,
    आलू मटर टमाटर बेचे
    बेची घर की खेती भी,
    फीस न पूरा होती तो यारों
    बीबी बेचे मंगलसूत
    नोटिस भेजे बैंक भी
    कर्ज लिए हो हमसे भी,
    वक्त खत्म पैसा दे दो
    वरना खेती गिरवी रख दो
    ——————————-
    **✍ऋषि कुमार ‘प्रभाकर’—

  • शुभ हो, मुबारक हो नया साल आपको

    ऐलान नया हो कोई, उद्घोष नया हो
    जज्बे भी नये हों और जोश नया हो
    हों राग नये से सभी , तान हो नई
    हौसले बुलंद हों, उड़ान हो नई

    मिल जाए नयेपन की एक मिसाल आपको
    शुभ हो, मुबारक हो नया साल आपको

    धरती से मिले धैर्य और अंबर से ऊंचाई
    पश्चिम से पूर्व तक दे खुशियां ही दिखाई
    उपहार हर जगह से सदा खास ही मिले
    उत्तर से भी दक्षिण से भी उल्लास ही मिले

    चारों दिशा से कर जाए निहाल आपको
    शुभ हो, मुबारक हो नया साल आपको

    व्यवहारकुशल हों सदा, गुण के धनी रहें
    चेहरे की मुस्कान ये सदा बनी रहे
    हर रोज और बड़ा हो ये नाम आपका
    दुनिया के दिल पे राज करे काम आपका

    किसी चीज का भी न रहे मलाल आपको
    शुभ हो, मुबारक हो नया साल आपको

    विक्रम कुमार
    मनोरा, वैशाली

  • समझना है तुम्हें

    गरीब को भी
    इंसान समझना है तुम्हें
    क्या पता कब कहाँ
    मिल जायें भगवान तुम्हें।
    भूख क्या होती है यह भी
    समझना है तुम्हें,
    इंसान हो इंसानियत को भी
    समझना है तुम्हें।
    मिली है बुद्धि
    अच्छा और बुरा सोचने की,
    जानवर हो नहीं, मानव हो
    समझना है तुम्हें।
    न मसलो बेजुबानों को
    न छीनो जिन्दगी का हक
    दानव नहीं, मानव हो
    समझना है तुम्हें।

  • ऐसा श्रृंगार धरो

    नुपुर तुम्हारी शोभा नहीं
    ज्ञान को अंगीकार करो
    शक्ति रूप तुम धर कर के
    पाश्विक प्रवृत्ति का संघार करो।
    सिर्फ सदन तक तेरी शोभा नहीं
    विशाल गगन तुम्हारा आँगन है
    अपने आकांक्षाओं को पंख लगा
    कर्मठ बन, खुद का निर्माण करो।
    सृजन की बीज की धात्री हो तुम
    तपस्विनी हो, नहीं सिर्फ मातृ तुम
    खुद की निर्मात्री भी बनने को
    हर रूढ़िवादिता का तिरस्कार करो।
    अवनी सी धीर, तू धरते आई
    व्योम से भी रिश्ता जोङ आई
    हर क्षेत्र में तेरी पहुँच बन जाए
    तू खुद का विद्या से ऐसा श्रृंगार करो।

  • एक बार यमराज आया धरती पर

    एक बार यमराज आया धरती पर।
    सोच में पड़ गया मानव को देखकर।।
    क्या खुशनसीब हैं ये इन्सां।
    मरणशील को कारें कारें
    मैं अमर यमराज को केवल भैंसा।।
    देखा सोचा झल्लाना बैठ गया सिर ठोंककर।
    एक बार यमराज आया धरती पर।।
    कुछ क्षण बीता नजरें दौड़ा।
    दिखा नहीं कुछ आवाजें आई।।
    नारेबाजी कर ले हाथ में झंडा।
    दौड़ रहे हैं साथ साथ मुस्टंडा।।
    पूछन लागे यमराज महाशय
    हाथ जोड़ विनती कर।। एक बार
    भाई साहब बतलाओ
    क्या कर रहे आप लोग।
    भजन -कीर्तन,कथा- वार्ता
    जप- तप या दान -भोग।।
    हट जा दोसिंघा नाटक से भागा अभिनेता।
    काम कर रहा हरताल का मैं हूँ कर्मठ नेता।।
    न काम करे न करने दे जाए बेकारी किधर।। एक बार
    बेकारी खतम होगी
    हरताल करो -हरताल करो।
    कोई कहीं न काम करे
    पड़ताल करो -पड़ताल करो।।
    यमराज ने कहा कामगारों को बेकार बनाकर।
    बेकारी कैसे दूर करोगे मुझे बताओ समझाकर।।
    नेताजी सोचे क्यों न दूँ
    भाषण हाथों को चमकाकर।।
    एक बार यमराज आया धरती पर
    नेताजी बोले भैया!
    मैं मजदूर यूनियन का नेता।
    मेरे पीछे भोली जनता
    जनता को मैं क्या देता।।
    जनता मेरे पीछे -पीछे
    मैं जनता के आगे।
    मुखिया सरपंच विधायक
    बन जाऊँ एम पी आगे।।
    जनता सीखेगी मुझसे
    ये संदेशा पाकर।। एक बार
    ऐ मेरे माँ -बाप-भगवान
    सुन लो मेरी वाणी।
    तुम जनता हो
    तुम डंडा हो
    पीटो-पीटो ,पीट -पीटकर
    घी निकलेगा
    यद्यपि थोड़ा पानी।।
    एक पाँव ,दो पाँव
    तीन पाँव या बिना पाँव के।
    भागेगी तेरे पीछे सब जनता
    शहर शहर या गाँव गाँव के।।
    मैं तो केवल एम पी ठहरा
    तुम ठहरोगे पी एम होकर।। एक बार यमराज आया धरती पर।।
    पी एम बनना क्या भारी है
    तुझे महासचिव बनाऊँ राष्ट्रसंघ का।
    अब क्या बोलूँ सोच रहे
    बहुत पिलाया शर्बत सबको भंग का।।
    हर कीमत पर वोट सब देना
    जब आऊँ चुनाव में खड़कर ।।
    एक बार यमराज आया धरती पर
    नशा चढ़ा यमराज को भी
    ये भी क्या जीना है।
    राज मिला यमलोक का
    पर मुर्दों में जीना है।।
    यमलोक मिल जाए खाक में
    अब धरती पर हीं रहना है।
    नेता बनूँ कामचोर पर
    इसके ठाठ का क्या कहना है।।
    ‘विनयचंद ‘ भगवान बचाए
    आफत आई सिर पर।। एक बार यमराज आया धरती पर।।

    पं. विनय शास्त्री ‘विनयचंद ‘
    बस्सी पठाना ( पंजाब)

  • अश्रु की बूंद

    आंख से बह चली,
    अश्रु की बूंद कुछ कह चली
    तुम तो क्रोध कर गए,
    मैं सब कुछ सह चली
    नयनों से बह चली
    अश्रु बूंद कुछ कह चली
    तुम तो स्नेह में भीग उठे
    मैं ओस की बूंद सी बह चली
    तुम्हारी जुदाई सह गए
    हम तो रोते ही रह गए
    आंसुओं की कीमत तुम क्या जानो,
    यह आंखों की नमी है
    ना सिर पर आसमां है,
    ना पैरों तले ज़मीं है
    कहने को नेत्रनीर हैं
    पर देते बहुत ही पीर हैं
    और कहने को क्या बचा है,
    जब से तुमसे दिल लगा है
    _____✍️गीता

  • “अब और ना हों निर्भया काण्ड”

    निडर होकर निकले हर लड़की
    काश ! ऐसा भी दिन आए,
    बेटों से डर ना लगे
    हर बेटा पूजा जाए…
    कर्म हों सबके अच्छे
    संस्कार हों भरे,
    शुद्ध हो आचरण बेटों का
    ऐसा पाठ पढ़ाया जाए..
    भारत की गलियां हों सुंदर
    हर बेटी हो बेटों से अव्वल…
    कुत्सित मन को तजकर सब
    रहें शिक्षित और रहें सलामत
    एक ऐसा कानून बने
    बेटी पर जो कोई नजर गड़ाये,
    दी जाए उसको फिर फाँसी
    जो दामन में दाग लगाये…
    बेटे हों संयमी, संस्कारी,
    चरित्रवान हो हर घर की नारी..
    प्रज्ञा’ की है बस एक ही आस,
    अब और ना हों ‘निर्भया काण्ड’…..

  • दिल व साँसों से सटे रहते हैं

    ठंड में लब फटे से रहते हैं
    आजकल वे कटे से रहते हैं,
    दूर कितना भी चले जायें पर
    दिल व साँसों से सटे रहते हैं।
    कभी करीब आते हैं फिर
    कभी दूर हटे रहे रहते हैं,
    नैन अपने भी हठीले से हैं
    हर घड़ी उन में डटे रहते हैं।

  • ❤माँ का निश्छल प्रेम❤

    ❤माँ और पत्नी❤
    *******************
    माँ से जब मांगी एक रोटी,
    माँ के चेहरे पर मुस्कान खिली…
    पत्नी से मांगी जब रोटी तो
    मन ही मन नाराज हुई….
    माँ कहती ओ बेटा !
    तू कितना ज्यादा सूख गया
    पत्नी कहती- जिम जाओ जी !
    आपका पेट है बाहर झांक रहा…
    माँ को जब मालूम पड़े
    कल बेटे की छुट्टी है,
    बेटा मेरा आराम करेगा
    रोज तो दौड़-भाग ही रहती है…
    पत्नी पकनिक की प्लानिंग
    पहले से ही बना लेती है,
    पति करे यदि आनाकानी
    तो झट से मुंह फुला लेती है….
    पत्नी की अहमियत है जीवन में,
    इससे मुझको इनकार नहीं…
    पर माँ के निश्छल प्रेम की
    बराबरी करने वाला,
    इस दुनिया में कोई यार नहीं…

  • वही दिल जुड़ाता है

    वही दिल जुड़ाता है
    करीब लाता है,
    फिर वही इस तरह से
    दूरियां बढ़ाता है।
    वो रब हमें इस तरह
    खेल ही खेल में
    कभी मिलाता है
    कभी गम बढ़ाता है।
    हम तो बस चाहते ही रहते हैं
    हाथ में हाथ रख
    साथ ही साथ रह
    नेह की चाह दिल मे रखते हैं।
    मगर वो रब का
    निराला न्याय है
    या किसी प्रेमी दिल हाय है
    चाह कर भी नहीं
    करीब रहते हैं
    बात तो करते हैं
    दिल से अजीब रहते हैं।

  • लिख दे ना

    जो हो रहा है घटित
    अपने चारों तरफ
    उसे बयान कर दे ना
    मेरी कलम! लिख दे ना।
    जी रहे घर बिना
    लिबास बिना,
    ठंड में ओढ़नी बिना सोते
    ऐसे जीवन लिए
    कुछ कर दे ना,
    उस दर्द को उठाने को
    मेरे मन! लिख दे ना।
    भूख है और खड़ी बेकारी
    उनकी आवाज को
    उठा दे ना
    वो कलम लिख दे ना।
    जो है वो कह दे ना,
    मेरी कलम! लिख दे ना।

  • एक दीप जलाओ ऐसा

    सौ दीप जला लो मंदिरों में,
    चाहे हजार दीये जले तेरे आँगन में,
    जब-तक तेरे मन की तम ना होंगे दुर ।
    तब-तक है तेरे सारे दीये की रौशन सुन ।।
    ——————————————————-
    एक दीप जलाओ ऐसा
    जिससे विकार दूर हो तेरे मन का
    एक दीप जलाओ ऐसा
    जिससे विकार दूर हो तेरे मन का
    ——————————————-
    एक दीप जलाओ ऐसा
    जिससे विकार दूर हो तेरे मन का ।।1।।
    ——————————————
    झुठी सुख के पीछे भागोगे तो दुख ही मिलेगा
    जब तक कर्म फल में तेरी आसक्ति रहेगा
    ये फल की इच्छा तुम्हें चैन से सोने न देगा
    झुठी सुख के पीछे भागोगे तो दुख ही मिलेगा
    —————————————–
    एक दीप जलाओ ऐसा
    जिससे विकार दूर हो तेरे मन का ।।2।।
    ———————————————-
    है सभी समस्याओं का निवारण दाता के नाम में
    मन का विकार हटता सिर्फ ब्रह्मचर्य-पालन से
    ब्रह्मचर्य एक परम साधना है,
    जिसके करने से सब पाप मिटता है
    ब्रह्मचर्य एक परम दीप है -2
    जिसे तुम्हें अपने उर में जलाना है ।।
    ————————————————
    एक दीप जलाओ ऐसा
    जिससे विकार दूर हो तेरे मन का ।।3।।
    कवि विकास कुमार

  • हर ख़ुशी तेरे नाम हो चुकी है

    ठंडक बढ़ रही है लगातार
    केवल तेरा अहसास
    गला रहा है
    जिंदगी में जमी बर्फ को,
    सर्द हवाएं
    नाजुक गालों से टकराकर
    अपने पैरों के निशान छोड़ रही है
    काले काले टिपके जैसे निशान,
    मेरी पूरी खुली परत
    श्याम हो चुकी है ,
    तू पहचान नहीं पायेगा लेकिन
    हर ख़ुशी तेरे नाम हो चुकी है,
    मेरे चेहरे की झुर्रियों को
    अब नजर नहीं लगेगी समय की
    झुर्री झुर्री तेरे नाम पर
    बदनाम हो चुकी है,
    ठंडक ने ओढ़ने पर मजबूर कर दिया है
    तन की कालिमा
    छिप कर गुमनाम हो चुकी है,
    ………………… डा. सतीश चन्द्र पाण्डेय , चम्पावत

  • ऐ वक़्त

    ऐ वक़्त ढूँढ लायेंगे तुम्हें ।
    खो दिया उन क्षणों को
    कयी स्वप्न सुनहले पलते थे
    खौफजदा उन पलक को
    जिनमें ख़ौफ के मंज़र तैरते थे
    विलखती आत्मा में
    आश की ज्योत जलाने को
    ऐ वक़्त ढूँढ लायेंगे तुम्हें ।
    याद कर उस पल को
    पटरियों पर जब थककर चूर थे
    थकान से मदहोश होकर
    निन्द में मशगूल थे
    निन्द से यम के दर का सफ़र
    क्या राज़ है जानने को
    ऐ वक़्त ढूँढ लायेगे तुम्हें ।
    कयी दिनों तक भूख से बिलबिलाते
    होंठ सूखे, पेट सटकर, दर्द से बिलखते
    रोटियो की आश में दर-दर भटकते
    पैदल ही लौटने को टोलियों में निकलते
    ग्राम में भी ये प्रवासी क्यूँ स्नेह को तरसते
    किस कुकृत्य की सज़ा, यह पूछने को
    ऐ वक़्त ढूँढ लायेंगे तुम्हें ।

  • फड़फड़ा रहा था

    वो लोट-पोट हो रहा था
    जमीन पर,
    जिस तरह केंचुआ
    तिनके से छूने पर
    फड़फड़ाने लगता है,
    वैसे वह बेचैनी से
    फड़फड़ा रहा था।
    किसी का तो बेटा रहा ही होगा
    अब इस तरह
    नशे का आदि होकर
    भरी सड़क में
    लेटा उलट-पुलट कर रहा था।
    चिल्ला रहा था
    सिर पीट रहा था,
    नशे से शुष्क हो चुका
    उसका दिमाग
    उसके नियंत्रण में नहीं आ रहा था।
    शायद आज या तो
    डोज कम हो गई थी,
    या नशा नहीं मिल पाया था।
    लेकिन जो भी था
    नशे ने एक इंसान को
    सड़क पर लिटा दिया था,
    आज उसको पूछने वाला
    कोई नहीं था,
    बस वो अकेला
    तड़पने में लगा था।

  • वो नशे का आदी

    ठंड थी खूब
    पहाड़ों की ठंड,
    पानी मे कंकड़ जम जाते हैं
    पानी के नल तक फट जाते हैं,
    वो बाज़ार में भटकने वाला शराबी
    बेचैन था, जुगाड़ में था
    कुछ पीने को मिले तो
    रात कटे, किसी दुकान के आगे सोकर,
    था तो वो इंसान ही,
    लेकिन शराब की लत से
    घरबार सब छूट गया था,
    वो अकेला रह गया था,
    जानवरों की तरह बाज़ार का ही हो गया था।
    हाथ फैलाकर
    आने जाने वालों के आगे रोया
    पेट की खातिर उसने मांगा,
    पीने लायक मिल गया
    पी ली, खाने को बचा नहीं।
    पड़ा रहा खुले में
    रात भर, कंकड़ सा जम गया,
    सुबह तक पत्थर हो गया।
    मनुष्य था, जानवर सा हो गया था,
    लेकिन जानवरों सी न खाल थी
    न शरीर में बाल थे,
    ठंड कहाँ सहन कर पाता,
    उसे कौन संभाल पाता,
    बेचारा चल बसा था।

  • वीर शहीद

    ह्रदय कांप उठा,
    देखकर एक तस्वीर
    बर्फ की पहाड़ियां थी,
    एक मशीन गन जंग खाए पड़ी थी
    वहां मौत मुंह बाए खड़ी थी
    कुछ वीर जांबाज़ों के थे शव
    शव क्या कंकाल ही थे,
    उनके वस्त्र भी फटे हाल ही थे
    वीर सैनिकों की वर्दी पहने,
    पड़े हुए थे उनके कंकाल
    हो गए थे सालों साल
    किसी का पैर किसी का हाथ
    पड़े हुए थे सारे साथ
    यह दृश्य देख..
    अश्रु गिर पड़े गाल पर
    शहीदों के इस हाल पर
    उन्हें देख कर कई उठे प्रश्न,
    वीर शहीदों को है नमन
    ______✍️गीता

  • ठंडी हवा

    झूठी हंसी से अच्छा है,
    चलो खुल कर रो लेते हैं
    बार-बार नजर अंदाज
    होने से अच्छा है
    कि नज़र आना ही छोड़ देते हैं
    रोज़-रोज़ चोट खाने से अच्छा है
    कि चलो हम चलना ही छोड़ देते हैं
    बाहर ठंडी हवा बहुत ही तेज़ है
    चलो हम घर से निकलना ही छोड़ देते हैं
    _____✍️गीता

  • “कलम और स्याही”

    ओ विरह की वेदना !
    मुझको पकड़ा दो कलम
    साथ में दे दो मुझे
    रात की तन्हाइयां
    और दो मुझको तुम
    रंग-बिरंगी स्याहियां
    अधखुली-सी इक कली
    रात यों कहने लगी
    “कलम और स्याही” ना हो तो
    दर्द कैसे लिखोगी
    मैं समझ ना कुछ सकी
    सोंच में लिपटी रही
    बोल फिर कुछ ना सकी
    फिर मौन-सी सिसकी उड़ी….

  • अल्फाज ठिठुर गये

    जाने कितने अल्फाज ठिठुर गये
    जो लिखे थे मन के कागज पर मैंने
    सिकुड़ गये कुछ
    ठण्ड की कटीली रातों में तो
    कुछ जम गये बर्फ के गोलों में
    सुबह धूप निकलेगी तो
    पिघलेंगे यही सोंचती रही मैं
    पर ऐसा कुछ भी ना हुआ
    वह अल्फाज जाने किन
    समुंदरों में बह गये
    शायद घने कोहरे की धुंध में
    भटक गये
    तब से लिए ‘कलम और स्याही’ घूमती हूँ
    पर वह अल्फाज
    खो गये तो खो गये !!

  • चल रही आंधियां हैं

    चल रही आंधियां हैं
    थपेड़े ठंड के हैं,
    लिख रहा बेजुबानी
    भाव कुछ मंद से हैं।
    फिजाँ झकझोरने को
    पास कुछ भी नहीं है
    नैन सूखे हुए हैं
    होंठ कुछ बन्द से हैं।
    नहीं हो पाये अपने
    रहे बेगाने वो भी
    समझ लें भावना को
    मित्र भी चंद से हैं।
    चमकते सूर्य हैं वो
    ठिठुरते इन दिनों के
    और हम राह में उनकी
    घिरे से धुंध से हैं।

  • जीवन का सच्चा आनन्द

    पिता-पुत्र सैर को,
    निकल पड़े खेतों की ओर
    ठंडी-ठंडी पवन चल रही
    चलते पानी का था शोर
    कोयल कूक रही पेड़ों पर,
    और कहीं नाचते मोर
    तभी पुत्र ने वहीं पे देखा
    एक जोड़ी पुराने जूते,
    रखे हैं एक खेत के आगे
    पुत्र को थोड़ी मस्ती सूझी
    बोला अपने पापा से,
    पापा हम ये जूते छिपाएं
    फिर कोई उनको ढूंढेगा
    तो उसका आनंद उठाएं
    पिता हुए थोड़ा सा गंभीर,
    दी पुत्र को फिर एक सीख
    कभी किसी कमजोर की
    कोई वस्तु गायब ना करना
    प्रभु सब देखे हैं बेटा,
    गरीब की आह से डरना
    यदि चाहो आनन्द ही लेना,
    तो फ़िर तुम एक काम करो
    चंद सिक्के डालो जूतों में,
    फ़िर पेड़ों के पीछे आराम करो
    मज़दूर काम करके वापिस आया,
    जूतों में सिक्कों को पाया
    इधर-उधर फ़िर नजर घुमाया,
    कोई उसको नज़र ना आया
    घुटनों के बल बैठ गया
    फ़िर होकर भाव-विभोर
    दोनों हाथ जोड़ कर बोला नभ की ओर
    हे प्रभु! किसी रूप में आज आप आए यहां
    बिन आपकी मर्ज़ी के
    ऐसा चमत्कार होता है कहां
    हे प्रभु तेरा ऊंचा नाम
    बीमार पत्नी की दवाई का,
    भूखे बच्चों की रोटी का
    कर गए हो इंतजाम
    पिता-पुत्र पेड़ों के पीछे से,
    देख रहे थे ये नजारा
    पिता ने कहा,
    क्या इससे अधिक आनन्द
    मिल पाएगा बेटा दोबारा
    कष्ट किसी के कम करके,
    काम यदि तुम आ जाओ
    फ़िर इस जीवन के सच्चे
    आनन्द को तुम पा जाओ
    _____✍️गीता

  • बेटा-बेटी

    जब नारी का जन्म हुआ,
    मां-बाप का चेहरा क्यूं सन्न हुआ
    ये बात समझ ना पाती थी
    जितना भी सोचूं उतनी ही उलझती जाती थी
    हर गीत से लेकर कहानी तक
    बचपन से लेकर जवानी तक
    मैं डावांडोल सी रहती थी
    ये दर्द मन ही मन सहती थी
    “बेटा ही अच्छा होता है”
    ऐसा क्यूं बोला जाता है
    ये राज समझ ना पाती थी
    मैं मन ही मन कुम्हलाती थी
    फ़िर एक दिन मैंने ठाना
    अपनी ये सोच बदले ज़माना
    पुरानी पीढ़ी की सोच तो ना बदल पाई
    अपनी अगली पीढ़ी को दूंगी संस्कार
    बेटा-बेटी में फ़र्क ना करूं
    यही होगी पुरानी सोच की हार
    पीढ़ी बदली सोच भी बदली
    बेटा-बेटी का फ़र्क मिटा
    आज हमारी पीढ़ी ने
    देखो ये इतिहास रचा
    ____✍️ गीता

  • प्रेम वह है

    प्रेम वह है
    जो आंखों में, मन में
    दूजे के प्रति उमड़
    चाहत के बीज उगा देता है,
    विरक्त और बुझे मन में,
    तत्क्षण अनुराग जगा देता है।
    प्रेम वह है
    जो सिंचित कर,
    मन के मुरझाये पौधों को
    हरा-भरा कर देता है।
    प्रेम वह है
    जो नयनों में
    नव दृष्टि,
    नव ज्योति जगा देता है।
    प्रेम वह है
    जो अवचेतन भावों को
    जाग्रत कर
    नवचेतना जगा देता है।
    प्रेम वह है
    जो खुशी का संचार कर देता है,
    जीने का नया
    उत्साह भर देता है।
    प्रेम वह है
    जो नव सृजन को
    प्रेरित कर देता है,
    नवसृजन से खुद का होना
    अंकित कर देता है।
    ——– डॉ0 सतीश चन्द्र पाण्डेय

  • तू जगाना खुद की हिम्मत

    हौसला रख, न घबरा
    काम ले हिम्मत से तू
    जिन्दगी आसान होगी
    मंजिलें कदमों में होंगी।
    हो निराशा जब कभी
    दिल बैठ सा जाये अगर,
    तू जगाना खुद की हिम्मत
    मुश्किलें आसान होंगी।
    आँख भर आयें किसी के
    दर्द को महसूस कर,
    या किसी से ठेस पाकर
    मन व्यथित हो जाये तब,
    काम लेना हौसले से,
    शक्ति अंतस की जगाना,
    मन में बल आयेगा तेरे
    कुछ खुशी अनुभूत होगी।
    जब खुशी अनुभूत होगी
    तब ललक आयेगी मन में
    मुश्किलों को यह ललक
    ललकारने लग जायेगी।
    हौसला, हिम्मत तेरी
    मुश्किल करेंगे दूर सब,
    तू जगा हिम्मत न घबरा
    मंजिलें कदमों में होंगी।
    —- डॉ0 सतीश चंद्र पाण्डेय

  • रख लो ना इसे काम पर

    एक छोटे से ढाबे के बाहर
    खड़ी होकर वो गुहार कर रही थी,
    रख लो ना इसे काम पर,
    ग्यारह बरस का हो गया है यह,
    माँज लेगा चाय के गिलास,
    धो देगा जूठे बर्तन
    झाड़ू लगा देगा,
    मेज पर कपड़ा मार देगा।
    और भी छोटे -छोटे काम कर देगा,
    जो कहोगे कर लेगा।
    तीस रुपये रोज भी इसे
    दे दोगे तो चलेगा,
    एक किलो आटा आ जायेगा,
    इस ठंड में
    पूरे परिवार का पेट भर जायेगा।
    रख लो ना इसे,
    आपका भला होगा।
    एक उसके गोद में
    दूसरा ग्यारह बरस के बच्चे की
    गोद में था।
    ठंड में तन ढकने को
    फटे वसन लटक रहे थे,
    बोलते बोलते लफ्ज अटक रहे थे।
    ढाबे का मालिक
    बालश्रम कानून से डर रहा था,
    एक गरीब परिवार
    रोजगार की गुहार कर रहा था।

  • सोंधी-सोंधी गाँव की यादें….

    सोंधी-सोंधी गाँव की यादें
    चौपाटी पर परधानी की बातें
    पके-पके से स्वर्णिम धान
    गाँव के बूढ़े, बाल, किसान
    सब आते हैं मुझको याद
    गोरी के गोरे-गोरे गाल
    जिन पर हँसकर झूले लट
    ना भूला मैं वह पनघट
    जहाँ भरा करती थी पानी
    जोरू, बहना और बूढ़ी नानी
    माँ की वह चूल्हे की रोटी
    सरसों का साग और गुण मीठी-मीठी
    माँ पोंछ के आँचल से तब देती
    लगी राख जो रोटी में होती
    घी की मोटी परत लगाती
    दूध में रोटी मसल खिलाती
    बाबा की पगडण्डी और
    नहरों की वो तैराकी
    आज बड़ा ही याद आये
    गाँव के छूट गये जो साथी….!!

  • आप आ जाते तो

    गुनगुनी धूप है
    इस ठंड में थोड़ा सहारा,
    अन्यथा हम बर्फ बनकर
    ठोस हो जाते।
    इस गली में गुजरते
    आपने देखा हमारी झोपड़ी को
    अन्यथा हम गम भरे
    बेहोश हो जाते।
    इन दिनों मन जरा ढीला
    बना है दोस्तों
    आप आ जाते तो
    हम भी जोश पा जाते।
    इस तरह आपका भी मन
    न होता खूबसूरत तो
    हमें कविता न कहनी थी
    वरन खामोश हो जाते।
    ——- डॉ0 सतीश चंद्र पाण्डेय

  • तृष्णा तुम भी अद्भुत हो

    तृष्णा तुम भी अद्भुत हो
    मन में इतना रम जाती हो,
    ये भी मेरा वो भी मेरा
    सब कुछ मेरा हो कहती हो।
    पूरी कभी नहीं होती हो
    जीवन भर आधी रहती हो,
    नश्वर जीवन में नाशवान
    सुख को पाने को कहती हो।
    क्षणिक सुखों की खातिर मैं
    अनमोल समय इस जीवन का
    सदा लुटाता फिरता हूँ
    ऐसी प्रेरणा देती हो।
    सुख से और अधिक सुख पाऊँ
    दूजे का हक भी मैं खाऊँ,
    सारी रौनक मैं ही पाऊँ
    ऐसा स्वार्थ सिखाती हो।
    बचपन, यौवन और बुढापा
    वक्त निरंतर चलता जाता
    पाया, खाया, खूब कमाया
    फिर भी आधी रह जाती हो,
    कभी नहीं पूरी होती हो।
    अन्त समय तक पर्दा बनकर
    नैनों को ढकती रहती हो,
    सच को समझ नहीं पाता
    इतना सम्मोहित करती हो।
    तृष्णा तुम भी अद्भुत हो
    मन को विस्मित कर देती हो
    कभी नहीं पूरी होती हो
    आधी ही रह जाती हो।
    ——– डॉ0 सतीश चंद्र पाण्डेय

  • ठंड हो जिस समय जिन्दगी में

    कर सकूँ यदि भलाई नहीं,
    तो बुराई करूँ क्यों भला
    आपको दे सकूँ यदि नहीं कुछ
    तो खुटाई करूँ क्यों भला।
    हो अगर कोई मुश्किल समय
    काम में कुछ नहीं आ सकूँ
    तब मुझे हक नहीं है जरा भी
    आपका मित्र खुद को कहूँ।
    ठंड हो जिस समय जिन्दगी में
    उस समय ओढ़ना बन सकूँ,
    जब कभी बन्द हो जाये रसना
    उस समय बोलना बन सकूँ।
    भाव पहचान लूँ नैन के
    जिस समय नैन आधे खुले हों,
    रोक लूँ सांस उड़ती हुई,
    जिस समय होंठ के पट खुले हों।
    आपके कष्ट कम कर सकूँ
    वक्त पर कुछ मदद कर सकूँ
    तब कहूँ मित्र सचमुच का हूँ मैं
    सिद्ध मैत्री को जब कर सकूँ।

  • जुआरी हूं

    कविता -जुआरी हूं
    ———————–
    हां जुआरी हूं,
    एक बार जुआ और खेलने दो,
    जो बचा है मेरे पास अब
    दांव पर लगाकर खेलूंगा,
    बिक गया सब कुछ मेरा
    अब उधार ले कर खेलूंगा,
    सभी अपनों के आगे हाथ फैला –
    जाऊंगा उसी महफिल में,
    सबसे अपना हाल कहूंगा,
    कोई मुझ पर तरस खाएगा
    उधार पत्ते की चाल फेक दूंगा,
    फटे पुराने उजले कपड़ों में,
    बदहाली तंगी के जीवन में ,
    कभी खेल से भागूँगा नहीं,
    हो कर्ज मुसीबत लाख मुझ पर,
    सुन! समझ ईश्वर तुझसे-
    वरदान कभी भी मांगूंगा नहीं,
    मरूंगा उस पथ पर भूख से बेहाल
    पर मुकाम पाए बिना लौटूंगा नहीं
    स्वाभिमान लिए अपना
    खेल खेलता रहूँगा
    देख बड़ी चाल को,
    चाहे हाथ पांव कापें मेरे,
    पर खेल से उठूंगा नहीं।
    ना भविष्य की चिंता
    ना भूत की
    बस दृढ़ ध्यान लगाए वर्तमान पर
    समझ रख चाल पत्तों की
    चाल पर चाल चलाए जाऊंगा|
    आज नहीं तो कल सौ बार हार कर,
    एक दिन जीत जाऊंगा|
    कोई खेले न मेरी तरह
    जुआरी संग पक्का नशेड़ी हूं,
    मैं समझदारों की नजर में,
    जुआरी नहीं जुआरियों का कोच हूं,
    जिसे सब कुछ गवाने की हिम्मत हो,
    वो आए आज मेरी महफिल में
    सूरज ढलने से पहले वह इनाम पाएगा,
    सच वो आज नहीं तो कल जीत जाएगा|
    हार मिले तो क्या हुआ,
    सीख रहा तो क्या हुआ
    हुआ तब जब कुछ किया नहीं,
    हार के डर से महफिल में आया नहीं|
    मिले जख्म जब दर्द का एहसास होगा,
    किसी और को बताने में लक्ष्य आसान होगा,
    यह समझ कर ,आ इस बार मेरी महफिल में,
    कुछ सीख ले-
    कुछ को सिखाने में निपुण हो जाएगा,
    ————————————————-
    **✍ऋषि कुमार ‘प्रभाकर’—

  • शिक्षा क्या है

    कविता- शिक्षा क्या है
    ——————————
    शिक्षा जो कोई लेकर चलता,
    उसको शिक्षा ले चलती है|
    मान प्रतिष्ठा धन वैभव देती है।
    जीवन का मार्ग सुगम कर देती है|
    मन मस्तिष्क आत्मा विकसित हो,
    उठे मन में –
    विचार कल्पना वह भी तो शिक्षा है,
    प्रकृति खुदा से मिली जो शक्ति,
    अंतर मन के भावों को प्रस्तुत करना शिक्षा है,
    मस्तिष्क को इस योग्य बनाएं,
    सत्य खोज सत्य का सार बताएं,
    सच्चाई को जब वह पाता है,
    संपूर्ण शरीर को पंच तत्वों से निर्मित मानता है,
    शिक्षा मानव को निर्मित करती,
    मानव शिक्षा को निर्मित करता,
    धन्य मनुष्य शिक्षा पाकर,
    खुद मस्तिष्क को विकसित करता,
    प्यार सिखाएं आदर्श सिखाएं,
    समता स्वतंत्रता नैतिकता का पढाए,
    सभ्य समाज जन जग हितकारी बनना,
    प्रकृतिवाद संग बच्चों को संस्कार सिखाएं, अनहित द्वेष राग पाल रखा जो,
    रूढ़ीवादी ,
    ना हित समाज संस्कार जो मान रखे हैं,
    लिंग भेद और-
    जाति धर्म ,क्षेत्रवाद से ऊपर उठकर,
    जीव जन धन हित ,शिक्षा कदम बढ़ाती है,
    जो कुछ सोचे जो कुछ समझें ,
    कुछ भी जीवन में करता है,
    भोग विलास चाहे मृत्यु पीड़ा,
    कुछ बोलते हैं! जन्म के पूर्व से ही शिक्षा चलती है,
    सब कोई अपना अपना मत प्रकट करते हैं,
    पर यह कोई नहीं प्रकट करता है
    जो प्रकट हुआ वह सब को प्रकट करता है,
    उलझ गए सब की परिभाषा में,
    सीखने सिखाने की शिक्षाकेवल एक प्रक्रिया है।
    ———————————————————
    **✍ऋषि कुमार’प्रभाकर’—–

  • विधवा स्त्री: “रूठ गई जबसे है चूड़ी

    कैसा जीवन
    हाय ! तुम्हारा
    ना चूड़ी ना
    गजरा डाला
    पैरों की पायल भी रूठी
    घुंघरू टूटा,
    चूड़ी टूटी
    जो देखे वो
    कहे अभागन
    जब चले गये हैं साजन !
    तुझ पर कितने
    अत्याचार हुए
    कटु वचनों के बाणों के
    बौछार हुए
    जीवित ही तुझको
    सबने मार दिया
    तेरे पति के मरने पर
    तुझको ही दोष दिया
    जो स्त्रियां बैठ बतियाती थीं
    संग हँसती थीं,
    मुसकाती थीं
    अब माने तुझको अपशकुनी
    रूठ गई जबसे है चूड़ी…!!

  • दोस्ती के नाम

    सुमन सी सुगंधि रहे,
    जीवन में तुम्हारी
    कांटा भी ना आए कभी
    राह में तुम्हारी
    आया तो शामिल होगी
    मेरी भी आह..
    हर आह में तुम्हारी
    मैं तुम्हारी ज़िन्दगी में,
    कल रहूं, ना रहूं
    दोस्ती तो रहेगी
    दोस्ती सच्ची थी हमारी
    रूह से रूह तक का
    था वो सफर
    हमीं को हमारी
    लगी थी नज़र
    कब हुआ सब ये हुई ना ख़बर
    ज़ुबां चुप रही,
    आंखें मगर सब राज़
    कह गई तुम्हारी
    मन की बात कह ही गई
    आज लेखनी हमारी
    कांटा भी ना आए कभी
    राह में तुम्हारी..
    आया तो शामिल होगी
    मेरी भी आह हर आह में तुम्हारी…
    _____✍️गीता

  • मैं तो बिल्कुल बच्चा था ***********************

    जब कागज का नाव बनाया
    मैं तो बिल्कुल बच्चा था।
    तन का थोड़ा कच्चा था
    पर दिल का बड़ा ही सच्चा था।।
    जब कागज का नाव बनाया ….
    पतंग बनाया कागज का
    और एक जहाज भी कागज का।
    कार बनाया ट्रक बनाया
    ट्रैक्टर ट्राली भी था कागज का।।
    बिन ईंधन के चलते थे सब
    सोचो कितना सब अच्छा था!
    जब कागज का नाव बनाया….
    *****बाकलम****
    बालकवि पुनीतकुमार ‘ऋषि ‘
    बस्सी पठाना ( पंजाब)

  • अकेला अकेला रहने लगा है

    आत्मीयता कहीं
    खो गई है,
    वह शहर की गलियों में
    रो रही है।
    किसी को किसी से
    मतलब नहीं है,
    समन्वय की बातें
    खो गई हैं।
    सहभागिता के
    भाव ही नहीं हैं,
    एक दूसरे की
    चाह नहीं है।
    प्रेम की कहीं अब
    बातें नहीं हैं,
    दर्द बांटने की
    रीतें नहीं हैं।
    करीब के पड़ौसी
    करीब में ही रहकर
    एक- दूसरे को
    जानते नहीं हैं।
    मानव का सामाजिक पन
    आजकल अब
    एकाकीपन में
    बदलने लगा है।
    चारहदीवारी में
    कर बन्द खुद को,
    अकेला अकेला
    रहने लगा है।

  • अभिलाष

    अभिलाष

    जीवन  के   मधु प्यास  हमारे,
    छिपे किधर  प्रभु  पास हमारे?
    सब कहते तुम व्याप्त मही हो,
    पर मुझको क्यों प्राप्त नहीं हो?

    नाना शोध करता रहता  हूँ,
    फिर भी  विस्मय  में रहता हूँ,
    इस जीवन को तुम धरते हो,
    इस सृष्टि  को  तुम रचते हो।

    कहते कण कण में बसते हो,
    फिर क्यों मन बुद्धि हरते हो ?
    सक्त हुआ मन निरासक्त पे,
    अक्त रहे हर वक्त भक्त  पे ।

    मन के प्यास के कारण तुम हो,
    क्यों अज्ञात अकारण तुम हो?
    न  तन  मन में त्रास बढाओ,
    मेघ तुम्हीं हो प्यास बुझाओ।

    इस चित्त के विश्वास  हमारे,
    दूर   बड़े   हो   पास  हमारे।
    जीवन   के  मधु  प्यास मारे,
    किधर छिपे प्रभु पास हमारे?

    अजय अमिताभ सुमन

  • कतरा ए गजल

    कतरा ए गजल

    तू मेरी चाहत आहत मेरा दिल कर दिया |
    कह सर्वोपरि राहत मेरा दिल कर दिया |

    तेरे हुश्न का चर्चा अब सरेआम हो रहा |
    मै तेरा आशिक अब बदनाम हो रहा |

    गुलाबी गाल होंठ लाल नैन कजरारे है |
    काली जुल्फ़े गाल काला तिल बेकरारे है |

    तेरे नजर के वार दिल घायल हुआ जाता है |
    होंठो मंद मुस्कान कोई पागल हुआ जाता है |

    आ बैठ मेरे पास हवाओ तेरी जुल्फ़े लहरा दूँ |
    फलक के चाँद तारे तेरी जुल्फ़े गजरा लगा दूँ |

    तुझसे है कितनी मोहब्बत तुझे मै बताऊँ कैसे |
    दिल मे तु ही तू है तुझे मै अब दिखाऊँ कैसे |

    श्याम कुँवर भारती (राजभर )
    कवि /लेखक /गीतकार /समाजसेवी
    बोकारो, झारखंड,मोब- 9955509286

  • निराशाओं का भंवर

    हौसला रखकर चलना होगा
    परिस्थिति हमेशा इसतरह
    कहाँ रह पाएगी ।
    कबतक दर्द से नाता रहेगा
    कहाँ तक निराशाओं का
    यह भंवर सहमाएगी।
    कठिनाई के ये दिन
    जाते-जाते भी
    सकारात्मकता की
    सीख हमें दे जाएँगी ।
    ये तकलीफ़े
    जो वक्त से मिले हैं हमें
    एक नयी सोंच से
    परिचय मेरा करवायेगी ।
    धीरज के ये तिनके
    समेट कर रखें हैं हमने
    आने वाले अच्छे दिनों की
    जो नन्ही- सी आश जगायेगी ।

  • कुछ हल जरूर होगा

    भारी ठंड है
    वे सिंधु बॉर्डर पर
    धरने पर हैं,
    कई बुजुर्ग किसान
    धरने पर हैं।
    दस वर्ष के बच्चे तक
    धरने पर हैं।
    ठिठुरन है
    लेकिन वे अड़िग
    धरने पर हैं।
    देश की सत्ता
    अपनी संवेदनशीलता
    और कुशलता का
    परिचय दे,
    मामले को तत्परता से
    सुलझा ले।
    कुछ हल जरूर होगा,
    हल निकाल कर
    अपनी काबिलियत का
    परिचय दे।
    दुनिया हंस रही है
    हँसेगी ही,
    इन उलझनों से
    अर्थव्यवस्था फँसेगी ही।
    जितना लंबा खिंचेगा
    आंदोलन,
    उतना आर्थिक नुकसान होगा,
    देश पीछे होगा।
    हल तो निकलेगा ही
    लेकिन समय पर
    हल निकले तो
    नुकसान भी कम रहेगा
    धरने पर बैठे उन बुजुर्ग का
    मान-सम्मान भी रहेगा।

  • दु:खों से नाता

    दु:खो से उबरना क्या
    इनसे तो जन्मों का नाता है
    मीठा तो कभी-कभी
    नमकीन साथ निभा जाता है ।
    ज्यादा मीठा हो तो
    मन जल्दी ही उब जाता है
    नमकीन के बल पर ही
    मीठा भी रास हमें आता है ।
    सुख की घङियो में
    इन्सान खुद को भूल जाता है
    दु:ख की दारूण वेला ही
    इंसान को औकात बता जाता है ।
    मन में यह बेचैनी क्यूँ
    क्यूँ मन जार-जार हो जाता है
    दर्द का सैलाब क्यूँ
    आँखो में अकसर उतर आता है ।
    सुख की चाह नहीं
    दु:ख से आह क्यूँ निकल आता है
    अनहोनी के डर से
    अंतर्मन भी कांप के रह जाता है ।

  • माता-पिता को भूलकर

    माता-पिता को भूलकर तू
    चैन में खुद को समझ मत
    आज तेरा वक्त है फिर
    वक्त बदलेगा समझ ले ।
    आज तू अपने में खुश है
    दूर बैठा है शहर में
    अपने बच्चे और पत्नी
    बस रमा है खुद ही खुद में।
    आस में बैठी हैं घर में
    उन बुजुर्गों की निगाहें
    टकटकी पथ पर लगाये
    इंतजारी में हैं आहें।
    पाल-पोषित कर तुझे
    लायक बनाया था जिन्होंने
    आज तूने वे भुलाये,
    शर्म कर ले वो अभागे।
    फर्ज अपना भूल कर तू
    मौज में कब तक रहेगा,
    यह समय जाता रहेगा
    तू जवां कब तक रहेगा।
    आंख अपनी खोल प्यारे
    याद कर बचपन के दिन
    किस तरह से प्यार करते थे
    तुझे माँ-बाप तब
    तूने यौवन के नशे में
    सब भुलाई नेह-ममता
    माँ-बाप की हालत से तेरा
    क्यों नहीं हृदय पिघलता।
    —— डॉ0 सतीश चन्द्र पाण्डेय

  • अपनी धुन में मगन मजदूर

    ठंड में ठिठुरता जाता है,
    कोई शिकवा भी ना कर पाता है
    उसका ना कोई ठौर-ठिकाना,
    दूजे का भवन बनाता है
    ठक-ठक, खट-खट की आवाजों में ही,
    पूरा दिवस बिताता है
    ना निज का कोई ठौर-ठिकाना
    मालिक का भवन बनाता है
    घर में चूल्हा जले दो वक्त,
    वो अपना खून जलाता है
    अपना ना कोई ठौर-ठिकाना
    दूजे का भवन बनाता है
    रात की बात मत पूछो साहिब
    आग जलाकर दिन भर की थकन मिटाता है
    खुद का ना कोई ठौर-ठिकाना,
    दूजे का भवन बनाता है
    सुबह-सुबह फिर वही मजूरी,
    करने को वह जाता है
    खुद की एक छोटी सी झुग्गी,
    किसी और का भवन बनाता है
    आज चोट लग गई बांह पर,
    पर यहां किसी को किसी की परवाह कहां
    बस एक चाय, बीड़ी पी कर ही
    फिर काम पर लग जाता है
    बीड़ी कितना नुकसान करे देह को,
    कौन इसे समझाता है
    अपनी ही धुन में मगन मजदूर वो,
    बस काम ही करता जाता है
    _____✍️गीता

  • अनोखा जी चले बाजार

    अनोखाजी चले बाजार।
    टौर से हो फटफटि सवार।।
    साथ में चली श्रीमति जी।
    चहक रहे थे आज पतिजी।।
    कितने अच्छे हैं टमाटर।
    आओ खरीदे साथ मटर।।
    क्या यार तुम भी हद करती हो।
    क्या फिर साॅपिंग रद करती हो?
    फेरीवाला था एक फुटपाथ पे।
    लेकर बैठा वस्तु बहुत साथ में ।।
    छलनी सूप और झाड़ू पोछा ।
    आओ खरीदे चलकर सोझा।।
    बस भी करो यार।
    ये कैसा बाजार।।
    मोहतमा गुमसुम चलती रही।
    कुछ बातें उसको खलती रही।।
    जैसे दिखा एक बर्तन दूकान।
    फूटी कराही का आया ध्यान।।
    कराही एक खरीदूँ क्या?
    वही जवाब फिर से ‘क्या’!!
    जबरन रुक गई मनिहारी के दूकान पर।
    “ऊन सलाई दे दो भैया” लाई निज जुबान पर।।
    व्यस्क मर्द के खातिर जितना ।
    दे दो भैया मुझको उतना।।
    घर आए हो गुस्से में लाल।
    वस चीख रहे अनोखलाल।।
    क्या करी खरीददारी तुमने?
    यही खरीदी साड़ी तुमने ?
    गुस्सा तो शांत करो मेरे लाला।
    मेरे पास तो है दुसाला।।
    मुझे तो रहना है घर में ।
    तुम जाओगे दफ्तर में।।
    निरुत्तर हुए अनोखा जी।
    क्या पत्नी पाए चोखा जी।।
    ‘विनयचंद ‘ ये नारी है
    ममता की अवतारी है।।
    त्याग बलिदान की मूरत है ।
    सम्मान की इन्हें जरुरत है ।।

  • रखो न हीन भावना (दिगपाल छंद में)

    रखो न हीन भावना बुलंद भाव से चलो,
    सदैव सिर उठा रहे कभी नहीं कहीं झुको।
    झुको उधर जिधर लगे कि सत्य की है भावना,
    सिर उधर झुके न जिधर झूठ की संभावना।
    तोलना किसी को है तो आचरण से तोल,
    धन अधिक है कम है न कर आदमी का मोल।
    बोलना है गर कभी तो बोल मीठे बोल,
    नेह दे अगर कोई तो द्वार दिल के खोल।
    आदमी सभी समान हैं नहीं ये भेद रख,
    एकता की भावना से प्रेमरस का स्वाद चख।
    सार्वभौम सत्य है कि प्रेम भावना रखो,
    बुलंद मन बुलंद तन, बुलंद भावना रखो।
    —— डॉ0 सतीश चंद्र पाण्डेय
    काव्य दिशा- दिगपाल मात्रिक छंद की इस काव्य रचना में 12-12 मात्राएं समाविष्ट हैं। कुल 24 का पद प्रस्तुत करने का प्रयास है।

  • वो प्रीत कहाँ से लाऊं

    जिन्दगी की सरगम पर
    गीत क्या मैं गाऊँ
    तुम्ही अब बता दो
    वो प्रीत कहाँ से लाऊँ।
    पतझङ सी वीरानी
    छायी है जीवन में
    ना कोई है ठिकाना
    खुशी अटकी है अधर में
    दो राहे पर खङी मैं
    किस पथ पर मैं जाऊँ
    तुम्हीं अब बता दो
    वो प्रीत कहाँ से लाऊँ।
    नज़र में जो छवि थी
    कभी राधा मैं बनीं थीं
    कान्हा की लगन मन में लगी थी
    उसकी हंसी भी वैरन सी खङी थीं
    विश्वास की डोर टूटी
    दुनिया ही जैसे लूटी
    झूठ के भँवर से कैसे निकल पाऊँ
    तुम्हीं अब बता दो
    वो प्रीत कहाँ से लाऊँ।

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