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संपादक की पसंद

  • बदल रही है ज़िंदगी

    बदल रही है ज़िंदगी, बदल रही हूँ मैं..!
    तुम इश्क हो तुम्ही में ढल रही हूँ मैं!!

    नरमी तुम्हारे हाथों की ओढ़े हुए हैं धूप..!
    तपिश में इसकी बर्फ़ सी पिघल रही हूँ मैं!!

    जाना तुम्हें तो ख़ुद का कुछ होश न रहा!
    गिरती हूँ कभी और क़भी संभल रही हूँ मैं!!

    ख़ुद से छिपाती हूँ मैं अपने दिल का हाल!
    लगता है जैसे हाथों से निकल रही हूँ मैं..!!

    रस्ता भी मेरा तुम हो मंजिल भी तुम ही हो!
    जाऊँ जिधर भी तुम से ही मिल रही हूँ मैं..!!

    n 3^07 !
    © अनु उर्मिल ‘अनुवाद’

  • *खेतों की हरियाली*

    देख के खेतों की हरियाली,
    नव-प्रभात ऊषा की लाली
    मन विभोर हो उठा है मेरा,
    मन मचले मत जा यहां से
    कितना सुन्दर गांव है मेरा
    पीली-पीली ओढ़ ओढ़नी,
    सरसों खड़ी मुस्काए
    मीठे गन्ने की पत्ती लहराकर,
    अपनी ओर बुलाए
    शुद्ध पवन है, ना कोई शोर
    कोयल कूके मेरे खेत में,
    नृत्य कर रहे हैं मोर
    तस्वीर बसा ली आंखों में,
    मैंने मेरे गांव की
    खेतों की हरियाली की
    और उस नीम की छांव की

    *****✍️गीता

  • आज उन्हें जय हिंद लिख रही

    डटे हुए हैं सीमा में वे, रोक रहे हैं दुश्मन को,
    चढ़ा रहे हैं लहू- श्रमजल, मिटा रहे हैं दुश्मन को।
    ठंडक हो बरसात लगी हो, चाहे गर्मी की ऋतु हो,
    सरहद के रक्षक फौलादी, रौंध रहे हैं दुश्मन को।
    भारत माता की रक्षा पर, तत्पर शीश चढ़ाने को,
    निडर खड़े हैं रक्षक बनकर, रौंध रहे हैं दुश्मन को।
    आज उन्हें जय हिंद लिख रही, अक्षरजननी यह कवि की,
    जो सीमा पर डटे हुए हैं, रोक रहे हैं दुश्मन को।
    मात्रिक छंद – उल्लाला छंद 15-13 में, देश प्रेम संजोती उल्लाला पंक्तियाँ।

  • *आख़री खत*

    वो मीठी बातें और मुलाकातें
    करते थे हम रात भर जो प्यार भरी बातें
    तुम जाने कितने तोहफे
    मुझे दिया करते थे,
    हर तोहफे में एक खत रखा करते थे..
    उन खतों की बात निराली होती थी,
    पढ़ती थी अकेले जब
    हाथ में चाय की प्याली होती थी…
    तुम्हारे खतों की भाषा
    मेरी कविताओं से अच्छी होती थी,
    तुम्हारे हर खत को मैं बार-बार
    पढ़ती थी…
    फिर तुम्हारी एक गलतफहमी ने
    सब बर्बाद कर दिया,
    बहुत दूर तक जाने वाला था जो रिश्ता
    एक ही झटके में हमने तोड़ दिया…
    जलाया जब आज मैने
    वो तुम्हारा आख़री खत,
    सारे जख्म हरे हो गये
    जिन्हें भरने में लगा था काफी वक्त…

  • वो जूठी कॉफी..!!

    तुम मुझे प्यार नहीं करते हो
    यही सोंचकर मैं बहुत उदास थी !
    तुम आये जब घर तो कुछ
    आस जगी..
    मैंने जल्दबाजी में बनाई थी
    अपने लिये जो एक कप कॉफी
    थोड़ी पी ली थी,
    तुम आये तो बड़े प्यार से तुम तक पहुंचा दी..
    वो कॉफी मेरी जूठी थी
    तुम्हारे पास रखी थी वो बड़ी देर से,
    जब आकर कहा मैंने
    खिड़की की ओट से
    वो कॉफी मेरी जूठी है..
    तुमने आश्चर्य से मेरी तरफ देखा !
    मैं समझ गई कि तुम अब नहीं पियोगे पर
    वो कॉफी जो बड़ी देर से तुम्हारे पास
    रखी थी !
    तुम्हारे होंठों से लगने की प्रतीक्षा कर रही थी,
    वो कॉफी तुम गटागट पी गये…
    मैं फिर संशय में पड़ गई
    तुम प्यार करते हो या नहीं करते हो ?
    वो जो कॉफी का कप’
    तुम टेबिल पर छोंड़ गये थे,
    शायद जान बूझकर उसमें
    कुछ कॉफी छोंड़ गये थे..
    मैंने उस कॉफी को उठाकर झट से पी लिया
    यूं लगा जैसे अमृत का घूंट पी लिया…

  • *रात में सिर्फ मेरे साथ चाँद रहता है*

    उलझनें रात को उबाती हैं दिन में नहीं
    तन्हाई रात को तड़पाती है दिन में नहीं..
    पीर महसूस करने का वक्त
    दिन में नहीं मिल पाता है
    इसीलिए कवितायें रात को
    लिखती हूँ दिन में नहीं..
    दिन में किसी ना किसी से जंग छिड़ी रहती है
    और रात खामोंशी में आराम से कटती है…
    दिन में लोगों का हुजूम उमड़ पड़ता है
    रात में सिर्फ मेरे साथ चाँद रहता है…
    रात में दिल की धड़कनें जोर से
    धड़कती हैं,
    जो मुझे कानों से सुनाई पड़ती हैं…
    दिन में मेरी आवाज कौन सुनता है ?
    दिन में तो खुद को भी बार-बार
    ढूंढना पड़ता है..
    रात में खामोंश-सी तन्हाई साथ रहती है
    जो दिल के जज्बात लेखनी से बयां करती है..

  • ओ मेरे प्रियतम कान्हा !!

    ओ मेरे प्रियतम कान्हा !!
    मुझको तेरी बेरुखी से
    डर लगता है,
    तुम्हारी आँखों से
    साफ पता चलता है…
    तुम जिस तरह मायूस निगाहों से
    मेरी तरफ देखते हो,
    अपनी लाचारी साफ बयां करते हो…
    क्यूं समझते हो तुम खुद को अकेला ?
    मैं तो तुम्हारी ही हूँ
    ये तुम क्यों नहीं समझते हो !
    मत सोंचो दुनिया छोंड़कर जाने की,
    अभिलाषा रखो मेरा साथ निभाने की…
    हौसला रखो ये बुरा वक्त भी कट जाएगा,
    तुमने जो देखा है सपना
    वह भी साकार हो जाएगा…
    हम तुम्हारे लिए कुछ भी कर सकते हैं,
    पर हम तुम्हें छोंड़कर जी नहीं सकते हैं…
    इरादा नहीं है मेरा
    तुमसे ब्याह रचाने का,
    सपना है तुम्हारे दिल में आशियां बनाने का…
    तेरी रूह से प्यार करती हूँ
    जिस्म पर अधिकार नहीं जताऊंगी,
    तुम मेरे हो बस एक बार ये कह दो
    मैं उसी में स्वर्ग पा जाऊंगी…
    मीरा की तरह मैं तो तेरी भक्ति करती हूँ,
    सुध-बुध बिसराकर तेरा नाम जपती हूँ….
    रुक्मिणी बनने के ख्वाब मैं नहीं देखती !
    मैं तो राधा की तरह तेरे प्रेम को तरसती हूँ…
    मत छोंड़ जाना तुम मुझे
    दुनियां में अकेला,
    हो ज्यादा जरुरी जाना !
    तो बता देना मुझे,
    सबकुछ छोंड़कर, मैं तेरे साथ ही चलती हूँ…

  • *छठ पूजा की पौराणिक कथा*

    नि:संतान थे राजा प्रियंवद,
    पुत्र-प्राप्ति हेतु किया हवन
    प्रशाद की खीर खाकर, रानी मालिनी ने
    दिया एक पुत्र को जनम
    किन्तु पुत्र जीवित ना था
    राजा ले जा रहे थे
    पुत्र का अंतिम संस्कार करने
    राजा थे शोकाकुल ज्यादा
    प्राण त्यागने को आमादा
    प्रकट हुई तब एक देव-कन्या,
    नाम था उनका देवसेना
    बोली, पूजा-व्रत करो मेरा राजन्
    होगा तुम्हें प्राप्त पुत्र-रत्न
    राजा ने उनका कहा माना,
    कार्तिक शुक्ल की षष्टी थी वो
    आई थी छठ माता,
    राजा को पुत्र मिला था
    तभी से ये व्रत-त्यौहार मनाया जाता ।।

    *****✍️गीता

  • *छठ पूजा*

    आई आई छठ पूजा है आई,
    कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की
    षष्ठी तिथि को जाए ये मनाई
    छठ पूजा की धूम देखो,
    चारों ओर है छाई
    बच्चों और सुहाग का,
    मंगल करती है छठ माई
    निर्जला व्रत रखा जाता है,
    नदी किनारे होती पूजा
    नदी के जल में जाकर,
    सूर्य को अर्घ्य दिया जाता है,
    बांस टोकरी में रखते हैं,
    गन्ना,ठेकुआ, चावल लड्डू ,केला,नींबू और नारियल
    नदी घाट पर एक छोटा सा घर बनाकर
    दीप जलाया जाता है
    फ़िर जल में खड़े होकर,
    फल, मिष्ठान्न चढ़ाकर
    छठ मैया को पूजा जाता है,
    इस तरह से छठ मैया से
    वरदान लिया जाता है
    उगते सूरज की पूजा करना,
    संसार का विधान है
    अस्ताचल सूर्य की आराधना,
    ये भारतीयों का निधान है
    पहले दिन अस्ताचल सूर्य को
    अर्घ्य दिया जाता है,
    दूजे दिन फिर उगते सूर्य को
    नदी के जल में खड़े होकर
    अर्घ्य दिया जाता है
    इस तरह से छठ पूजा को
    पूर्ण किया जाता है।

    *****✍️गीता

  • कविता : ये दिल बहार दुनियां कितनी बदल रही है

    मानवता बिलख रही है
    दानवता विहँस रही है
    है आह आवाजों में
    अस्मिता सिसक रही है
    ये दिल बहार दुनियां कितनी बदल रही है ||
    ये शाम रंगीली ,सुबह नशीली
    उनकी हो रही है
    जहाँ निशा निरन्तर ,नृत्य नशा में
    भय से क्रन्दन कर रही है
    बीच आंगन में मजहबी
    दीवार खिंच रही है
    नग्नता सौन्दर्य का ,अर्थ हो रही है
    ये दिल बहार दुनियां कितनी बदल रही है ||
    अँधेरी निशा है ,दिशा रो रही है
    नदी वासना की अगम बह रही है
    सब कुछ उलट पलट है
    काँटों के सिर मुकुट है
    कलियों की गर्दनों पर ,शमशीर चल रही है
    ये दिल बहार दुनियां कितनी बदल रही है ||
    ‘प्रभात ‘ रंग रूप की बहारें ,रहती सदा नहीं हैं
    बेकार मनुज इस पर ,अभिमान कर रहा है
    आज इंसान भी कितना बदल गया है
    सम्मान का है धोखा ,अपमान कर रहा है
    अभिमान देखिए सिर कितना चढ़ रहा है
    है मित्र कौन बैरी ,अनुमान कर रहा है
    भू को विनाशने की अणुवाहिनी सज रही है
    जर्जर व्यवस्था की ,अर्थी निकल रही है
    ये दिल बहार दुनियां कितनी बदल रही है ||

  • *श्याम ! कभी गोपी बनके तो देखो*

    अगर राधा ना होती तो
    श्याम से प्रीत कौन करता ?
    अगर मीरा ना होती तो
    भक्ति के पद कौन गाता फिरता ?
    यही तो है प्रेम में हमेंशा
    नारियों ने अपने आपको
    सराबोर कर दिया है,
    केवल प्रेम किया और कुछ नहीं किया
    ओ श्याम ! कभी गोपी बन के तो देखो
    जैसा प्रेम राधा ने किया
    वैसा प्रेम करके तो देखो
    जैसे सुध-बुध खोकर गोपियों ने प्रतीक्षा की
    वैसे ही सुध-बुध खोकर तो देखो
    तब जानोगे तुम *प्रेम की पीर मोहन !
    तुम चैन से वंशी बजाना छोंड़ दोगे..

  • सूर्य उपासना

    हम आधुनिक होते जा रहे
    हमारी आस्था आज भी वही
    हम उपासको के लिए
    सूर्य परिक्रमण कर रहा
    पृथ्वी है स्थिर।
    दर्शाता रह पर्व
    लोक-आस्था विज्ञान पर है भारी
    सदियो से प्रारम्भिक रूप मे
    सूर्य उपासना है जारी।
    लोकगीतो मे चलते-चलते सविता
    थककर अस्त हो गयी
    पुनः उठकर अपनी स्वर्ण आभा से
    प्रकाशित जग को कर रही।
    सदिया गुजर गयी
    कयी बदलाव आ गये है
    पर आझ भी दिनकर को
    लङुआ-पकवान भा रहे है।
    देशी हस्त निर्मित वस्तुओ का
    उपयोग कर रहे है
    बास की है डलिया
    पान-सुपारी,
    फलो का भोग चढा रहे है।
    दिखावो से दूर आडम्बरो की
    इसमे कोयी जगह नही
    सिर्फ श्रद्धा- सुमन से
    दिनकर लुभा रहे।

  • रिश्वत

    खाद्य-निरीक्षक की चलती थी,
    रिश्वत से रोजी-रोटी
    लाला ने इन्कार किया तो,
    धमकी आ गई मोटी-मोटी
    लाला जी के होटल में,
    खाना बनता था शुद्ध
    लेकिन बिन मोटी रिश्वत के,
    अफ़सर हो गया थोड़ा क्रुद्ध
    बोला, जांच कराऊंगा,
    कैसा तेरा खाना है
    ज़रा भी कमी मिली तो,
    जेल में पक्का तेरा जाना है
    लाला बोले, रहने दो धमकी,
    खाना जांच कराओ कभी भी
    नहीं डरें हम दादा-गिरी से,
    काम करें ईमान-दारी से
    खाना जांच हो कर आया,
    बिलकुल शुद्ध खाना पाया
    लाला जी की हुई जय-जयकार
    हर्षित हुए सारे दुकानदार ।।

  • सफलता ,ऊँची उड़ान

    कविता : सफलता ,ऊँची उड़ान
    जीवन है छणिक तुम्हारा
    भूल कभी कोई न जाना
    बनकर सूरज इस वसुधा का
    जर्रे जर्रे को चमकानां ||
    सूरज ,चांद सितारे छुपते
    हम ,तुमने भी है एक दिन जाना
    नाम रहे जो जग में रोशन
    ऐसा कुछ करके दिखलाना
    बनकर गुल इस वसुधा का
    जर्रे जर्रे को दमकाना ||
    जैसा चाहते हो औरों से
    वैसा ही करके दिखलाना
    गर प्रकाश में चाहो रहना
    प्रकाश बन कर जग में है छाना
    बनकर खुशियां इस वसुधा की
    जर्रे जर्रे को हर्षाना ||
    किस ओर है मंजिल ,किस ओर जाना
    अनदेखी राहें भटक तुम न जाना
    संजोए हैं जो सपने ,जीवन में अपने
    पूरा उन्हें करके है दिखाना
    बनकर पुष्प इस वसुधा का
    जर्रे जर्रे को महकाना ||
    ‘प्रभात ‘ समय और पानी की धारा
    दोनों कभी न रुक सकते हैं
    वे ही सिर धुन धुन रोते हैं
    जिनके साथ न वे चलते हैं
    हिम्मत और लगन से डरकर
    आफत सदैव छिपती है
    हो निडर आगे बढ़ो तुम
    सुखद सपनों मे न फूलो
    हर व्यथा की घूंट पीकर
    कठिनाइयों के बीच झूलो
    हिम्मत का पतवार पकड़ लो
    फिर तुम अपनी नाव चलाओ
    फिर सफलता मिलकर रहेगी
    नियति भी तुमसे थर्राकर
    आनंद की वर्षा करेगी ||

  • **आचरण की सभ्यता**

    तमाशा नहीं जिन्दगी
    हकीकत है,
    जी लो जी भर के
    कल किसको फुर्सत है…
    रोज़ लड़ते हो तुम
    धन-दौलत के पीछे,
    उतना ही कमाओ जितनी जरूरत है..
    यह धन-दौलत सब यहीं धरा रह जायेगा,
    जो कमाकर रखोगे वह
    कोई और खायेगा..
    जिस जमींन को खरीदकर
    बनते हो तुम सेठ,
    उस जमीन पर कल कोई और घर बनायेगा..
    यहाँ जो कुछ भी है
    सब नश्वर है,
    ना किसी को मिल सका है कुछ
    ना किसी का हो पाएगा…
    जितना पोटली में है,
    उतने में संतोष करो
    जितना भाग्य में है उतना ही तो मिल पाएगा..
    प्रेम से रहो और प्रेम ही करो,
    अच्छा आचरण ही तो तुझे मोक्ष दिलाएगा…
    सुन लो सभी आज कहती है प्रज्ञा !
    यह संसार है यहाँ
    जाने कब कौन आया है,
    जाने कब कौन जाएगा !!

  • अच्छा लगता है….

    गलतफहमियों में जीना
    अच्छा लगता है…..
    मुझको तेरा हर एक बहाना
    अच्छा लगता है…..
    कभी तू रोये कभी
    तेरी बातें मुझे रुलायें
    मुझको तेरा इठलाना
    अच्छा लगता है…..
    कभी नजर उठाकर
    तू बोले मुझसे तौबा !
    मुझको तेरा नजर झुकाना
    अच्छा लगता है…..
    लड़ती है तू पर
    प्यार भी मुझको करती है
    मुझको देखकर तेरा छुप जाना
    अच्छा लगता है…..

  • ओ सजीली रंगीली निशा !

    तुम कितनी भोली हो बाला
    तेरा कितना रूप निराला
    मीठी-मीठी बातों से
    तुम मुझको रोज रिझाती हो
    सुबह होते ही तुम जाने कहाँ
    गुम हो जाती हो !
    सांझ होते ही मैं
    तुम्हारी प्रतीक्षा करने लगता हूँ
    क्योंकि तुम अपने साथ
    यादों का सैलाब ले आती हो
    ओ सजीली, रंगीली निशा !
    तुम मुझको बहुत ही भाती हो…

  • पूर्ण विराम

    इंसानियत कब इंसान की जिंदा होगी
    क्या तब जब हर आत्मा से निंदा होगी
    जागो देखो सोचो
    सुलग रहा है समाज
    कब तक बंद रखोगे अपनी आवाज
    बोलो जो चाहते हो, कहो जो सोचते हो
    किसी का इंतजार अब नहीं
    समाज गूंगा है, बहरा है
    खुद अपनी सुनो
    वही करो जो बेहतर है
    काट दो हर उस जड़ को
    जो दीमक बनकर
    खोखला कर रही है मर्यादाओं को
    बदलो इन रिवाजों को
    जो सबके लिए नहीं है
    एक लंबी जीवन यात्रा
    बिना लक्ष्य कब तक
    हत्या बलात्कार भ्रष्टाचार में
    खो रहा है तुम्हारा देश
    उठो जागो हिंदुस्तान
    कब लगेगा पूर्ण विराम
    कब लगेगा पूर्ण विराम
    ‌ वीरेंद्र सेन प्रयागराज

  • सुन ले बिटिया रानी

    प्यारी-प्यारी बिटिया रानी,
    कहे मां कह एक कहानी
    राजा हो या रानी
    मां तेरी कविता लिखती है,
    कैसे कहे कहानी
    फ़िर भी सुन, ओ बिटिया रानी
    एक थी झांसी की रानी,
    मनु नाम था बचपन का
    ब्याह के बाद,लक्ष्मीबाई
    हुई झांसी की रानी
    राजा जी नि:संतान मरे थे,
    करुणा भरी कहानी
    सुन ले बिटिया रानी
    तीर, तलवार सब सीखे रानी ने,
    निज रक्षा की ठानी
    साहस भरी कहानी
    गोरों से लड़ गई अकेली,
    हार ना उसने मानी
    हुई कुर्बान स्व-देश पर,
    साहसी बहुत थी रानी
    वीरता भरी कहानी
    तो,आज के युग में बिटिया रानी,
    स्वयं को वज्र बनालो
    निज रक्षा करने हेतु,
    आज के दौर में,
    कॉपी कलम उठा लो
    निज पैरों पर खड़ी होगी,
    जब होगी तू सयानी
    सुन ले बिटिया रानी
    साथ निभाएंगे तब तेरा सभी,
    जी लेना अपनी ज़िन्दगी
    पर मत बनना अभिमानी,
    अब सो जा बिटिया रानी ।।

    *****✍️गीता

  • “आधुनिक परिवेश और नारी”

    आधुनिक नारी ने
    तोड़ दी हैं गुमनामी की जंजीरें
    बढ़ाई है अपनी ताकत
    अपनी मेहनत से पाया है
    बुलंदियों का आसमां
    कभी खैरात में नहीं मांगी
    उसने खुशियां
    नारी ने तो हमेशा से त्याग, तपस्या
    और बलिदान करके
    कमाया अपने हिस्से का हक
    आधुनिक नारी आज हर क्षेत्र में
    बढ़ा रही है अपना कदम और
    लहरा रही है जीत का परचम
    उसकी पहल से आज
    बदली हैं फिजायें
    हवा ने अपना रुख मोड़ा है
    आधुनिक परिवेश के साथ ही
    नारी ने धूल खाते रिवाजों को तोड़ा है..

  • “तिरस्कृत महिला”

    तिरस्कृत महिला
    ****************
    तिरस्कार मनुष्य को
    जीवित ही मार देता है
    ये वह जहर है जो
    धीरे- धीरे असर करता है
    शेक्सपियर भी कह गये हैं मित्रों !
    “बदला लेने और प्रेम करने में नारी
    पुरुष से ज्यादा निर्दयी है”
    इसीलिए तो जब
    एक महिला तिरस्कृत होती है
    तो वह जहरीले नाग से भी
    खूंखार होती है
    ना देखती है वह फिर रिश्तों का मोह
    घायल नारी, द्रौपदी सम होती है
    सीता हो या द्रौपदी
    इतिहास गवाह है
    जब-जब पुरुष ने नारी का तिरस्कार किया है
    उसका अस्तित्व मिटा है
    तो सम्मान दो और
    सम्मानित होने का गौरव पाओ
    नारी को तुच्छ नहीं
    अपने जीवन का भाग बनाओ…

  • *हिम की एक बरसात*

    ढ़ल गई है सांझ देखो,
    धूमिल सा मंज़र हुआ
    चांदी की चादर ओढ़ के,
    हर पर्वत सो गया
    चांद भी ठिठुरता सा,
    बादलों में खो गया
    श्वेत-श्वेत दूधिया सी,
    सारी नगरी हो गई
    हिम की एक बरसात से,
    राहें भी कहीं खो गई
    सुरमई अंधेरों में,
    ये वादियां भी सो गई
    मैं सुहाना सा ये मंज़र
    देखती हुई जा रही
    इन सुन्दर वादियों में,
    मैं भी कहीं खो गई

    *****✍️गीता

  • “तुम्हारी मौजूदगी और मेरी तड़प”

    तुम्हारी मौजूदगी और मेरी तड़प
    थक गई हूँ अब मैं
    एक जगह रुककर,
    तुम जब आते हो
    दिल का दर्द क्यों बढ़ जाता है?
    रूबरू होने का कहाँ
    हमको वक्त मिल पाता है
    आते हो जब तुम
    धड़कन हमारी
    वक्त से भी तेज भागती है और
    साँसें थम-सी जाती हैं
    बजने लगती है
    दिल में गिटार और
    होंठों पर बजने लगती है सरगम
    जब जाते हो दूर तो
    चैन साथ ले जाते हो
    मेरे पास अपना दिल छोंड़ जाते हो
    लौटकर कब आओगे
    यह पूंछ नहीं पाती हूँ
    पास आती हूँ जब तेरे
    तो कुछ दूर रूक जाती हूँ…

  • पगडंडियां

    पगडंडियां जिंदगी के सफर में
    बहुत कुछ सिखा जाती हैं।
    कभी नफरत के साए में जीना
    कभी प्यार का पाठ पढ़ा जाती हैं।
    जिंदगी की पगडंडियों पर चलते हुए
    उम्र के कई पड़ाव पार कर गए हैं ।
    कभी खुशी कभी ग़म का दौर आया
    कभी रोए कभी मदद हाथ हजार कर गए हैं।
    पगडंडियों ने कभी राह बदलने का
    हुनर सीखने की ख्वाहिश नहीं की।
    ये तो हम हैं जो वक्त – वक्त पर
    बदल जाने की बात किया करते हैं।
    पगडंडियों पर कभी पत्थर तोड़ते लोग मिले
    कभी मदिरापान में डूबी शोख हसीना।
    रास्ता वही है मंजिल भी है अपने दर पे
    मुसाफिर ही बेवक्त बदल जाया करते हैं।
    उड़ते हैं जो वक्त को नजर अंदाज कर
    धरती पर वही अकेला पन पाया करते हैं।
    वीरेंद्र सेन प्रयागराज

  • *गुलाबी धूप की ओढ़ चुनरिया*

    गुलाबी धूप की,
    ओढ़ चुनरिया
    देखो सर्दी आई है
    ठंडा कोहरा आसमान में,
    बादल भी संग लाई है
    पर्वतों का सा,मौसम हो जाता
    चाय सुहाती है हरदम
    बिन शॉल और बिन स्वेटर तो,
    निकला सा जाता है दम
    ओस की बूंदें गिरे निरन्तर,
    पूरी-पूरी रात
    ठंडा-ठंडा पानी आता,
    जम जाते हैं हाथ
    फ़िर भी मन को भाए सर्दी,
    कितनी मुझे सुहाए सर्दी

    *****✍️गीता

  • **खाने को कुछ निवाले दे दो**

    द्वार पर खड़ी हूँ
    भीख दे दो
    सीख नहीं कुछ अन्न-जल दे दो
    तेरे बाल- बच्चे सलामत रहें,
    घर-द्वार फूले-फले,
    बड़ी भूंख लगी है
    कुछ खाने को दे दो
    सीख नहीं कुछ अन्न-जल दे दो…
    कई दरवाजे होकर आई हूँ
    तेरे द्वार पर कुछ आस लेकर आई हूँ
    ताजा ना हो तो बासी ही दे दो
    ओ बेटी ! तुझे अच्छा घर-बार मिलेगा
    खाने को कुछ निवाले दे दो
    यह सुनकर मैं निकली
    उस बूढ़ी दादी को देखकर
    मेरी आत्मा पिघली
    एक नहीं चार ले लो,
    बासी नहीं ताजा ले लो
    ओ दादी! जरा पहले हाथ धो लो
    फिर पेट भर कर जितना मन हो खा लो….
    **********************************

    “सत्य घटना पर आधारित एवं मन में उपजे भाव”
    आप भी किसी जरूरतमंद की सहायता कीजिये…
    *करके देखिये अच्छा लगता है*

  • जिन्दगी की शाम

    हर सुबह होती है
    मुस्कुराते हुए
    रात होते-होते
    आँख भर आती है
    जिन्दगी की उलझनों में
    उलझती हूँ ऐसे कि
    जिन्दगी की शाम हो जाती है
    बेबसी, आँसू, रुसवाई के सिवा
    कुछ नहीं है मेरे पास
    हँसने की कीमत भी
    अदा करनी पड़ती है
    रूठकर लिखा होगा शायद
    उसने मुकद्दर
    तभी तो जीतकर भी
    हर बाजी पलट जाती है
    याद आती है वो बचपन की आजादी
    अब तो खुली फिजाओं में भी
    सांस रुक जाती है…

  • आलसियों के महाराज (बाल कविता)

    भिन-भिन करती,
    मक्खियां आई!
    भी-भी करते,
    मच्छर लाई!

    गोलू बड़े ही मस्त मौला,
    जिन्न को झट से आवाज लगाई,
    मुस्कुराकर जिन गोलू से बोला,
    चैन से सोएं मेरे साईं,
    मच्छरदानी! अभी लगाई।

    भी -भी ,भिन-भिन,
    मच्छर कांटे!
    गिन -गिन ,
    गिन -गिन,
    सपनों की गहराइयों से,
    गोलू ने फिर की लड़ाई।

    ओ रे मच्छर!
    तुझको जरा-सी शर्म ना आई,
    तुझे ना आती, मुझे तो आती,
    नींदें मेरी बड़ी सुहानी,
    तुमने नालायक क्यों भगाई।

    ऊपर से ये मच्छरदानी,
    पास मेरे ये क्यों ना आई,
    आजा तनिक! लग जा ज़रा,
    मेरी चारपाई करें दुहाई ।

    और इतनी दूरियां अच्छी नहीं,
    चद्दर को उसने, तंज लगाई।

    तुम तो बहुत ही प्यारी हो,
    पैरों की मेरे दुलारी हो,
    ज़रा आ जाओ!
    मेरी चरण पादुकाओं!

    ओह ! ये शौचालय कितना दूर!
    निर्दई पापा ! क्यों बनवाईं।
    अचानक मां की आवाजें आई,
    सो गया बेटा!
    गोलू ने फिर दुबकी लगाई,
    सब्र से महसूस,
    किया ज़रा-सा,
    ओह ! आ गया मेरा, तिलस्मी जिन्न!

    मगर ये टॉयलेट,
    बड़ी खिसियानी ,
    नींद के पल में; जोर से आईं,
    क्या करूं ,क्या ना करूं!
    अब तो जाना; पड़ेगा भाई!
    😔😔😣🙄

    —मोहन सिंह मानुष

  • भाई दूज स्पेशल – “जिंदगी से रोज़ हार जाती हूँ मैं”

    भाई दूज स्पेशल:-💟💟

    ********************
    जब मैं छोटी थी
    तो तू ही था
    जो उंगली पकड़ता था मेरी
    गिरती थी तो
    तू संभाल लेता था
    हाँ, आज थोड़ी लम्बाई बढ़ गई है
    पर बुद्धी आज भी
    बच्चों जैसी है
    और भाई मैं चाहें जितनी
    बड़ी हो जाऊं
    तुझसे तो उतनी ही छोटी रहूंगी
    जब मैं गलती करूं तो
    डाट लेना पर नाराज मत होना
    भाई तुझे छोंड़कर कहीं
    नहीं जाऊंगी
    मेरी शादी कभी मत करना
    मैं तेरे साथ ही रहूंगी
    तू बड़ा है पर फिर भी
    रोज लड़ूगी
    एक तू ही तो है जिससे लड़कर
    जीत जाती हूँ मैं
    बाकी तो जिंदगी से रोज ही
    लड़कर हार जाती हूँ मैं…

  • सतर्क भारत समृद्ध भारत

    मुसीबत के दौर में सतर्कता ही
    हर संकट का हल होगा ।
    सतर्कता का लिबास पहन लो
    कल भविष्य तुम्हारा उज्जवल होगा ।
    समृद्ध भारत के राह का उद्गम
    है, स्वच्छ, सतर्क और जोश भरे समाज से ।
    बदल रही हैं फिजा देश की, युग बदलेगा
    विश्वास है, यह चल पड़ेंगे अपने अपनों की आवाज से।
    डिजिटल के इस दौर में
    हर काम बहुत आसान हुआ ।
    विश्व में भारत का अब
    मजबूत बहुत ही नाम हुआ ।
    अपडेट हो रहे बच्चे बूढ़े
    स्मार्ट हो गया है भारत अपना ।
    नामुमकिन अब कुछ भी नहीं
    खुली आंखों से देखो सपना ।
    वैर भाव की इतिश्री कर
    जागरूक हुआ हर हिंदुस्तानी ।
    अपनी भारत मां के संग
    किसी को ना करने देंगे मनमानी ।
    नियम ज्ञान की कमी के कारण
    किसी का सब कुछ बिखर गया
    वक्त के जो पाबंद रहे हैं
    जीवन उनका संवर गया ।
    मूल मंत्र का द्वार सतर्कता
    कोरोना की विषम परिस्थितियों में ।
    भारत की शान न कम होने देंगे
    हर हाल में हर स्थितियों में ।
    जीवन के चौराहों पर
    सिग्नल को मत ओवरटेक करो ।
    बदलते भारत की तस्वीर में
    अपने सपनों का तुम रंग भरो ।
    अपने कर्तव्यों के प्रति
    सतर्क रहें यदि हिंदुस्तानी ।
    विश्व में भारत का कभी
    मैला नहीं आंचल होगा ।
    सतर्कता का लिबास पहन लो
    भविष्य तुम्हारा उज्जवल होगा।

  • *गोवर्धन पूजा की कहानी*

    देवकी-नन्दन कृष्ण कन्हैया
    गोकुल में विराजे हैं
    नन्द-यशोदा के लाडले,
    मोर मुकुट, कानों में कुण्डल
    हस्त मुरलिया साजे है
    कुपित होकर इन्द्र ने
    जब जल बहुल बरसाया था,
    कनिष्ठा पे कृष्ण ने,
    गोवर्धन गिरि उठाया था
    इन्द्र कुपित थे…
    अपनी अवहेलना से
    गोवर्धन की पूजा हुई थी,
    बदले में उनकी पूजा के
    द्वापर युग में, इन्द्र ने,
    रौद्र-रूप दिखलाया था
    जल बहुत बरसाया था
    हुई थी भारी-भरकम वर्षा,
    कई दिवस की रात
    बृजवासियों का तब,
    कान्हा ने दिया था साथ
    उनकी रक्षा करने हेतु,
    कान्हा ने, गोवर्धन-गिरि उठाया
    तभी से कान्हा जी ने,
    गोवर्धन-धारी नाम पाया
    इन्द्र-देव ने हार थी मानी,
    यही है गोवर्धन-पूजा की कहानी

  • बुखार में मां की याद आई

    कविता-बुखार में मां की याद आई
    ——————————————-
    वर्ष बाद बुखार हुआ,
    मानों-
    अंतिम समय ने घेर लिया,
    चारों तरफ दिवाली का उत्सव था,
    हम लिए बुखार अपनी,
    कमरे में-
    खुद को कैद कर लिया,
    हमें क्या पता दीप कैसे जल गए,
    सुनते रहे कानों से,
    पटाखे साउंड की आवाज,
    कहीं मधुर तो, कहीं घोर आवाज हो गए,
    बल नहीं था मुझ में,
    छत पर चढ़कर दीपों का दीदार कर लूं,
    वर्ष बाद दिवाली आई,
    हम भी कुछ दीप जला दूं ,
    था रूम पर अकेला,
    कोई नहीं सहारा था,
    शिवाय मेरे होठों पर ,
    मम्मी मम्मी के सिवा ,
    ना कुछ नाम था,
    बहुत याद आती थी,
    मम्मी पापा की मुझे,
    होती अगर मां मेरी
    बुखार उतरे सर पर पट्टी रख देती,
    देख आंखों के आंसू मेरे,
    उठा आंचल अपना,
    खुदा से दुआएं मांग लेती ,
    मालिक ठीक हो जाए लाल मेरा,
    यह कहते-कहते खुद आंसू बहा देती,
    पोछती ना अपने आंखों का आंसू,
    कई बार मेरा हाल पूछ लेती,
    मेरे चेहरे पर हाथ फेर देती
    नाड़ी पकड़ कर बुखार जान लेती,
    मां तेरी कमी खलती मुझे,
    पराए शहर में-
    आपदा आती जब मुझपे,
    तरस जाता हूं-
    उस शाम रोटी के लिए,
    माँ…
    भूखे पेट लेटा हूं,
    ठंड के संग लिए बुखार रोता हूं,
    वो बचपन की बात याद आती है,
    जब हुआ था बुखार मुझे,
    रख कंधे पर ,तू दवा के लिए जाती है,
    देख चेहरे को मेरे,
    डॉक्टर से हाल पूछती,
    लॉज खाली था कोई नहीं था अपना,
    कौन हाल पूछे मेरा,
    बस यही बात सताती –
    इस अनजाने शहर में, कोई नहीं हैं अपना,
    खाकर पारले जी
    कुछ दवाई खा लिया,
    उतरकर फिर चढ़ी बुखार जब,
    हो सुबह-
    तब घर जाने के लिए मन बना लिया
    दुख मेरा दुगना हो जाता है,
    वो तेरा! दुआओं के संग प्यार देखके,
    बस आंखों में आंसू आ जाते हैं,
    जब उतरी बुखार मेरी,
    सारी यादों को लेकर,
    तेरा ‘ऋषि’ कविता लिखने लगता है,
    चंद पैसों शोहरत के लिए,
    माँ मैं तुमसे बहुत दूर हूं,
    आ देख जरा मेरी हालत को,
    बुखार में कितना मजबूर हूं
    ————————————
    **✍ऋषि कुमार ‘प्रभाकर’—-

  • घर के बाहर मौत खड़ी…!!

    बचकर चलो रे राही!
    घर के बाहर मौत खड़ी
    संभल चलाओ गाड़ी
    घर के बाहर मौत खड़ी….
    हेलमेट लगाकर
    बाहर निकलो
    सीटबेल्ट भी बांध के निकलो
    चौपहिया या हो दो पहिया
    आँखें चौकन्नी करके निकलो
    जरा भी सावधानी हटी तो
    समझो साहब! दुर्घटना आन पड़ी
    घर के बाहर मौत खड़ी…
    मास्क लगाओ भाई अब तो
    ट्रैफिक नियम बताओ सबको
    पालन करो और करवाओ
    वरना दुर्घटना आन पड़ी
    घर के बाहर मौत खड़ी….

  • ‘एक माटी का दीपक सिखा गया’

    एक माटी का दीपक सिखा गया
    खुलकर हँसना,
    हँसकर जीना,
    जीकर अपना सपना पूरा करना
    एक माटी का दीपक सिखा गया…..
    बोला प्रज्ञा !
    मत रो पगली
    आज तो है दीवाली अपनी
    मुझे जला तू रौशन कर दे
    अपना घर और अपना मन
    मुझमें जीने की
    अलख जगा गया
    एक माटी का दीपक सिखा गया….
    दीप जलाये मैंने कितने
    मुझको भी कुछ याद नहीं
    पिया मिले थे मुझको छत पर
    थोड़ा मुझको रुला गये
    दीप ने टिमटिम करके मुझको
    देखो कैसे हँसा दिया
    जी ले तुझमें है
    प्रज्ञा शक्ति !
    ऐसा मुझको बता गया
    फिर से जीना,
    फिर से हँसना
    एक माटी का दीपक सिखा गया…

  • घुट-घुट आँसू पीना है..

    मुझको तो बस तन्हाई में ही जीना है
    सिसक-सिसक कर रहना है
    घुट-घुट आँसू पीना है
    कोई ना समझा मेरी पीर को
    तो तुम क्या समझोगे !
    नहीं किया कभी प्यार किसी ने
    तो तुम क्या मुझको दिल दोगे !
    अब तो आदत हो चली पीर की
    अब तो पीर में ही जीना है…
    कोई ना समझा मेरी पीर को
    घुट-घुट आँसू पीना है…
    दिन हो मेरा रोते-रोते
    रात कटे करवटें बदलते
    मेरे नैना बरसें हर पल
    इनका ना कोई महीना है
    कोई ना समझा मेरी पीर को
    घुट-घुट आँसू पीना है…

  • सड़क के उस पार दीवाली

    दीवाली के दीप सजाने,
    जब आई मैं घर के द्वार
    तो मैंने देखा सड़क के उस पार,
    एक कुटिया में दो दीए टिमटिमा रहे थे
    रौनक भी कुछ ख़ास ना थी,
    एक बच्ची कुछ दूर खड़ी थी,
    मेरे घर के पास ना थी
    फ़िर मैं घर के भीतर आकर,
    कुछ फल,मिठाई, दीए,पकवान लेकर
    चल पड़ी उस ओर
    कानों में पड़ा कुछ शोर
    निकट जा रही थी उस कुटिया के,
    दूर से जो दीए, टिमटिमाते लग रहे थे
    वो अब मुस्कुराते लग रहे हैं
    दो बालक बाहर ही मिल गए,
    मुझे देख कर उनके मुख खिल गए
    उनकी मां भी बाहर आ गई,
    बोली,आपके आने से दीदी,
    मेरी कुटिया में बहार आ गई
    मेरा त्यौहार भी मन जाएगा,
    मेरे बच्चे भी खाएंगे मिठाई,वो बोली
    मैंने कहा, क्यूं नहीं, तुम्हें भी शुभ-दीवाली

    *****✍️गीता

  • खूब दीपक जल रहें हैं

    खूब दीपक जल रहें हैं
    जगमगाहट सब तरफ है,
    खिल रही खुशियाँ अनेकों,
    आज रौनक ही अलग है।
    धन-धान्य हो भरपूर
    सबकी कामनाएं गूंजती हैं,
    आज हर घर की उमंगें
    लक्ष्मी मां पूजती हैं।
    लोक में उल्लास है
    बच्चे पटाखों में मगन हैं
    घर-घर में गृहलक्ष्मी की
    चूड़ियों में
    अद्भुत खनक है।
    खूब दीपक जल रहें हैं
    जगमगाहट सब तरफ है,
    खिल रही खुशियाँ अनेकों,
    आज रौनक ही अलग है।

  • *शुभ दीवाली हो*

    दीवाली के दीप जले,
    हर-घर में ख़ुशहाली हो
    अपनों का प्यार मिले,
    ऐसी मंगल दीवाली हो
    जगमग-जगमग दीपों की माला
    चारों ओर करे उजाला,
    खुशियों की मुख पर लाली हो
    नीरोग रहें सभी जन,
    ऐसी शुभ दीवाली हो
    आंगन में सजी रंगोली हो,
    मां लक्ष्मी भी आकर बोली हो,
    इस घर से ना जाऊं इस बार
    सजाया कितना सुन्दर घर-द्वार,
    दीपों से सजी मेरी थाली हो,
    ऐसी मोहक दीवाली हो
    पकवानों से घर महके,
    आशीष मिले बुजुर्गों से,
    मां लक्ष्मी के आशीषों से
    कोई भी घर ना खाली हो
    ऐसी सुन्दर दीवाली हो ।

    *****✍️गीता

  • दीप ऐसा जलाओ

    दीप ऐसा जलाओ
    ************************

    ***********************
    दीप ऐसा जलाओ ऐ दिलबर
    हर तरफ रौशनी -रौशनी हो।
    न अमावस की हो रात काली
    हर निशा चांदनी -चांदनी हो।।

    कोई जलाए दीप कंचन का
    और जलाए कोई चांदी का।
    श्वेद सिक्त माटी ले वतन की
    दीप माला बने सुखराती का।।
    प्रेम का तेल निष्ठा की बाती
    ज्ञान की राह रौशनी रौशनी हो।। दीप ऐसा

    कोई मंदिर में जाके जलाए
    और जलाए कोई निज घरों में।
    कोई पनघट पे जाके सजाए
    और जलाए कोई चौडगरों में ।।
    एक दीपक ‘विनयचंद ‘ जलाना
    वीर के राह में रौशनी रौशनी हो।। दीप

    दिल में दीपक जला देशभक्ति के
    हो गए बलिदान जो वीर बेटे।
    कर विनयचंद ‘ वहाँ पर उजाला
    जहँ समाधि में हो वीर लेटे।।
    नाम उनके भी दीपक जलाओ
    हर कदम रौशनी रौशनी हो।। दीप ऐसा
    ********###***************
    पं. विनय शास्त्री ‘ विनयचंद ‘
    बस्सी पठाना (पंजाब)

  • *दीपावली अयोध्या की*

    नभ से सुर सब देख रहे थे,
    धरा पे कितने दीप जले
    “जय श्री राम”, के उद्घोष से,
    गूंजी अयोध्या, सरयू के तीरे
    लाखों की संख्या दीपों की,
    कौन कहे निशा अमावस की
    जगमग-जगमग हुई अयोध्या,
    नगरी है श्री राम की
    ज्योति-पर्व की इस बेला में,
    आलोकित हर मन का आंगन
    घर-घर दीप जले हिन्द में,
    आलोकित हर घर का आंगन
    हिन्द हर्षित हो उठा है,
    उल्लास की लहर चहुं ओर,
    लखन, सिया संग श्री राम पधारे
    नृत्य कर उठा मन का मोर
    भरत-मिलाप का दृश्य देख कर,
    हो उठे सब भाव-विभोर
    आज प्रसन्न हैं कौशल्या माई,
    राम लखन संग सीता आई

    *****✍️गीता

  • “कौमुदी से भरा प्याला”

    नम हैं लोचन
    तिमिर के
    चारों तरफ फैला उजाला
    चीरता तम को चला
    कौमुदी से भरा प्याला
    रात बैठी गगन में
    देख अचरज चकित थी
    आज धरती
    गगन से भी मनमोहक थी,
    स्वच्छ थी.
    आसमां में जितने सितारे नहीं !
    उतने दीप थे धरती
    पर जल रहे
    ‘राम जी की जय हो’
    ‘लक्ष्मी-गणेश आपका सुस्वागतम्-सुस्वागतम्’
    यह मानुष सभी थे कह रहे
    जोर डाला अपनी स्मृति पर
    तभी प्रशान्त ने
    भ्रमण कर सबको बताया
    दीपावली है हिन्द में….

    *******************
    “आप सभी को ‘प्रज्ञा शुक्ला’ की ओर से
    प्यार भरी दीपावली की हार्दिक शुभकामनायें”

  • मेरे हिस्से में अभी कुछ साँस बाकी है…

    सुबह होने में अभी
    कुछ रात बाकी है
    सो जाने दो मुझको जरा
    कुछ रात बाकी है….

    मुझको टूटकर बिखरने में
    लगेगा कुछ और वक्त !
    क्योंकि मुझमें अभी कुछ आस बाकी है….

    वो मुझसे खफा हो बैठा है
    एक बात पर
    सुबह उठकर कर लेंगे सुलह
    अभी तो कुछ रात बाकी है….

    पी ली है मैंने
    नशे में झूमता सारा जहान
    सुबह घर जाऊंगा
    अभी कुछ रात बाकी है….

    आ गया मेरा बुलावा
    रुक जा ओ यमराज ! तू
    जी लेने दे मुझको जरा
    मेरे हिस्से में अभी कुछ साँस बाकी है…

  • श्रीराम भजन – प्रभु श्रीराम आएंगे|

    श्रीराम भजन – प्रभु श्रीराम आएंगे|
    जला लो हर घर मे दिया आज श्रीराम आएंगे|
    काट बनवास संग सीता आज भगवान आएंगे |

    किया बद्ध दैत्यो का मानव उद्धार किया |
    खाकर जूठा बैर सबरी संदेश संसार दिया |
    चढ़ बीमान पुष्पक मार्ग वो आसमान आएंगे |
    जला लो हर घर मे दिया आज श्रीराम आएंगे|

    मनाओ सब दिवाली घर भी सजालो अपना |
    जगमग हर गाँव शहर द्वार लिपालो अपना |
    सजाओ फूलो से अयोध्या देव मेहमान आएंगे|
    जला लो हर घर मे दिया आज श्रीराम आएंगे|

    मारकर रावण को लंका मे सीता को छुड़ाया है |
    किया अधर्म का नास राज विभीषण दिलाया है |
    आज सब मिलकर सियाराम गुणगान गाएँगे |
    जला लो हर घर मे दिया आज श्रीराम आएंगे|

    करेंगे श्रीराम जब कृपा घर लक्ष्मी वास होगा |
    बढ़ेगी शुख शांति रिद्धी सिद्धि निवास होगा |
    गाओ श्रीराम का भजन बन धनवान जाएँगे |
    जला लो हर घर मे दिया आज श्रीराम आएंगे|

    श्याम कुँवर भारती (राजभर)
    कवि /लेखक /गीतकार /समाजसेवी
    बोकारो झारखंड मोब -9955509286

  • माटी के दीपक

    मै नन्हा सा दीपक माटी का
    घी संग बाती जब दहकूं
    खिलखिला कर हसूं
    चांद के जैसे इतराऊं
    तम को गटागट पी जाऊँ
    शांत नदिया सा जगमगाऊं
    आखिरी सांस तक सपने सींचू……

    तु भी तो पुतला माटी का
    तु मन में आशा का दीप जला
    प्रेम का घी, सदकर्मो की बाती दहका
    भीतर के तम से लड़ जा
    खुशियाँ जी भर के बिखरा
    किसी के गमों मे शरीक हो जा
    बैर-भाव मिटा
    तु भी मुझ-सा कर्म कमा
    दीपावली का सच्चा अर्थ समझा ।

  • मैथिली गीत

    सगरों साल बहानेबाजी
    आय नञ चलत सजना।
    धनतेरस में चांदी नाही
    चाही सोनक गहना।।
    पैरक पायल नहियें लेबय
    लेबय हाथक कंगना।
    धनतेरस में चांदी नाही
    चाही सोनक गहना।।
    नञ औंठी न लेबय नथिया
    कर्णफूल नञ चाही।
    सब कंजूसी छोड़ि छाड़ि केॅ
    जुनि करू कोताही।।
    चमचम हीरा मोती लागल
    लेबय सोनक कंगना।
    धनतेरस में चांदी नाही
    चाही सोनक गहना।।
    हम कोनो उपहार न मांगी ।
    नौलक्खा हम हार न मांगी। ।
    ‘विनयचंद ‘हम अहीं के प्यारी
    नञ छी कोनो अदना।
    धनतेरस में चांदी नाही
    चाही सोनक गहना।।

  • आई शुभ दीवाली..

    आई शुभ दीवाली देखो
    आई शुभ दीवाली
    टिमटिम करते देखो दीपक
    आई शुभ दीवाली
    धनतेरस को खूब खरीदा
    हमनें सोना-चाँदी
    सज-धज देखो
    लक्ष्मी माँ आई
    आई शुभ दीवाली
    नर्कचतुर्दशी को हमने झाड़ा
    घर का कोना-कोना
    ओ लक्ष्मी माँ !
    हम पर अपनी कृपा बनाये रखना
    दीपावली में हमनें गणपति संग
    लक्ष्मी जी को बुलाया
    रामचन्द्र जी के शुभआगमन पर
    सौहार्द से त्योहार मनाया
    हर गली सजाई दीपों से
    फूलों से सजाई थाली
    आई शुभ दीवाली
    देखो आई शुभ दीवाली
    गोवर्धन पूजा पर माँ ने
    कृष्ण जी को कर जोड़ मनाया
    भाई दूज पर मैंने कर दी मैंने
    भाई की जेबें खाली
    आई शुभ दीवाली
    देखो आई शुभ दीवाली…

    काव्यगत सौंदर्य और समाज में योगदान:-

    यह कविता मैंने दीपावली के सभी कार्यक्रमों को ध्यान में रखकर लिखी है.
    इस कविता के माध्यम से मैंने दीपावली के सभी पर्वों के दर्शन कराये हैं.
    और हिन्दू परंपरा के अनुसार धनतेरस, नर्कचतुर्दशी एवं दीपावली पर राम और लक्ष्मी गणेश जी के आगमन को प्रमुखता दी है..
    गोवर्धन पूजा पर कृष्ण जी के द्वारा जो गोवर्धन पर्वत उठाकर इन्द्र का घमण्ड तोड़ा गया उसे
    गोवर्धन पूजा के रूप में मनाया जाता है..
    भाई दूज पर भाई-बहन के प्रेम को दर्शाया गया है..जो यम द्वितीया के रूप में जानी जाती है इसदिन मान्यता है कि बहन के घर का भोजन खाने से भाई की उम्र बढ़ती है और उसे यमराज जी का कोप सहन नहीं करना पड़ता उसे मृत्यु पश्चात यमराज लेने नहीं आते..
    मेरा यह कविता हिन्दू धर्म का पवित्र संदेश देती है

  • कविता :दीपों का त्यौहार

    दीपों की जगमग है दिवाली
    दीपों का श्रृंगार दिवाली
    है माटी के दीप दिवाली
    मन में खुशियाँ लाती दिवाली ||
    रंगोली के रंग दिवाली
    लक्ष्मी संग गणपति का आगमन दिवाली
    स्नेह समर्पण प्यार भरी
    मिठास का विस्तार दिवाली
    अपनों के संग अपनों के रंग में
    घुल जाने की प्रीति दिवाली
    हाथी घोड़े मिट्टी के बर्तन
    फुलझड़ियों का खेल दिवाली ||
    जब कृष्ण ने बजाई थी बांसुरी
    होली के रंग छलके थे
    राम राज्य के आगमन से
    झिलमिल तारे चमके थे
    ईश्वर प्रदत्त वरदान है ये
    मिलकर पर्व मनाते हैं
    तन में तिमिर न आए फिर से
    ज्योतिर्गमय मन को बनाते हैं
    तम को दूर भगाकर
    प्यार का रास रचती दिवाली
    फूलों की खुशबू में ,चंदन सी खुशबू दिवाली ||
    ‘प्रभात’ जग में कैसी रीति है आई
    लोगों ने जाति धर्म से है प्रीति लगाई
    मन्दिर मस्जिद हों भले अनेक
    ईश्वर तो सिर्फ एक है भाई
    जाति धर्म की रीत पाटकर ,बनो सभी भाई भाई
    आओ ,मन मुटाव से दूर निकलकर
    आशा के दीप जलाते हैं
    जिसमें सभी संग दिखें
    कुछ ऐसी तस्वीर बनाते हैं
    जो जीवन के पथ में हैं भटके
    उनको नई राह दिखलाते हैं
    आओ मिल जुल कर
    दीपावली मनाते हैं ||

  • “आखिर दीवाली उनकी भी तो है”

    चाइनीज झालर नहीं
    दीये जलाओ
    किसी गरीब के घर रोशनी करके
    दीपावली मनाओ
    झुग्गी, झोपड़ी वालों के भी अरमान होते हैं
    किसी एक के घर में प्रकाश तुम फैलाओ
    यूं तो अरबों की बारूद में
    तुम आग लगा देते हो
    किसी के घर का इस बार
    अंधकार तुम मिटाओ
    पटाखे जलाने से भी ज्यादा
    सुख मिलेगा तुम्हें
    एक बार किसी गरीब की
    भूख तुम मिटाओ
    हमेशा मनाते हो तुम दीवाली
    शानों शौहकत से
    इस बार दीपावली
    साधारण तरीके से मनाओ
    चाइनीज शो-पीस से नहीं
    इस बार दीप और मोमबत्ती
    जलाकर दीपावली मनाओ
    यकीन मानो
    जब तुम दीये किसी गरीब से
    खरीदोगे
    बड़ा चैन आयेगा
    एक बार दीपावली
    कुछ ऐसे ही मनाओ
    “आखिर दीवाली उनकी भी तो है”
    इस बार किसी गरीब की मुस्कान बन जाओ…

  • *अरमानों को पलते देख लिया*

    मिठाई की दुकान से कुछ दूर,
    एक निर्धन बालक को
    मैंने कुछ सिक्के गिनते देख लिया
    हां, मैंने उस बालक की आंखों में,
    एक सपना पलते देख लिया
    चाह उसे भी होती होगी,
    नए वस्त्र पहनने की
    उसकी उसी पुरानी कमीज़ को,
    मैंने धोते-सुखाते देख लिया
    मैंने पूछा बेटा कुछ लोगे क्या,
    वो शरमा कर भाग गया
    मैंने उसकी नन्हीं आंखों में,
    स्वाभिमान को पलते देख लिया
    फ़िर अपनी मां के संग,
    उसको मैंने दिए बेचते देखा
    मैंने उस बालक के मन के,
    अरमानों को पलते देख लिया
    हम अपने घरों को
    रौशन करने में व्यस्त रहे,
    उस निर्धन बालक को
    औरों के घरों की चमक देख कर,
    ख़ुश होते मैंने देख लिया..

    *****✍️गीता

  • “शुभ-दीवाली हो”

    दीवाली की धूम मची है,
    रौनक है बाजारों में
    लेकिन तुम भूल ना जाना,
    सुन्दर-सुन्दर दिए बनाए
    अपने देश के कुम्हारों ने
    दिए मोल ले कर उनसे तुम,
    उनका भी पर्व मनवा देना
    महीनों मेहनत की होगी,
    तब जाकर इतने दीप बने
    तुम्हारा घर भी रौशन होगा,
    उनके घर भी पर्व मने
    उनके भी बच्चे खाएं मिठाई,
    उनके मुख पर भी लाली हो
    जगमग उनका भी घर चमके,
    उनकी भी शुभ-दीवाली हो

    *****✍️गीता

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