Tag: संपादक की पसंद

संपादक की पसंद

  • मीठी सी ताजगी हो

    आँखों को खोल दे जो
    ऐसी ही ताजगी हो
    तुम तो सुबह की चाय सी
    मीठी सी ताजगी हो।
    बाहर निकल के देखा
    पौधों में ओस सी हो,
    तुम ही तो जिन्दगी में
    सचमुच के जोश सी हो।
    आनन्द है तुम्हीं से
    जीवन सुखद तुम्हीं से,
    प्राणों का धन तुम्हीं हो
    एकत्र कोष सी हो।
    खुशबू हो फूल की तुम
    रवि का उजाला हो तुम
    हो टेक जिंदगी की
    आधार ठोस सी हो।
    —– सतीश चंद्र पाण्डेय, चम्पावत, उत्तराखंड

  • कविता : वंदे मातरम का ,फिर से अलख जगाना होगा

    इधर चुनावों की हलचल है और कुर्सियों की टक्कर
    उधर बुझ रहे माँ के दीपक ,जलते जलते सरहद पर
    क्या होगा ऐसी कुर्सी का
    जनता की मातमपुर्सी का
    सत्ता के इन भूंखे प्यासों को
    अब तो कुछ समझाना होगा
    वंदे मातरम का ,फिर से अलख जगाना होगा ||
    कितना कष्ट सहा घाटी ने
    कितना खून बहा माटी में
    कितनी मिटी मांग की लाली
    कितनी गोद हो गयी खाली
    हिमगिरि के हर कण कण को
    ज्वालामुखी बनाना होगा
    वंदे मातरम का ,फिर से अलख जगाना होगा ||
    गाँधी के सपनों का भारत
    झोपड़ियों में सिसक रहा है
    मर्यादा ,विश्वास अहिंसा
    सत्य दृगों में सिमट रहा है
    मेहनतकश हाथों में अविरल
    अब तो विश्वास जगाना होगा
    वंदे मातरम का ,फिर से अलख जगाना होगा ||
    ‘प्रभात ‘ भ्रष्टाचार लोगों की ,अब नश नश में समाया है
    बिन मेहनत किये घर में ,देखो कितना धन आया है
    आज ,सड़क जाम और शोर शराबा
    सब घटना के बाद हुआ है
    बिक जाते हैं सारे प्यांदे
    धन का यूँ उन्माद हुआ है
    कितने भूंखे पेट से सोये
    तंग हाल बेकार फिरे हैं
    संसद में जिन्हे चुनकर भेजा
    भ्रष्टाचारी कुछ उनमें निकले हैं
    कैसे सुधरे देश हमारा
    लोग सोंच रहे ,पर डरे डरे हैं
    पश्चिम के रंग ढंग अपनाकर
    पाल लिये विषधर काले हैं
    रहबर की रहजन बनकर
    ये वतन का सौदा करते हैं
    मीर जाफर और जयचन्दों का
    ये अनुसरण करते हैं
    इनकी इन हरकतों का
    अच्छा सबक सिखाना होगा
    वंदे मातरम का ,फिर से अलख जगाना होगा ||

  • माता-पिता

    मेरे हर प्रश्न का जवाब है मां
    मेरे हर दर्द का इलाज है मां
    भीड़ में भी जो पहचान लेती है
    अपने बच्चों की हर एक आहट
    ऐसी अनपढ़ी, अनलिखी एक किताब है मां
    मेरे हर प्रश्न का जवाब है मां
    मेरे पापा सबसे अच्छे
    प्रणाम करते हम सब बच्चे
    बाहर से सख्त भले ही हो
    मगर अंदर से नरम होते हैं
    जो हार को जीत में बदलने की सीख देते हैं
    हौसला बढ़ाते हैं, मार्गदर्शक बन आगे आते हैं
    वही तो सचमुच में पिता कहलाते हैं
    जब जब दुनिया में आए हम
    आप ही मेरे जनक बनो
    रब से बस यह मांगा है
    हर जन्म में मां तेरी कोख मिले
    इर्ष्या क्रोध छल कपट की गठरी
    आज भी नहीं उठाते हम
    आप ना देते गर ऐसी शिक्षा
    तो संस्कार कहां से पाते हम
    हवा हैं पापा तो बैलून है मां
    बिन दोनों, हम सब का उड़ना मुश्किल है
    त्याग और संस्कार के दम पर
    मुकाम वह पाया जो काबिल है
    माता-पिता के कदमों में
    बच्चों का सारा जहान है
    सबके सीता-राम होंगे
    हम सब भाई-बहनों के
    मां-बाप ही भगवान हैं
    मां-बाप ही भगवान हैं
    वीरेंद्र सेन प्रयागराज

  • मन के घाव

    मन के घाव भी भरने जरूरी हैं
    तेरे-मेरे नैन भी मिलने जरूरी हैं
    आकाश से धरती के जो हैं फासले तय हैं
    बरस कर बूंद तुझमें ऐ जमीं !
    मिलना जरूरी है…

  • बेटी हुई पराई

    बेटी हुई पराई देखो बेटी हुई पराई,
    यह कैसी ऋतु आई देखो बेटी हुई पराई
    मेरे आंगन के पौधे की डाली
    बड़ी ही नाजुक नाजुक सी
    वह थोड़ी नखरेवाली,
    मेरे आंगन में जब वह आई
    मुझे लगी बहुत ही प्यारी
    मेरे मन को बहुत सुहाई
    आज विदाई की इस बेला में,
    देखो आंख मेरी भर आई
    मेरी आंखों से मोती बरसे
    ये मोती मैं तुझ पर वारूं,
    आजा तेरी नजर उतारूं
    बेटी जो चाहे सो ले जा
    पर एक चीज मुझे भी दे जा,
    यही छोड़ जा अपने नखरे
    कहीं किसी को ये ना अखरें
    नखरे छोड़ के जब तू जाएगी
    देख तू कितना सुख पाएगी
    मेरी है बस यही दुआएं
    तू जहां भी जाए खुशियां पाए
    तू जहां भी जाए खुशियां पाए

    *****✍️गीता

  • मंगलसूत्र; सुहाग का प्रतीक

    मंगलसूत्र को सुहाग का प्रतीक
    माना जाता है
    जाने क्यों ऐसा कहा जाता है??
    बचपन से यही सोंचती थी मैं पर
    आज देख भी लिया अपनी आँखों से;
    एक विधवा स्त्री के सामने आने पर
    लोगों ने उसे अशुभ ठहराया
    ताने उसको मार-मार कर
    फौरन वहां से उसे भगाया
    तभी सामने से कुछ सुहागन
    पूजा को सज-धज निकलीं
    लोग उन्हें देखकर सुखी थे
    मन ही मन निश्चिंत हुए थे
    कि विधवा स्त्री को देखने के बाद
    कुछ तो अच्छा शगुन हुआ
    मंगलसूत्र और सुहाग के प्रतीक चिह्नों
    के महत्व का तब मुझको एहसास हुआ…
    पर मन में एक टीस उठी
    क्या इनका महत्व इतना ज्यादा है !!
    विधवा स्त्री का चेहरा भी क्या इतना
    अभागा है??

  • दहेज प्रथा एक अभिशाप

    दहेज प्रथा एक अभिशाप
    **********************
    बूढ़ा बाप अपनी पगड़ी तक निकालकर
    दे देता है और
    माँ अपने कलेजे का टुकड़ा
    पर फिर भी नहीं भरता
    लोभियों का मन
    जाने क्या लेना चाहे वो ?
    समझते क्यों नहीं इस बात को वह
    दुल्हन ही दहेज है
    कब समझेंगे
    जो तड़पाते हैं गैरों की लड़की को
    वह एक दिन अपनी लड़की भी
    दूजे घर भेजेगें
    दहेद प्रथा है समाज का अभिशाप
    यह लोभी लोग कब समझ पाएगे
    हिसाब होगा अच्छे-बुरे कर्मों का वहां
    जब दुनिया छोंड़कर
    पैसे के लोभी जाएगे…

  • शहादत को नमन

    शत्रु को तोड़ कर लेटा,
    तिरंगा ओढ़ कर बेटा
    भारत मां की हर मां का ,
    सीना फटता जाता है
    जब किसी का लाल तिरंगा ,
    ओढ़ के आता है
    बूढ़े बाप ने देखा जब,
    तो आंखों से आंसू निकल गए
    बोला मेरी लाठी टूटी,
    कैसे अब जिया जाए
    दो मासूम पूछे मां से,
    पापा क्यों खामोश से हैं
    हमें पुकारते भी नहीं है,
    नींद में क्यों आए हैं
    पत्नी का सिंदूर मिटा जब,
    मुंह को कलेजा आ गया
    बिंदी भी हटा दी उसकी,
    कंगन भी उतार दिया
    आंखें सबकी हो गई नम,
    तिरंगे में लिपट कर जो आए
    उनकी शहादत को नमन

    *****✍️गीता

  • मिठास बढ़ने दे

    रागिनी गा दे
    या गाए बिना सुना दे
    भीतर है जो उबाल
    उसे बाहर निकलने दे।
    मन की जुल्फों को उलझने दे
    दिल की लगी को चारों ओर
    बिखरने दे।
    उसकी तपिश से बर्फ पिघलने दे।
    हिलोरे उठने दे,
    फलों की मिठास बढ़ने दे,
    अपनेपन का अहसास होने दे
    खुशी के आंसू रोने दे,
    अधखिले फूल खिलने दे।
    त्रिपुट में लगाने को
    जरा चन्दन घिसने दे,
    ठण्ड में अधिक ठंड का
    अहसाह करने दे,
    यूँ जकड़े न रह
    जरा हिलने-डुलने दे।

  • **आज उसी वृद्धाश्रम में***

    छोंड़ दो इस बुढ़िया को
    किसी वृद्धाश्रम में
    यह सुनकर मुझको थोड़ा गुस्सा आया
    एक दिन फिर तंग आकर पत्नी से
    वृद्ध माँ को आश्रम मैं छोंड़ आया
    रोया बहुत माँ से लिपटकर
    माँ का दिल भी भर आया
    माँ ने आँसू पोंछे अपने आंचल से
    और उनको मुझ पर प्यार आया
    बोली बेटा आते रहना
    अपने घर का भी खयाल रखना
    मत रोना मुझको याद करके
    मेरे लिए बहू से मत लड़ना
    मेरा क्या है
    मैं कब मर जाऊं
    तू रहना खुश और आते रहना
    यह कहकर माँ ने कर दिया विदा…
    आज उसी वृद्धाश्रम में
    मैं भी आ गया रहने के लिए सदा
    मेरा बेटा भी मुझे बोझ समझकर
    मुझे यहां छोंड़कर हो गया दफा…

  • जला दिया क्यों मुझको साजन ???

    जला दिया क्यों मुझको
    ओ साजन!
    ऐसी क्या गलती कर बैठी थी
    मैं तो अपने सास-ससुर की पूजा देवों सम करती थी
    ननद को अपनी बहन की तरह मानती थी
    देवर को भैया कहती थी
    जला दिया क्यों मुझको साजन
    मैं तो तेरी धर्मपत्नी थी
    तुम जो कहते थे वो करती थी
    तुम्हारी ज्याती भी सहती थी
    देखा करती थी पराई स्त्रियों के संग में
    पर फिर भी मैं चुप रहती थी
    तेरी छाया देख के मैं घूंघट करके पीछे चलती थी
    जला दिया क्यों मुझको साजन !
    मैं भी तो एक इंसान ही थी…

  • अब तुम्हारे हवाले वतन साथियों…

    जख्म अपनों ने दिल पे
    हर बार कर दिये
    अपने ही शहर के बच्चों ने
    हम पर पथराव कर दिये
    दर्द उस दम बढ़ा मेरा ऐ हिन्दुस्तानियों !
    जब हमारी कुर्बानी पर भी
    सियासत के शकुनि
    राजनीति के दांव चल दिये
    हम हिन्द के रक्षक हैं
    किसी पार्टी के भाड़े के टट्टू नहीं
    हम तो तिरंगे में लिपटकर
    उस पार चल दिये
    ये देश हमारा है और हम इसके सपूत
    हे युवाओं ! हम देश की बागडोर
    तुम्हारे हाथ में सौंपकर
    अब यार चल दिये….

  • ‘आज तुमने मुस्कुराकर बात की’

    आज तुमने मुस्कुराकर बात की
    कुछ रोने वाली और
    कुछ हँसने वाली बात की,
    अच्छा लगा मुझको तुम्हारा
    झगड़ा करना भी
    खुशी इस बात की है कि तुमने हमसे बात की…

  • “अब दिल्ली दूर नहीं”

    किसानों ने ‘अब दिल्ली दूर नहीं’
    यह नारा सत्य कर दिखाया है
    पूरे देश को अपनी व्यथा से
    रूबरू करवाया है
    पर कुछ सियासत के घोंड़ो के
    कान पर जूं नहीं रेंगता है
    सारा देश देख रहा पीड़ित किसान
    पर सरकार को दिखाई नहीं पड़ता है
    पानी की बौछार करें कभी
    आँसू गैस का छिड़काव करें
    पर किसान के हौसले को
    कोई हथियार ना छलनी कर सके
    तुम डटे रहो बस अड़े रहो
    देखो अब दिल्ली दूर नहीं
    तुम्हारे साथ है देश की शक्ति
    तुम हो इतने कमजोर नहीं…

  • गुरु-पर्व

    संवत् 1526
    29 नवंबर 1469
    कार्तिक पूर्णिमा के दिन,
    पंजाब के तलवंडी गांव में
    गुरु नानक जी ने जन्म लिया
    जाना गया ये नाम ननकाना साहब नाम से,
    वर्तमान में है जो पाकिस्तान में
    सिख धर्म के प्रथम गुरु हैं
    आज इनका जन्म दिवस है,
    प्रकाश-उत्सव और गुरु-पर्व है
    पिता का नाम मेहता कालू था
    माता तृप्ता देवी थीं और
    बहन का नाम नानकी था
    विवाह हुआ 1485 में,
    पत्नी का नाम था सुलक्षिणी देवी
    दो पुत्र रत्न हुए नानक जी के
    श्री चंद और लक्ष्मी चंद
    गुरु नानक जी के कुछ मुख्य कथन:–
    मनुष्य को मनुष्य नहीं रहने देता है अहंकार
    इसी लिए गुरु नानक जी ने,
    मंत्र दिया ” एक ओंकार”
    गुरु बिन मानव दुखी रहे,
    गुरु मिल जाए तो सुखी रहें
    धन-माया का स्थान हो,
    केवल अपनी जेब में,
    ह्रदय में माया मत रखो,
    ये ज्ञान दिया है नानक ने
    स्वयं पर रखो पूरा विश्वास,
    तभी प्रभु करेंगे पूरी आस
    प्रभु की कृपा से ही मोक्ष मिले,
    गुरु नानक जी का ये पैगाम
    इसीलिए इस जग में,
    गुरु नानक जी का ऊंचा नाम
    अनमोल हैं उनके ये वचन
    आज उनके जन्म-दिवस पर,
    गुरु नानक जी को मेरा
    शत् शत् नमन

    *****✍️गीता

  • ये कैसा कलयुग आया है ???

    हे राम तुम्हारी दुनिया में
    ये कैसा कलयुग आया है…!!
    *************************
    कहीं जल रहे दीप तो देखो
    कहीं अंधेरा छाया है
    हे राम ! तुम्हारी दुनिया में
    ये कैसा कलयुग आया है…!!
    तज रहे प्राण मानव देखो
    कटते जाते जंगल देखो
    बेघर होते पक्षी देखो
    सड़कों पर रोते बच्चे देखो
    देखो तुम मरते किसान को
    जीवित तुम रावण देखो
    बोया था तुमने जो बीज कभी
    उसमें फल देखो कैसा आया है ?
    हे राम ! तुम्हारी दुनिया में
    ये कैसा कलयुग आया है…!!

    सड़कों पर लुटती सीता देखो
    घर-घर में बैठा विभीषण देखो
    देखो तुम कपटी शकुनी को
    मन्दिर में बैठा ढोंगी देखो
    मानव तो हे केशव ! अब तो
    दानवता पर उतर आया है
    हे राम ! तुम्हारी दुनिया में
    ये कैसा कलयुग आया है…???

    काव्यगत सौंदर्य एवं विशेषताएं:-
    यह कविता मैंने किसानों पर हो रहे अत्याचार और नारियों के प्रति निम्न दृष्टिकोंण रखने वालों के ऊपर आक्रोश में लिखी है….
    अच्छे दिन आने वाले हैं का नारा लगाने वालों के नेत्रों को खोलने के लिए व्यंगात्मक शैली में लिखी है…
    शब्द तथा भावों के तारतम्य को बनाए रखने का पूरा प्रयास किया है एवं पाठक की मानसिकता को ध्यान में रखते हुए लिखा है जिससे उसे यह कविता पढ़ने में कोई कठिनाई ना महसूस हो और अंत तक उसकी जिज्ञासा बनी रहे…
    उम्मीद है यह कविता समाज की कुत्सित सोंच को बदलने में सहायक होगी…

  • हे क्षेत्रपाल..!!

    मेरे देश के किसान !
    मत हो परेशान
    यह बुरा वक्त भी टल जाएगा…
    जिसने जो बोया है
    वो वैसा ही फल पायेगा
    सुना तो होगा तुमने भी;
    बुरा वक्त सिर्फ हमारे
    सब्र का इंतेहान लेने आता है
    कुछ हानि कराता है तो
    कुछ सिखलाकर भी जाता है
    मत रो तुम, मत हो उदास
    तुम्हारे अश्कों से ना पिघलेगा
    पथ्थर दिल हे क्षेत्रपाल !
    तुम लगे रहो बस डटे रहो
    मत रखना कदम अब पीछे तुम
    तेरे स्वेद और हिम्मत से तो
    यह अम्बर भी झुक जाएगा…

  • *कसम से*

    *कसम से*
    अब आप बिन रहा नहीं जाता
    किसी से कुछ कहा भी नहीं जाता
    हर पल आपकी कमी महसूस होती है
    हर दम अधूरी जमीं महसूस होती है
    कितनी भी मसरूफ़ रहूं,
    एक आहट सी आती है
    सूखे पत्तों सी बिखर जाती हूं
    तस्वीर तुम्हारी देख कर निखर जाती हूं
    आपकी यादें सुबह से शाम कर देती हैं,
    सच पूछो तो परेशान कर देती हैं
    यादों से कहो, यूं ना आया करें,
    हमें हरदम यूं ना सताया करें
    निशा का तीसरा पहर हो रहा है,
    देखो ना सारा संसार सो रहा है
    जब सारा जहां आराम करता है,
    ये चमकता चांद हमें परेशान करता है ।।

    *****✍️गीता

  • ऐ जाते हुए लम्हों…!!

    ऐ जाते हुए लम्हों !
    मुझको भी साथ में ले लो
    तुम संग मैं भी मिल लूंगा
    अतीत के मीठे सपनों से
    खो जाऊंगा मैं फिर से
    बिखरी-बिखरी जुल्फों में
    उन खुशबू वाली सांसों में
    एहसास अलग होता था
    मैं भूल जाता था सबकुछ
    जब पास में वह होता था
    ऐ लम्हों जरा ठहरो !
    चलने दो संग में अपने
    जो अधूरे रह गये सपने
    पूरे करने दो, संग चलने दो…

  • कविता : वो सारे जज्बात बंट गए

    गिरी इमारत कौन मर गया
    टूट गया पुल जाने कौन तर गया
    हक़ मार कर किसी का
    ये बताओ कौन बन गया
    जिहादी विचारों से
    ईश्वर कैसे खुश हो गया
    धर्म परिवर्तन करने से
    ये बताओ किसे क्या मिल गया
    जाति ,धर्म समाज बंट गये
    आकाओं में राज बट गये
    आज लड़े कल गले मिलेंगे
    वो सारे जज्बात बंट गए ||

    नफरतों की आग में
    यूँ बस्तियां रख दी गईं
    मुफ़लिसों के रूबरू
    मजबूरियां रख दी गईं
    जीवन से मृत्यु तक का सफर ,कुछ भी न था
    बस हमारे दिलों में
    दूरियां रख दी गई
    लोगों ने जंग छेड़ी
    जब भी कुरीतियों के खिलाफ
    उनके सीने पर तभी
    कुछ बरछियाँ रख दी गईं ||

    मुजरिम बरी हो गया
    सबूत के अभाव में
    देखो न्याय की आश में
    कितनी जमीनें बिक गईं
    बेकारी में पीड़ित है
    देश का हर कोना
    फिज़ा -बहार ,धूप -छांव
    यूँ ही बदल गई
    लोगों ने जब कभी , एकता का मन किया
    धर्म की दोनों तरफ ,बारीकियां रख दी गईं ||

    ‘प्रभात ‘ भूमिकाएं अब नेताओं की ,श्यामली शंकित हुई
    मुस्कान के सूखे सरोवर ,भ्रष्ट हर काठी हुई
    दिन के काले आचरण पर ,रात फरियादी हुई
    रोशनी भी बस्तियों में ,लग रही दागी हुई
    डगमगाती है तुलायें , पंगु नीतियां हुई
    असली पर नकली है भारी ,मात सी छायी हुई ||

  • वृक्ष कहे रोकर पृथ्वी से….!

    वृक्ष कहे रोकर पृथ्वी से
    हे वसुधा ! मैं हूँ भयभीत
    बोया मुझको प्रेम से किसी ने
    रोपा और दिया आशीष
    पर जाने कब चले कटारी
    मेरे चौंड़े वक्षस्थल पर
    आज मैं देता हूँ छाया सबको
    और देता हूँ मीठे फल
    जाने कब कट जाऊं मैं भी
    अपने साथी वृक्षों सम
    रोंक सकूं मैं मानुष को
    मुझमें ना है इतना दमखम
    जला लकड़ियां मेरी जाने
    कितने घरों में बने भोजन
    मुझको ना काटो हे मानुष !
    देता हूँ मैं तुमको आक्सीजन…

    शुद्ध करूं मैं वायु तुम्हारी
    और मिटाऊं भूख तुम्हारी
    लेता ना बदले में कुछ भी
    बस केवल बक्श दो जान हमारी….

  • न दिखे

    हमें मालूम होता अगर
    उनकी आदत है रूठ जाने की
    तो हम कभी परवाह ना करते
    इस जमाने की ।
    तोड़कर दुनिया की
    सारी रस्में कसमें
    चले आते तेरे पहलू में
    दिल अपना रखने ।
    अगर जिंदगी के सफर में
    आप मेरे संग होते
    तो इस तरह से मेरे ख्वाब
    ना बेरंग होते ।
    उन्हें तलाशने में हम
    एक जिंदगी में सौ बार बिके
    घूंघट की आड़ से
    हर तरफ देखा उन्हें
    किसी ओर भी ना दिखे।
    वीरेंद्र सेन प्रयागराज

  • जवां दर्द

    तन्हाई के आलम में घुट-घुटकर
    जब दर्द जवां होता है
    चाहत में खिले फूलों का
    पत्थर पर निशां होता है ।
    टूट कर बिखरने से पहले
    यूं बाहों में समेट लेते हैं
    जैसे धरती को समेटे
    सारा आसमां होता है।
    सच है कि दूर रहने से प्यार बढ़ता है
    चुप रहने की कसम खा कर भी
    राज ए इजहार बयां होता है।
    जवां दिल को तड़पने दूं
    या कुछ घड़ी आराम दे दूं
    सोचकर लम्हें मोहब्बत के
    वक्त पर गुमां होता है ।
    नींद आती नहीं चैन भी खोया सा है
    प्रेम के रोग में ना जाने
    ये दर्द कहां -कहां होता है ।
    चाहत में खिले फूलों का
    पत्थर पर निशां होता है
    तन्हाई के आंगन में घुट-घुटकर
    जब दर्द जवां होता है ।
    वीरेंद्र सेन प्रयागराज

  • *सोनू की चॉकलेट*

    सोनू एक प्यारा बच्चा था,
    मन का बिल्कुल सच्चा था
    चॉकलेट खाने का मन
    करता था सोनू का
    पर मम्मी से वो डरता था
    इसीलिए सोनू चॉकलेट की,
    विंडो शॉपिंग करता था ।
    दूर-दूर से देख के चॉकलेट,
    मन ही मन सोचा करता था
    बड़ा हो कर खाऊंगा चॉकलेट
    सुन्दर सपने बुनता रहता था
    टॉफी भी भाती थी उसको,
    पर कैडेबरी पर वो मरता था
    इसीलिए सोनू चॉकलेट की
    विंडो शॉपिंग करता था ।

    *****✍️गीता

  • अपना हक

    क्यों दिल्ली आज हिल रही
    क्यों इतना डर रही
    वो ह़क लेने आ रहे
    जान की बाजी लगा रहे
    राह में कितने रोड़े अटकाओगे
    अब रोक नहीं पाओगे
    जितनी बंदिशे लगाओगे
    संघर्ष का उग्र रूप पाओगे
    क्या सुलगता रक्त देखा कभी
    क्या उलझता युद्ध देखा कभी
    यही तो दिल्ली को हिला रहा
    नही, वो डराने नहीं आ रहा
    आ बैठ,सुन उसकी बात
    बस वो अपना हक़ लेने आ रहा ।

  • क्या खराबी है कि मियां शराबी है

    क्या खराबी है
    कि मियां शराबी है ।
    शराबी की बीबी हूँ
    इसमें भी नवाबी है।।
    रोज पकौरे और सलाद
    दिखते घर में हो आबाद
    नल में पानी हो न बेशक़
    मेज सजा शर्बते गुलाबी है।
    क्या खराबी है कि मियां शराबी है।।
    घर में इन्टरी होती जब
    करते खूब भले कोहराम।
    बच्चे सहमे-सहमे-से
    बिना नींद के करे आराम।।
    जूठी बासी भोजन को भी
    समझ रहा स्वादिष्ट कबाबी है।
    क्या खराबी है कि मियां शराबी है।।
    कुत्ते संग भी सो जाता है
    नशे में होकर वो कभी चूर।
    खैर मनाती मैं रातों में
    बेशक़ होकर उससे दूर।।
    बची खर्राटे और बदबू से
    क्या अपनी रात गुलाबी है।
    क्या खराबी है कि मियां शराबी है।।

  • शिकवों के पुलिंदे….

    यादों के पंख फैलाकर
    सुनहरी रात है आई
    उन्हें भी प्यार है हमसे
    सुनने में ये बात है आई
    पैर धरती पे ना लगते
    उड़ गई आसमां में मैं
    जीते जी प्रज्ञा’ देखो
    स्वर्ग में भी घूम है आई .
    चाँद पर है घटा छाई
    गालों पर लट जो लटक आई…
    सजती ही रही सजनी
    सजन की प्रीत जो पाई
    मिलन की आग में देखो
    जल गये शिकवों के पुलिंदे,
    पीकर नजरों के प्याले
    प्रज्ञा बन गई मीराबाई…

  • ‘प्रेम के उपनिषद्’

    थक गई हूँ अब रोते-रोते,
    तन्हा राहों पर चलते-चलते
    इन बिखरी साँसों की
    अरज बस है यही तुमसे
    मिलन जब भी हमारा हो
    ना कोई गिला-शिकवा हो
    ‘प्रेम के उपनिषद्’ पर बस
    नाम अंकित तुम्हारा हो
    बिखर कर टूटने से पहले
    जब मिलना कभी हमसे,
    मुझी में डूब जाना तुम,
    फकत बाँहों में भरकर के…

  • भूमिपुत्र का सम्मान करें

    आज अन्नदाता किसान,
    राहों पर है परेशान
    देश को अन्न देता जो,
    भारत माँ की जो है शान
    क्यूं आना पड़ा उसे राहों पर,
    ये बात कर रही है हैरान
    अपने एक हक़ की खातिर,
    लड़नी पड़ी लड़ाई है
    आखिर ये हक़ है उसका,
    उसकी मेहनत की कमाई है
    भूमिपुत्र का सम्मान करें हम,
    उसकी आंखें ना होने दें नम
    आज आवाज़ आई है देखो,
    खेतों से उस हलधर की,
    जिसकी मेहनत की रंगत से,
    भूख मिटे है हर घर की

    *****✍️गीता

  • आखिर ये है कैसा संताप

    पति की गलती पुत्र की गलती
    गलती करे चाहे भाई-बाप।
    हर गलती पर रोए नारी
    आखिर ये है कैसा संताप।।
    अपराध नहीं करती कोई
    एक अपराधी की बन रहती।
    बस यही एक अपराध सदा
    अँखियाँ आँसू भर नित सहती।।
    ‘विनयचंद ‘ ममता नारी की
    कवच रूप जो पाकर।
    निज उत्कर्ष करे न
    न औरों का बने ठहर।।
    वीर नहीं कायर है जग में
    नारी को रुलानेवाला।
    नमकहलाल बनो विनयचंद
    नित नित नमक खानेवाला।।

  • यह न कहो अवरोध खड़े हैं

    यह न कहो अवरोध खड़े हैं,
    कैसे मंजिल को पाऊँ मैं,
    जहां-तहां बाधाएं बैठी
    कैसे कदम उठाऊँ मैं।
    यही निराशा खुद बाधा है
    जो आगे बढ़ने से पहले
    डगमग कर देती है पग को
    चाहे कोई कुछ भी कह ले।
    भाव अगर मन में भय के हों
    काली रात घना जंगल हो,
    कैसे पार करे मन उसको
    कैसे जंगल में मंगल हो।
    मंगल मन में लाना होगा
    भय को दूर भगाना होगा,
    चीर गहन अंधियारे को
    पथ रोशन करना होगा।
    हार गया मन तो सब हारा
    मन का ही यह खेल है सारा
    मन में अगर बुलंदी है तो
    लक्ष्य हाथ आयेगा सारा।
    ——– सतीश चन्द्र पाण्डेय, चम्पावत, उत्तराखंड

  • “अनाथ आश्रम”

    अनाथ आश्रम
    ★★★★★★★

    मेरे माँ-बाप कैसे होंगे
    यही सवाल अक्सर मस्तिष्क में गूंजता रहता है
    अक्सर मुझे वो काकी याद आ जाती हैं
    जिन्होंने मेरी परवरिश बचपन में की थी
    उस अनाथ आश्रम में बहुत
    से बच्चे थे पर मुझसे कुछ
    अलग ही लगाव था उनका
    माँ नहीं थीं पर फिर भी माँ जैसा खयाल रखती थीं मेरा
    उस अनाथ आश्रम में कभी
    अनाथ जैसा महसूस नहीं होता था
    सब थे अपने से और दर्द समझते थे
    वो काकी आज बहुत याद आ रही हैं
    जिनकी गोद में सिर रखकर सोती थी
    आज मैं जो कुछ भी हूँ उनके प्यार की वजह से हूँ
    आज उसी अनाथ आश्रम में कुछ सहयोग देने आई हूँ
    सब मिले हैं पर वो काकी नहीं हैं…

  • “अतीत के फफोले”

    अतीत के फफोले
    ***************
    जीवन मेरा उलझा-उलझा
    सुलझी लट बालों की
    मैंने ना देखा सुंदर उपवन
    ना देखी प्रेम की सरिता निर्मल
    भूलवश मैं पड़ गई प्रेम के
    मायाजाल में
    सोंचा था मिलेगा सुख और
    जीवन में खिलेेंगे सुंदर पुष्प
    पर हार ही हार मिली
    जो भी जीवन में आया उससे केवल पीर मिली
    अतीत के फलोले आज फूटने लगे हैं
    जब बिछड़े हुए लोग फिर से मिलने लगे हैं..

  • लावारिस बचपन

    लावारिस बचपन
    **************

    सड़कों पर भटक-भटक कर है कैसे बचपन बीता,
    और नहीं खाने को है एक
    निवाला मिलता…
    जाने कहाँ हैं मेरे माँ-बाप
    नहीं मैं जानू,
    मैं तो झुग्गी बस्ती को ही
    अपना घर-बर मानू…
    लालन-पालन मेरा अनाथ आश्रम में हुआ है,
    यह लावारिस बचपन सड़कों के किनारे ही कटा है…
    मैंने ना देखा सुनहरा बचपन
    ना देखी शोख जवानी,
    बस बचपन से करी मजूरी
    और गलियों की धूल है छानी…

  • मुहौब्बत अगर आप सच में करें

    मुहौब्बत अगर आप सच में करें तो
    मुहौब्बत में ईश्वर की छाया दिखेगी,
    दिखावा नहीं माँगती है मुहौब्बत,
    मुहौब्बत में सच की कहानी मिलेगी।
    सच्ची मुहौब्बत में धोखा करे जो,
    इंसान कहने के काबिल नहीं वो,
    रुलाये बिना बात के प्रिय को जो
    प्रीतम कहाने के काबिल नहीं वो।
    विश्वास सबसे बड़ा जिन्दगी में
    अगर हो न विश्वास फिर क्या मुहौब्बत,
    रखो एक – दूजे में विश्वास पूरा
    सच में उसे ही कहेंगे मुहौब्बत।
    न रोना है खुद ना रुलाना है उनको
    हंसना है खुद फिर हंसाना है उनको
    कभी मत सताओ मुहौब्बत को अपनी,
    सच्ची मुहौब्बत करो अपने उनको।
    —— सतीश पाण्डेय, चम्पावत

  • *देवोत्थान एकादशी*

    कार्तिक मास की,
    शुक्ल पक्ष की एकादशी को
    देवोत्थान एकादशी आई है
    ये प्रबोधिनी एकादशी भी कहलाई है
    हर्षोल्लास साथ में लाई है
    आषाढ़ मास की,
    शुक्ल पक्ष की एकादशी को
    चार मास के लिए
    देव शयन को जाएं,
    शुभ-कारज भी ना हो पाएं
    देवोत्थान एकादशी पर
    देवों सहित
    नारायण निंद्रा से जागें
    शुभ-कारज भी होने लागें
    प्रारम्भ होवे हर शुभ काम,
    श्री गणेश हो लेकर हरि नाम
    पद्मनाभ विष्णु जी का होता है आह्वान
    पूजा-अर्चना की जाती है,
    बना कर उनके पांव
    गन्ना, बेर सिंघाड़ा शकरकंद
    से लगता है भोग
    समस्त परिवार पूजा पर
    बैठे हाथों को जोड़
    दीप जलाकर करें आरती
    पद्मनाभ विष्णु जी की
    उठो नारायण, उठो नारायण
    से गूंजे घर-बार
    प्रभु को शयन से,
    उठाया जाए इस प्रकार

    *****✍️गीता

  • महत्व

    लड़की है तो क्या हुआ
    हम भी लिख पढ़ ले अगर
    दुनिया के दरवाजे खुलेंगे
    मिलेगी हमको भी डगर
    विद्या में है ताकत कितनी
    बात समझ में आ गई
    दुनिया के हर क्षेत्र में नारी
    आसमान सी छा गई
    पढ़ लिख कर हम उन्हें बताएं
    जो अब तक हैं अंधियारे में
    ज्ञान का दीप जला कर मन में
    अब आ जाओ उजियारे में
    खुद को समझो खुद को जानो
    कल कि शायद हस्ती हो तुम
    ना पढती ना लिखती तो
    दुनिया में रह जाती गुम
    खुल गई है आंखें अपनी
    पढ़ लिख कर हम बने महान
    ऐसा काम करें जग में की
    याद करें हमें हिंदुस्तान।
    वीरेंद्र सेन प्रयागराज

  • “देवोत्थान एकादशी”

    आषाण की एकादशी को
    सभी देव सो जाते हैं…
    और कार्तिक की एकादशी को
    सभी देव जग जाते हैं…
    इसीलिए इस दिन को
    देवोत्थान एकादशी कहते हैं…
    आज के दिन विष्णु जी
    चारमास के बाद नींद से जागते हैं…
    और आज के दिन तुलसी माता
    का विवाह भी होता है..
    इसीलिए आषाण से कार्तिक मास तक
    कोई शुभ कार्य किया नहीं जाता है…
    आज के दिन से हिन्दू धर्म में
    विवाह होना प्रारम्भ हो जाता है…
    देवोत्थान एकादशी की महिमा
    बहुत निराली है..
    गन्ने का मंडप बनाकर विष्णु जी
    के पैर बनाकर की जाती है पूजा विधिवत्…
    ‘आओ देवा उंगली चटकाओ
    नींद से जागो कृपा बरसाओ’
    ऐसा बोला जाता है…
    सिंघाड़ा, बेर, शकरकन्द चढ़ाकर
    प्रभु को भोग लगाया जाता है…
    “जय हो विष्णु जय हो तुलसी
    जय हो सारे देवों की
    आओ मेरे घर प्रभु पधारों
    इच्छा पूर्ण करो हम भक्तों की”….

    “देवोत्थान एकादशी की सभी को बधाई”

  • उस माँ का दर्द कौन जाने..!!

    उस माँ का दर्द कौन जाने !
    जो अपने फर्ज के लिए
    अपने दुधमुहे बच्चे को
    घर छोंड़कर जाती है..
    वो पुलिसकर्मी है अपनी ड्यूटी
    खूब निभाती है…
    कभी छोंड़ती मायके में
    कभी ससुराल में छोंड़कर जाती है..
    दिल को पथ्थर बनाकर
    ममता से मुंह मोड़ती है
    देश के नागरिकों की रक्षा
    के लिए
    अपने बच्चे को दूसरे के
    सहारे छोंड़ती है…
    कैसे बीतते हैं उसके दिन और
    कैसे रात कटती है…
    उस माँ का दर्द कौन जाने
    जो अपने बच्चे से दूर रहती है…
    नहीं लगता दिल कहीं जब
    अपने बच्चे की याद आती है…
    वीडियो कालिंग से वह अपने बच्चे को देख पाती है…
    हंसता-खेलता अपना बच्चा
    देख
    माँ के चेहरे पर मुस्कान आती है…
    दिल दुःखता है दूरियों से
    और आँख भर आती है…
    कभी-कभी नन्हे से बच्चे को
    माँ ड्यूटी पर ले जाती है..
    बच्चे के प्रति लापरवाही भले कर भी दे माँ
    पर देश के प्रति अपना फर्ज बखूबी निभाती है..
    उस माँ का दर्द कौन जाने
    जो बच्चे को छोंड़कर
    रो-रोकर रात बिताती है…

    विशेष:-
    यह कविता सभी महिला पुलिसकर्मियों और कामकाजी महिलाओं को समर्पित है…
    जो अपने फर्ज के लिए अपने बच्चे से दूर रहकर अपनी ड्यूटी करती हैं…

  • प्रेम

    राहें हमारी मिलने के आसार नहीं हैं!
    कैसे कहूँ तुम्हारा इंतजार नहीं है!!

    मेरी हर दलील को ठुकरा चुका है ये!
    इस दिल पे मेरा कोई इख्तियार नही है!!

    ख़्वाबों में तुमसे रोज़ मुलाक़ात है मेरी!
    अफसोस हक़ीकत में ही दीदार नहीं है!!

    रूह के हर जर्रे में शामिल हो तुम ही तुम!
    और कहते हो लकीरों में मेरी प्यार नहीं है!!

    ©अनु उर्मिल ‘अनुवाद’

  • मेहनत

    पसीना बहाना जरूरी है तेरा,
    तभी तो कदम लक्ष्य चूमेगा तेरा।
    सजग हो स्वयं को लगा श्रम पथ पर,
    सवेरा है जग जा, आलस्य मत कर।
    तेरी राह देखे खड़ी है बुलंदी
    कर ले तू मेहनत से अक़्दबंदी,
    निशाना लगा आंख पर मत्स्य के तू
    पायेगा पल-पल फतह सत्य की तू।
    परिश्रम का फल मिलेगा सभी को
    लगा पेड़, फल-फूल देगा कभी तो।
    कंटक रहित राह मेहनत होगी
    तेरी सफल चाह मेहनत से होगी।
    उलझन नहीं एक मंजिल पकड़ ले
    जाने न दे हाथ से तू जकड़ ले,
    नौका पकड़ एक, कर पार सरिता
    यही जोश देती तुझे आज कविता।
    ——- सतीश चंद्र पाण्डेय, चम्पावत, उत्तराखंड

  • झूठ से डरना नहीं (गीतिका छंद)

    बात अपनी बोल देना, बात में डरना नहीं।
    धर्म की ही बात करना, धर्म से डिगना नहीं।
    तू अगर है सत्य पथ पर, झूठ से डरना नहीं।
    भूल कर भी बस गलत की तू मदद करना नहीं।
    सत्य के राही कभी डरते नहीं झुकते नहीं,
    तू अगर है सत्य पथ पर, फिर कहीं दबना नहीं।
    सिर उठा कर जोश से जीना, कभी गिरना नहीं,
    दूर हो सारी निराशा, हो हँसी, रोना नहीं।

  • गजल- सोचा न था |

    गजल- सोचा न था |
    ठुकरा देगा मुझे इस तरह कभी सोचा न था |
    दगा देगा मुझे इस तरह कभी सोचा न था |
    खुद से भी जियादा एतवार था मुझे उसपर |
    दफा कह देगा इस तरह कभी सोचा न था |
    हुश्न वाले पत्थर दिल होते कहते है लोग |
    दिल तोड़ देगा इस तरह कभी सोचा न था |
    दुनिया दिल बसाएँगे साथ थी तमन्ना मेरी |
    घर जला देगा इस तरह कभी सोचा न था |
    निगाहों मे प्यार होठो मुस्कान एक धोखा था |
    रुला देगा मुझे इस तरह कभी सोचा न था |
    मेरी शुबह शाम उसके नाम क्या मंजर था |
    खंजर चला देगा इस तरह कभी सोचा न था |
    जान ओ जिगर मांग लेता मै हंस के दे देता |
    मजधार डूबा देगा इस तरह कभी सोचा न था |
    गुले गुलजार जाने बहार बस वही तो था मेरा |
    गैर हाथ मिला लेगा इस तरह कभी सोचा न था |
    उसके हुश्न ओ अदा सदा नाज करता था मै |
    गैर बना देगा मुझे इस तरह कभी सोचा न था |
    श्याम कुँवर भारती (राजभर)
    कवि /लेखक /गीतकार /समाजसेवी
    बोकारो झारखंड मोब -9955509286

  • सूखे दरख्त रोते हैं क्यों

    जहाँ सबसे पहले सूरज निकले
    वहाँ खौफ का मरघट क्यों
    जहाँ काबा -काशी एक धरा पर
    उस माटी में दलदल क्यों
    खून के आंसू रो रहे हैं
    क्रांतिवीर बलिदानी क्यों
    नेताओं की लोलुपता पर
    सबको है हैरानी क्यों
    नंगे सभी हमाम में दिखे
    सबकी एक कहानी क्यों ||
    गाँधी और सुभाष के सपने
    जलते उबल रहे हैं क्यों
    महंगाई बढ़ रही निरन्तर
    बनी दुधारू गइया जनता क्यों
    फर्क हम में और सूरज में कहाँ है
    हमारी सहम सी विकल किरणें क्यों
    देश में बनने वाली नीतियां
    नतीजे में शून्य आती है क्यों
    सवालात मन में है सबके
    जवाब नहीं मिलता है क्यों ||
    जिसे सुनकर नफ़रत पलती हो दिल में
    ऐसी बातें रास आती है क्यों
    स्वार्थ सिद्धि के लिये काटा वृक्षों को
    सूखे दरख्त रोते है क्यों
    भाई भाई राजनीति दलदल में
    फिर भी दिखती है मारामारी क्यों
    भूल विकाश की राहों में
    बाँट चले जन जन कलिहारी क्यों ||
    धुंआ उगल रहे हैं कारखाने
    फैक्ट्रियां विष फेंक रही हैं क्यों
    पृथ्वी भी अपनी आँखों से
    मृत्यु का दृश्य देख रही है क्यों
    मानवीय बुद्धिमतता ही अब
    मूर्खता की परिचयक बन रही है क्यों
    आतंकी रूपी पिशाचनी यहाँ
    तांडव का अभिनायक हो रही है क्यों
    ‘प्रभात ‘ ऋषि मुनियों की इस धरती पर
    नफ़रत भरा ये जंगल क्यों
    जहाँ हर त्यौहार हो ईद दिवाली
    उस नजर में नफ़रत क्यों
    वैश्विक खगोलीकरण के दौर में
    बेपर्दा हुई है नारी क्यों
    इंसानों के दुःख दर्द में
    हम बन न पाये सहभागी क्यों ||

  • चलो हार पर जीत पाने की सोचो (भुजंगप्रयात छंद में)

    भरा दर्द है सब तरफ याद रखना
    सभी दर्द में हैं मगर याद रखना,
    भुला कर गमों को खुशी खोजना बस,
    तभी जिन्दगी में मिलेगा मधुर रस।
    न चिन्ता में रहना अधिक आप ऐसे,
    सदा मस्त रहना बच्चों के जैसे,
    चिन्ता तो केवल रोगों का घर है,
    चिन्ता से खुद को जलाना न ऐसे।
    हावी न हो पाएं गम कोई खुद पर,
    मनोबल रहे उच्च, कोई नहीं डर,
    चलो हार पर जीत पाने की सोचो,
    गमों को उड़ा दो, खुशी को ही खोजो।
    —— (भुजंगप्रयात छंद में)
    ———— सतीश चंद्र पाण्डेय

  • गज़ल -वो ठहरता नही है |

    गज़ल -वो ठहरता नही है |
    बातो मे करता प्यार मगर दिल से वो करता नहीं है |
    वादे लाखो किए मगर जरूरत पर वो ठहरता नहीं है |
    बुला पास मुझे करना गैरो कहकसा उसकी आदत है |
    बदल गया मै उसकी खातिर मगर वो सुधरता नहीं है |
    उसके इश्क का असर इंतजार जाग रात भर करता हूँ |
    हर गली उसका जाना पास मगर वो फटकता नहीं है |
    जब भी आया वो पास मेरे हर घड़ी घड़ी देखता रहा |
    सुना दूँ अपने दिल की मगर मेरी वो सुनता नहीं है |
    करता करम मेरे दुशमनों दिलोजान से बहुत है मगर |
    बना बैठा खुदा मै जिसे कद्र मेरी वो करता नहीं है |
    कितना बेबस आशिक हूँ मै मुझे बस वही चाहिए |
    लाखो हसीं जहां मे मगर दिल कही बहलता नहीं है |

    श्याम कुँवर भारती (राजभर)
    कवि /लेखक /गीतकार /समाजसेवी
    बोकारो झारखंड मोब -9955509286

  • ‘बाबू जी की टूटी कुर्सी’

    बाबू जी की टूटी कुर्सी
    चरमर-चरमर करती है
    जब बैठो उस कुर्सी पर
    डाल की तरह लचकती है
    बाबू जी उस कुर्सी पर
    बैठ के पेपर पढ़ते हैं
    और साथ में बाबू जी
    चाय की मीठी चुस्की लेते हैं
    सुबह सवेरे उठकर वो
    रोज टहलने जाते हैं
    लौट के आते जब बाबू जी
    मल-मल खूब नहाते हैं
    वह कुर्सी बाबू जी को
    बेटे माफिक प्यारी है
    टूट गई वह देखो फिर भी
    बाबू जी को प्यारी है…

  • दर्जी

    कविता- दर्जी
    ——————-
    फटी पैंट मेरी,
    ले दर्जी जी के घर जाता हूं,
    टूटी फूटी मशीन के संग,
    बैठा बुजुर्ग दर्जी हैं,
    देख मुझे मुस्कुराया वह,
    ढलती शाम तक में जो,
    20 रुपए कमाया वह,
    कारण पूछा हंसने का,
    खुदा को दिल से धन्यवाद दिया,
    पहला ग्राहक दुकान पर आने का,
    बस एक हुनर था दर्जी में,
    बाकी अब उसमें सब कमियां थी,
    सुनो……
    चश्मा उसका टूटा था,
    फटा कुर्ता उसका था,
    पके बाल,
    पिचके गाल,
    दांत भी सारा टूटा था,
    संभल रहा ना,
    हाथ में कैची
    दृष्टि भी कमजोर थी यारों,
    सुई धागे का
    मेल समझ में
    ना आता था,
    नाखून बड़े ,
    दाढ़ी बाल,
    मूंछ बड़े थे,
    सर्दी खांसी से,
    ख़ास हाफ रहा था,
    चार चार हैं,
    बच्चे उसके,
    बच्चों के बच्चे हैं,
    सब के सब अच्छे हैं,
    दुख होता हैं,
    देख दशा दर्जी का,
    क्रोध मुझे आया,
    सुन शौक दर्जी के बच्चों का,
    चड्डी गंजी,
    हर वस्त्र सिला, सारी उम्र बच्चों का,
    रोता हैं अपनी हालत पर,
    हुनर हैं पर ताकत ना,
    बच्चे हैं पर बच्चों को लगता अब,
    बाप को अब उन्हें जरूरत ना ,
    फटे पुराने कुर्ता में,
    सड़क किनारे छप्पर में,
    गर्मी वर्षा, ओला पाला सहता,
    डांट भी सुनता ग्राहक का,
    इसलिए सब कुछ सहता हैं,
    दो वक्त की ,रोटी के लिए मरता हैं,
    शर्म करो चार चार बच्चों तुम,
    क्या तुमको अर्थी में,
    कंधा देने के लिए जनमाया है,
    उपकार करो ,
    धर्म करो,
    जीवन में,
    संघर्ष करो,
    जन्नत पाने के लिए यारों,
    मात पिता की सेवा करो,
    कहे ‘ऋषि’…
    मात पिता के चरणो में,
    जिन बच्चों का हाथ माथ रहेगा,
    मात-पिता घर के बड़े बुजुर्गों का,
    जिस बच्चे के सर पर हाथ रहेगा,
    दुनिया का हर सुख पाए,
    दिन प्रतिदिन उन्नत करता जाए,
    देवलोक में,
    देवताओं के श्री चरणों में
    निश्चित वह स्थान को पाए,
    ——————————–
    **✍ऋषि कुमार ‘प्रभाकर’—

  • रात को भी धूप आती(कवित्त छंद)

    ठंडक की आहट से उठ रही एक डर,
    कैसे कटेगा ये जाड़ा मिला न कम्बल गर।
    सिर पर छत नहीं, तन ढकने को नहीं,
    खुला आसमान है, जीवन है सड़क पर।
    सिकुड़-सिकुड़ कर रात काटी अब तक,
    फटी हुई चादर में सोया तन ढककर।
    अब तक मच्छर थे, चूसते थे तन मेरा,
    अब नहीं सोने देती शीत मुझे रात भर।
    सड़क किनारे सोता दीन सोचे मन में ये,
    रात को भी धूप आती ताप लेता घड़ी भर।
    — डॉ0 सतीश चंद्र पाण्डेय, चम्पावत।

  • और मैं खामोंश थी…!!

    आज बहुत उदास होकर
    उसने मुझे पुकारा,
    मैं पास गई और
    उसे प्यार से सहलाया…
    उसने मुझसे कहा
    तुम मुझसे नाराज हो क्या ?
    या जिन्दगी की उलझनों से हताश हो क्या ?
    मैंने मुस्कुराते हुए
    अपने आँसू छुपाकर कहा
    नहीं तो पगले !
    तुझसे नाराज नहीं खुद से खफा हूँ मैं
    जिन्दगी से हताश नहीं
    हैरान हूँ मैं…
    बस कुछ दिनों से खुद से नहीं मिल पाई हूँ
    इसीलिए तुझे अपने प्रेम से
    सींच नहीं पाई हूँ…
    मेरी गोद में सिर रखकर उसने कहा
    तो फिर तुमने मुझे कई दिनों से सींचा क्यों नहीं!
    सुबह उठकर सबसे पहले
    मुझे देखा क्यों नहीं!
    वो छज्जे पर गमले में बैठा
    मेरा मनी प्लांट’
    मुझसे से सवाल पर सवाल करता रहा और
    मैं खामोश थी…

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