सामने बोल भी नहीं पाये
आँख हम खोल भी नहीं पाये
था वजन बात में भरा कितना
उसको हम तोल भी नहीं पाये।
आँख चुँधिया गई थी जब अपनी
धूल औरों में झोंक कर आये,
गा चुके गीत जब थे वे अपने
तब कहीं फाग हम सुना आये।
उनकी कोशिश थी जल छिड़कने की
उस जगह आग हम लगा आये,
साफ कालीन-दन बिछाए थे,
उनमें नौ दाग लगाकर आये।
जितनी शंका भरी थी उनके मन
सारी हम दूर भागकर आये,
तुम हमारे हो हम तुम्हारे हैं
बिन कहे बात बताकर आये ।
वे कभी खत लिखें या आ जायें,
सोचकर हम पता लिखा आये,
दिल की सुनते हैं नहीं ठुकराते
यह नियम हम उन्हें सिखा आये।
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संपादक की पसंद
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बिन कहे बात बताकर आये
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सादगी भाती है
गरम चाय पीने से
ताजगी आती है,
तुम्हारे व्यक्तित्व की
सादगी भाती है।
सवेरा भी जरूर
होता है राह दिखाने को
अंधेरा भी मिटता है,
रात भी जाती है।
मेहनत का फल
जरूर मिलता है,
ऊँची सफलता
हाथ भी आती है।
धरती में अर्जित धन
यहीं रह जाता है,
अच्छाई- बुराई तो
साथ भी जाती है।
तुम्हारे जाने के बाद
भुला नहीं देते हम
कभी कभी तो
याद भी आती है। -
कैसे जिया जाए जीवन ??
कैसे जिया जाए यह जीवन
नीरस-नीरस लगता जीवन |बह जाती है सांस कहीं तो
बह जाती है धड़कन |रूठ जाएं कभी सारे अपने
बन जाएं कभी गैर भी अपने |उपजे मन में बछोह के बादल
बरसे आंसू बन नैनन |कैसे जिया जाए जीवन??
कैसे हो जीवन पावन ?? -
°°° मैं तुम्हें फिर मिलूंगी…..
मैं तुम्हें फिर मिलूंगी
किसी टूटे दिल के
अनगिनत टुकड़ो में,
किसी गरीब की फटी हुई
झोली की सच्चाई में,
एक कटी पतंग की
बेसहारा होती उम्मीदों में
मैं तुम्हें फिर मिलूंगी….कांच के उन टुकड़ों में
जिसमें मेरा अक्श देखकर
तुमने तोड़ दिया होगा
मैं तुम्हें फिर मिलूंगी…बेसहारा होते पंछियों के
छूटते घरौंदों में,
बेपरवाह आशिक की
बेशर्म हरकतों में
मेरी जुल्फों के जैसी
घनघोर घटाओं में
मैं तुम्हें फिर मिलूंगी…बरसात की हर बूंद में
खाली कमरे की खामोंशियों में
कंघियों की कौम में,
कलियों की नर्मियों में,
तुम्हारे दिल की हर धड़कन में
मैं तुम्हें फिर मिलूंगी….. -
°°°विश्वसनीयता…..
विश्वसनीयता
***************
आज डायरी के
अथाह पन्ने पलटने के बाद
मिला मुझे एक
ऐसा शब्द जिसके
मायने ढूंढने, समझने और समझाने में
जमाने गुजर गयेविश्वसनीयता’
क्या है ?? किसमें है ?? किस पर है ??
किसको है ??
इन चार सवालों के जवाब
ढूंढने के लिए अनगिनत
वेब पेज पलट डाले
पर उसका जवाब तो हमें
अपने रिश्ते में मिला
जो सालों पहले टूट चुका था !! -
गुत्थियां
कुछ भ्रांतियां ऐसी जो, हास्यास्पदसी लगती हैं
कहावतें भी जीवन का, प्रतिनिधित्व करती हैं
ज़मीं पे गिरी मिठाई को, उठाकर नहीं खाना है
वो बोले मिट्टी की काया, मिट्टी में मिल जाना हैबंदे खाली हाथ आए थे खाली हाथ ही जाएंगे
फिर बेईमानी की कमाई, साथ कैसे ले जाएंगे
रात दिन दौलत, कमाने में ही जीवन बिताते हैं
वो मेहनत की कमाई झूठी मोह माया बताते हैंपति-पत्नी का जोड़ा, जन्म-जन्मांतर बताते हैं
फिर क्यों आये दिन, तलाक़ के किस्से आते हैं
सुना है बुराई का घड़ा एक न एकदिन फूटता है
फिर बुरे कर्म वालों का, भ्रम क्यों नहीं टूटता हैऊपर वाले के हाथों की कठपुतली मात्र हैं हम
फिर क्यों लोग, स्वयं-भू बनने का भरते हैं दम
उसने भू-मण्डल, मोहक कृतियों से सजाया है
फिर क्यों उसके अस्तित्व पर सवाल उठाया है -
मुस्कान आपकी
मुस्कान आपकी
खिले फूल जैसी,
भुलाने सक्षम है
गम हमारे।
वाणी में इतना
मीठा भरा है,
विरोधी भी हो
जाते हैं तुम्हारे।
चमकता हुआ बल्ब
बोलूँ न बोलूँ,
मगर इस अंधेरे में
हो तुम दुलारे।
निराशा के कुएं में
पड़ने लगे थे
मगर तुमने आकर
किये नौ सहारे। -
अब ना ढूंढना कभी……..!!
अब ना ढूंढना कभी
मुझे मन के उजालों में
अंधकार की ओर
बस एक कदम बढ़ा लेना
बिखरें हों जहाँ
कंटक बेशुमार
बस वही पर मेरा निशान मिलेगा…
अब ना ढूंढना कभी
मोतियों की चादर में
धूप की लड़ियों में
याद आए तो
खोज लेना…
स्वप्न में आऊंगी तुम्हारे
तुम्हारी पलकों के द्वार
खट-खटा कर कहूँगी तुमसे
अब ना ढूंढना कभी…………!! -
धर्म आंतरिक जागृति है
धर्म आंतरिक जागृति है
संवेदना का अहसास है
अंतर्मन अगर साफ है
मजहब हमेशा पास हैशांति संदेश के लिए समूह
प्रेम का एकल स्वतंत्र विचार है
जीवन सरल सीमित सबका
भंडारण के लिए आचार हैईश्वर से पा पा जीवन भर
देना जिसको आ जाता है
जीना उसी का सार्थक हुआ
जी ना अपनों से चुराता हैधर्म श्रेष्ठ जो प्रेम सिखाए
सहयोग राह पर हमें चलाए
संगठन का नित पाठ पढ़ाए
सहृदय बना देश रक्षा करायेसर्वहित के लिए हमे जोड़े
कर्मठ बना पहल को मोड़ें
सत्यपथ पर सदा सुदृढ़ रखे
संस्कृति के लिए हमें परखे -
शिशु सुधार की चाह
शिशु सुधार की चाह में रहते हर जन
खुद चाहे रहा बिकर्षित उनका जीवन
ब्यर्थ चिंतित हो उल्झाता जन निज मन
धरा अवतरण हेतु सबका अपना कारणस्वभाव अलग हो सबका यह है संभव
प्यास हरता सबका पर वही शीतल जल
प्यार बिना सूना है पर सबका मधुबन
प्यार से ही बनता है सरल हर संसाधन।।।।संतान से चाह है मात-पिता की भूल
मांग बन जाती नन्हीं सी ह्रदय की शूल
अम्बर का परिचय सच उन्हें कराना है
क्षितिज तक उन्हें किंतु स्वयं ही जाना हैनहीं भूख से मरता कभी कोई पशु पक्षी
संरक्षा पूर्ण जगत है नहीं कोई नरभक्षी
प्रार्थना के लिए द्वार प्रभुजी का चुनना है
सुधार हेतु वरदान वहीं से सदा मिलना है -
नदिया बहती है
कल कल कल कल
नदिया बहती है,
साफ स्वच्छ है पानी,
जी करता है खूब नहा लूँ,
मगर डर रही है रानी,
मन की रानी का डरना
मेरे मन में करता हैरानी।
पूछा तो कहती है वो
क्यों करते हो इतनी नादानी
मौसम बदल गया है लेकिन
अभी भी है ठंडा पानी।
भरी दोपहर भी गर होती
तब भी थोड़ा कहते हम,
मगर सुबह में ठंड बहुत है
छींटे से धो डालो गम। -
उनके बिन
मिला हुआ प्रेम खोना मत
दिल मेरे जोर से तू रोना मत
शूल चुभ जायें उनकी राहों में
ऐसे बीजों को आज बोना मत।
अब पता खुद का तू बदल लेना
ताकि पाऊं नहीं मैं उनका खत,
खुद की नजरों में गिर पडूँ चाहे
खोज लूँ खो गई स्वयं इज्जत।
आ रही नींद को रोकूँ कैसे
उनके बिन अश्क को सोखूँ कैसे,
शूल गमले में दिल के उग आये
फूल रंगीन मैं रोपूं कैसे
हो सके तो कभी भी आ जाना
बैठ पलकों में मन लुभा जाना
दो घड़ी देख कर के खिल जाऊं,
उनके नैनों से आज मिल आऊं। -
जी लो, जब तक जीवन है
पापा प्लीज
फीस जमा करादो
छड़ी की मार
सहपाठियों में अपमान
अब सहन नहीं होता।।मम्मी आज टिफिन में
ठंडी रोटी पे नमक-मिर्च
पानी लगा मत देना,
निरीक्षण है स्कूल में
गर्म पंरांठा रख देना।।एक शर्ट नयी साड़ी
जुगाड़ कर लेते आना,
चिंदिया लगे कपड़ों में
अब छेद दिखने लगे हैं।।भाग्यवान तुम भी ना
बच्चों सी बातें ना करो,
आज की महंगाई में बस
जी सको उतनी बात करो।। -
कविता : गांधी के सपनों का ,उड़ता नित्य उपहास है ..
वही पालकी देश की
जनता वही कहार है
लोकतन्त्र के नाम पर
बदले सिर्फ सवार हैं
राज है सिर्फ अंधेरों का
उजालों को वनवास है
यहाँ तो गांधी के सपनों का
उड़ता नित्य उपहास है ||
महफ़िल है इन्सानों की ,
निर्णायक शैतान है
प्रश्न ,पहेली ,उलझन सब हैं
गुम तो सिर्फ समाधान है
वही पालकी देश की
जनता वही कहार है
लोकतन्त्र के नाम पर
बदले सिर्फ सवार हैं ||
राजनीति की हैं प्रदूषित गलियां
खरपतवारों की पोर है
गूंज उठा धुन दल बदल का
अदल बदल का दिखता दौर है
देश प्रेम भावों का हो गया पतन
जन धन के पीछे भागे है
धन की भूँख बढ़ी ऐसी
जन तन के पैसे मांगे है
महँगाई नित बढ़ रही
जनता को खूब रुलाया है
समझ न आए अपना है कौन यहाँ
जनवाद का अच्छा ढोंग रचाया है
बढ़े भाव ,रह अभाव में पौध हमारी सूखी है
ली तिकड़म की डिग्री जिन्होंने
उन्ही की बगिया फूली है
अब तो है राज अंधेरों का
उजालों को वनवास है
यहाँ तो गांधी के सपनों का
उड़ता नित्य उपहास है
वही पालकी देश की
जनता वही कहार है
लोकतन्त्र के नाम पर
बदले सिर्फ सवार हैं || -
याद रहे जन दर्द
सत्ता में जाकर जिसे, याद रहे जन दर्द,
वही मिटा सकता यहाँ, धूल और सब गर्द,
धूल और सब गर्द, पड़ी हो जो विकास में,
पहले वो हो साफ, रिआया इसी आस में,
कहे लेखनी सोई, रैयत बिछा के गत्ता,
नजरे इनायत कर, ले उस ओर ओ सत्ता। -
भारतीय साहित्य:-“संवेदना के अनुकूल”
तुम क्यों कहते हो मुझे
कवयित्री हूँ मैं
टूटा-फूटा राग हूँ और जोगन हूँ मैं
जैसे मीरा लिखती रही
भक्ति के पद रोज
वैसे मैं लिखती हूँ सदा
विरहाग्नि को कर जोड़
विरहाग्नि को कर जोड़ सदा लिखती रहती हूँ
भावों की ज्वाला में सदा
तपती रहती हूँ
मेरी कविता का सदा
भाव’ रहेगा मूल
अपसारी चिंतन प्रकृति है
संवेदना के अनुकूल… -
तू मानव है कुछ सोच रहा।
तू निर्मल है तू निर्भय है , क्या बैठ यहाँ तू सोच रहा।
विधि में तेरे लिखा क्या है, तू मानव है कुछ सोच रहा।।ये जीवन है जीते हैं सब, कुछ लोग यहाँ रोते रोते
इसमे भाग्य का दोष नही, ये मानव है सोते सोते
सब अपनी करनी भोग रहे, तू इनको क्या अब देख रहाविधि में तेरे लिखा क्या है, तू मानव है कुछ सोच रहा।।
नम आंखों को तू पोछ जरा , जीवन का अब सम्मान तू कर
उठ कर अपने पैरों पर तु, इस दुनिया पर एहसान तू कर।
तेरे साहस के आगे बढ़कर, कौन तुझे अब रोक रहाविधि में तेरे लिखा क्या है, तू मानव है कुछ सोच रहा।।
-
“किसान और श्रमिक की व्यथा”
कैसे बन्धु ?
कैसे रिश्ते ?
कैसा यह संसार
कैसा जीवनसाथी भाई ?
स्वार्थ पड़े तब प्यार
स्वार्थ पड़े तब प्यार
किया है यहाँ सभी ने
बैरी भी घूमे बन मीत
दिल की प्रेम गली में
विपदा आई नहीं
किसी ने मुझे सम्भाला
मैंने स्वेद बहाकर
कितने घरों को सम्भाला
ना सरकार हमारी
ना दो गज जमीं हमारी
अपने स्वेद से सींचकर
मैंने फसल उगा ली… -
“शिवरात्रि का भोर”
शिवरात्रि का भोर
भोर जीवन में लाया
भाँग- धतूरा चढ़ा के
मैंने शिव को मनाया
शिव-शंभू हे नाथ !
अरज मेरी सुन लीजे
मेरे श्याम की राधा
केवल मुझको कीजे
मुझको कीजे नाथ
बड़ा उपकार रहेगा
प्रज्ञा’ का सर्वस्व
तुम्हारा सदा रहेगा
जो ना पाई श्याम !
नाम ना लूंगी तेरा
मेरे तन-मन में श्याम
कि यह मन जोगन मेरा
भूल के भोलेनाथ ना
मुझको रुसवा करना
चरणों में तेरे, मन में है
श्याम के रहना
पूरी कर दी जो अभिलाषा
तेरे गुण गाऊंगी
वरना विष को पीकर
श्याम में मिल जाऊंगी… -
शिव रात्रि,उमा महादेव के विवाह की वर्ष गांठ
हर ओर सत्यम शिवम सुंदरम,
हर हृदय में हर-हर हैं।
गरल कंठ में धारण कर,
वो सरल भोले शंकर हैं
व्याघ्र खाल तन पर लपेटे,
भस्म-भभूत ललाट पर लगाए
डम-डम डमरू बाजे जिनका,
वो गिरीश गंगाधर हैं।
कर में जिनके त्रिशूल साजे,
वाम अंग “मां”गौरी विराजें
शिरोधरा में विचरें भुजंग
वो आशुतोष,शिव शंभू शंकर,
वो विश्वनाथ वो नीलकंठ,
पीड़ा का सबकी कर दें अंत।
चंद्र शिखर पर धारण करते,
वो चंद्रशेखर वो महादेव,
कैलाश पति को है नमन।
आज शिव रात्रि है,
उनके विवाह की वर्ष-गांठ।
आज अपने विवाह की वर्ष-गांठ पर,
घूम रहे हैं कैलाश पर,
गौरीनाथ थाम कर हाथ,
निज वनिता का।
है अनंत काल तक साथ,
दिवस हो या रात
अभिनंदन है उमा-महादेव का।
ललाट पर लगाकर चंदन,
करें उमा-महादेव का वंदन।
पूजा में अर्पित करें,
बेलपत्र भांग, धतूरा,
दूध शहद रोली-मौली
धूप दीप नैवेद्य से,
पूजन हो गौरी महेश का।
पंच फल, गंगाजल
अर्पण हो वस्त्र, जनेऊ और कुमकुम का।
इस प्रकार अभिनंदन हो मां पार्वती और शिव का
पुष्पमाला, शमी का पत्र,
खसखस लोंग सुपारी पान,
खुशबूदार इलायची द्वारा,
करें उमा-महादेव का स्वागत सम्मान।
समग्र सृष्टि है जिनकी शरण में,
कर बद्ध नमन है,उमा-महादेव के चरण में।।
______✍️गीता -
कहीं आग कहीं पानी
बहुत हो चुकी नफरत की आग
जल रहे हैं दिल के जंगल
मुहोब्बत कर चुके हैं खाक,
अब नहीं रही वैसी धाक
जो एक नजर पर
चुरा ले जाती थी दिल,
अब तो नजरें मिला पाना भी
हो गया है मुश्किल,
क्योंकि सच सामने आते ही
रिश्तों की बुनियाद जाती है हिल।
कहीं आग है
कहीं पानी है,
फिर भी न बुझा पाये तो
हमारी नादानी है। -
कोई तो है पास
स्याह काली रात
किस तरह हो
सितारों से
मतलब की बात,
कुंडली में अंकित
ग्रह नक्षत्र,
दिख रहे आकाश में,
मगर भाग्य है अवकाश में,
फिर भी हूँ आस में,
क्योंकि कोई तो है पास में। -
कि तुम याद आ गयी
आज सोच रहा था कोई कविता लिखू
पर कैसे ये सोच ही रहा था
की तुम याद आ गयीनयन अदृश्य कामना में लीन हो गए
वो संसय वो समपर्ण वो अभिधान(नाम)
सब कुछ तो शायद मैं भूल ही गया
कि तुम याद आ गयीइस मनः स्थिति की दशा एक भ्रमर की भांति है
जो गुन गुन तो करता पर उड़ता नहीं है
स्वप्न का आदर्श निश्चय ही एक प्रतीक बन गया
तो क्या अब सब कुछ निश्चित हो गया
ये सोच ही रहा था कि
कि तुम याद आ गयीमन तो अब खुद पर भी व्यंग करता है
कुछ प्रश्नों से वो मुझे भी दंग करता है
होठों पर मुस्कुराहट आयी ही थी
कि तुम याद आ गयी -
हो गया है उजाला
हो गया है उजाला
अब मुझे भान हुआ
जब खुली आँख तब
सुबह का ज्ञान हुआ।
इन चहकते हुए
उड़गनों ने बताया,
जाग जा अब तो तूने
अंधेरा है बिताया,
हो गई है सुबह
साफ कर तन वदन
दूर आलस भगा ले
कर्मपथ पर लगा मन।
रात भर स्वप्न देखे
अब उन्हें कर ले पूरा
इस तरह काम कर ले
रहे मत कुछ अधूरा। -
ले गए याद सभी
अंधेरे का गीत लिखूं
या सुबह की आस लिखूं
नींद आ-जा रही है,
और कुछ खास लिखूं।
स्वप्न हैं पास खड़े
इंतजार करते हैं,
बन्द आँखों में ही,
वे राज करते हैं।
बात गम की भी न थी,
साख कम भी न थी,
फिर भी मुड़कर के देखा
आंख नम भी तो न थी।
हम तो कहते ही रहे
बैठो जाओ न अभी,
मगर वो खुद तो गए
ले गए याद सभी। -
पतझर
आंखे तेरी सब कह देती है
हाले दिल बयां कर जाती है
जो कह नही पाते हो जुबान से
वही दर्द वो चुपके से बता जाती है
संगी बिन जीना कितना मुश्किल
दिल का आर्तनाद सुना जाती है
जो प्यार तुम जीवन भर बता ना सके
उसी प्रीत की चुगली कर जाती है…उसने जताया पल-पल प्रेम,
मांग दुआ,
व्रत-उपवास रख
वो भी जुबान से कुछ ना कहती थी….वो जीवित है भीतर तेरे,
चलती है श्र्वासो की तरह,
यह तेरे अश्रुरहित भीगे नयन,
गूंजती दबी सी हंसी
तभी तो पतझर से लगते हो।। -
“दीपक और पतंगा”
पतंगे की कहानी:-
**********************
शाम हुई लेकर तम को
अपने संग आई,
नहीं दिखा कुछ भी मुझको तो
माचिस ले आई.
जला दिया और गुनगुन करके
गीत सुनाया
तभी उधर से उड़कर एक
पतंगा आया
दीपक बोला:-
मत जल तू मुझसे बस थोड़ा
दूर चला जा
पतंगे ने कहा:-
परवाना हूँ मैं, तू मेरे आगोश में आ जा
तू मेरी लौ में जल करके मर जाएगा
ना पगले ! ये दीवाना तुझ बिन मर जाएगा
तेरी लौ में जलने का भी तो एक मजा है
महबूब को पाकर खो देना भी
बड़ी सजा है
पतंगे ने दीपक की लौ में कुर्बानी दे दी
दीपक ने बुझकर शोक सभा भी
कायम कर दी
रहा अंधेरा फिर ना मैंने दीप जलाया
प्रशांत में देखकर तेरी प्रतिमा
नीर बहाया… -
Happy International Women’s Day
Happy International Women’s Day नारी हर घर की शान होती हैं, आज के युग में तो नारी घर के साथ साथ सभी क्षेत्रों में अपना स्थान बना चुकी हैं। महिला समाज एवं परिवार का मुख्य आधार होती हैं। महिलाएं समाज को सभ्य बनाने से लेकर देश के विकास में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। आज महिलाओं ने खुद को हर क्षेत्र में साबित किया है।
इंसान के वजूद के लिए आसमान का होना बेहद ज़रूरी है, इसी से हमें बारिश मिलती है और इसी से हमें धूप भी मिलती है। किसी ने आसमान की ऊंचाई से अपने ज़ज़्बे को मापा है तो किसी ने आसमान में ख़ुदा को ढ़ूंढ़ने की कोशिश की है लेकिन यह हमेशा ही मानवीय-जिज्ञासा का विषय रहा है।
हैलो, (Heloo /Hi ) मैं हूँ अनु मेहता। मैं आज आपके सामने एक बहुत मेहनती और बहादुर और हिम्मती लड़की के बारे में बताना चाहती हूँ “छू ले आसमान” कविता को पूरा पढ़े….
आईये पढ़ते है. कुछ ऐसे ही मेहनती और निडर शेरो के बारे में परिचय करवाती हूँ.. जिन्होंने ये साबित कर दिया है लड़किया लड़को से 100 क्या 1000 कदम आगे है जो आसमां की इन्हीं खूबियों को अपने में समेटे हुए हैं……. एक ऐसी लड़की जिसने कम उम्र में इतनी सारी मेहनत कर के अपने माता – पिता (मम्मी डैडी) का नाम रोशन किया है और आने बाली युवा- बर्ग को आगे बढ़ने के लिए प्रेरित किया है……. और उन्होंने खुद को हर क्षेत्र में साबित किया है। एक अच्छी बेटी, एक अच्छी बहन, एक अच्छा इंसान, एक अच्छी मालिक(A good daughter, a good sister, a good person, a good boss, a good author) उसका नाम ऐश्वर्या नीर (Aishwarya Nir) है, Nir Mam Director At Aishwarya Group And founder of Global Beauty Secrets…
Nir Mam के बारे में अधिक जानकारी चाहिए तो https://discovergbs.com
https://discovergbs.com इस लिंक पे क्लिक करे………“छू ले आसमान” को पीछे मुड़कर ना देख,
ये दुनिया आप से जलती है और जलती रहेगी….
आप से बढ़कर इस दुनिया में ना कोई है, ना कोई देखा और कोई ना ही होगा,
आज दिल की बात मेरी जुबाँ पर आ गई,
क्या खूब हैं आपकी आँखे, इन आँखे में जिंदगानी है हमारी,
आप सुंदरता की मूरत हो,
अपने मम्मी पापा की आंखों का नूर हो,
अपने भाई की जान- जहांन हो,
आप मृगनयनी हो, चंचल चितवन, चितचोर हो,
काले बादलों जैसा लंबे घने जो बाल आपके, कपोलों पर पड़ती एक लट, अद्भुत लगती है।
दामिनी जैसी आग है आप में,
क्रोध कभी देखा नहीं,
मैं ज्यादा जानती नहीं आपको,
दया की मूर्ति, करूणा की सागर हो,
कल -कल करती नदी के जेसी, बाधाओं को पार करती हो,
विशाल सागर जेसा दिल, जिसमें दुखियों के
दुख समेटने की ताकत है रखती हो आप
इतना ही जानती हूँ आपको, हमारी कंपनी का मान-समान हो आप, अपनी मेहनती और निडरता से चार चांद लगती हो आप….
Happy Woman Day Mam
अगर आपको “छू ले आसमान” कविता पसंद आये तो Plz , Like, Share, Comment करना ना भूले……. Thank You -
पानी तूने धो दिये
पानी तूने धो दिये, बड़े बड़ों के दाग,
तब भी हो पाया नहीं, मेरा मन बेदाग,
मेरा मन बेदाग, नहीं कुछ साफ भाव हैं,
जूते भीतर कीच, सने गंदले पांव हैं,
कहे लेखनी खूब, रही कवि की नादानी,
जहां दाग थे वहाँ, नहीं पहुँचाया पानी। -
“नारी का सम्मान”
💞Women’s Day Special poetry💞
************************************
महिलाओं की बात निराली,
माँ, भगिनी हो या घरवाली ….
इनसे ही संसार बसा है
दिल में प्रेम अपार छुपा है….
सुंदर सबका रूप सजीला
परिधान है इनका रंग-रंगीला….
ये होती हैं दिल की अच्छी
हाँ, थोड़ा-सा गुस्सा करती….
सबको अपना प्यार दिखाती
रिश्तों को भी खूब निभाती…..
हर मैदान फते कर जाती
पुरुषों को पीछे कर जाती…..
जिस घर में नारी पूजी जाती
लक्ष्मी जी उस घर में रहती…..
जहां उनको दुत्कारा जाता
मारा जाता पीटा जाता….
होता उसका नाश सदा है
इतिहास इसका साक्ष्य रहा है…
नारी का सम्मान करो सब
हे लेखनी ! उसका गुणगान करो अब….
इसमें ही है सबकी भलाई
महिला दिवस की सबको खूब बधाई… -
सुनो वनिता
संसार द्वारा रचित तुम्हारी महानता
के प्रतिमान वास्तव में षड्यंत्र हैं
तुम्हारे विरुद्ध…!!
तुम सदा उलझी रही स्वयं को उन
प्रतिमानों के अनुरूप ढालने में
और वंचित रही अपने सुखों से..!!सुनो वनिता!
जब तक तुम अनभिज्ञ हो इस तथ्य से कि
“तुम्हारा सुख तुम्हारी महानता में नहीं
वरन तुम्हारे साधारण होने में है”…
तब तक ये सृष्टि हो नहीं सकेगी
तुम्हारे योग्य…!!©अनु उर्मिल ‘अनुवाद’
(08/03/2021) -
वह नारी है
होली के रंगों सी मुस्कुराए,
दीवाली के दीपों सी जगमगाए,
बेटी बनकर घर महकाती है,
बहन बनकर लुटाती है स्नेह
बनकर वनिता और वधू
दूजे का घर अपनाती है।
प्रयत्न करती है,सबको सुख देने का,
प्रेम से उस घर को अपना बनाती है।
दे कर जन्म इन्सान को,
उसे इन्सानियत सिखाती है।
प्रभु की नेमत है वह,
रचती सृष्टि सारी है,
ज़रा से प्यार के बदले,
सर्वस्व लुटा दे, वह नारी है।।
______✍️गीता
*अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं* -
पदर माझ्या माईचा
माझ्यासाठी तो राब राबतोया ,
अन् उन्हातात तो खपतोया ,
काट्याकुट्यात ही झटतोया ,
असा पदर माझ्या माईचा….जीव तीचा तुट तुट तुटतोया ,
आपल्या लेकरासाठी तो रडतोया ,
स्वताःच्या सुखालेही गाडतोया
असा पदर माझ्या माईचा …दुःखाच्या डोंगरांना पाडतोया ,
काटे रस्तातले माझ्या झाडतोया ,
संकटालाही तो नडतोया ,
असा पदर माझ्या माईचा….सावली मस्तकी माझ्या धरतोया ,
जीवनातील व्यथा दुर करतोया ,
माझ्यासाठी तो मर मर मरतोया ,
असा पदर माझ्या माईचा….सदैव कष्टात तो राहतोया ,
गीत सुखाचे नेहमी गातोया ,
माझ्या यशाचं सपान पाहतोया ,
असा पदर माझ्या माईचा….मायाममता तो मजवर करतोया ,
छाया सुखाची नेहमी धरतोया ,
लाडाने डोहीवर फिरतोया ,
असा पदर माझ्या माईचा….✍🏻प्रमोद उगले(पत्रकार)
Pramodugale.blogspot.com -
नारी तू ही शक्ति है (महिला दिवस पर विशेष)
नारी तू कमजोर नहीं, तुझमें अलोकिक शक्ति है,
भूमण्डल पर तुमसे ही, जीवों की होती उत्पत्ति है।
प्रकृति की अनमोल मूरत, तू देवी जैसी लगती है,
परिवार तुझी से है नारी, तू दिलमें ममता रखती है।।म से “ममता”, हि से “हिम्मत” ला से तू “लावा” है,
महिला का इतिहास भी, हिम्मत बढ़ाने वाला है।
ठान ले तो पर्वत हिला दे, विश्वास नहीं ये दावा है,
हिम्मत करे तो दरिंदों की, जान का भी लाला है।।याद कर अहिल्याबाई, रानी दुर्गावती भी नारी थी,
दुश्मन को छकाने वाली, लक्ष्मी बाई भी नारी थी।
शीशकाट भिजवाने वाली, हाड़ीरानी भी नारी थी,
सरोजिनी नायडू, रानी रुद्रम्मा देवी भी नारी थी।।वहशी हैवानों की नजरों में, रिश्ते ना कोई नाते है,
मां, बहन, बेटियों से भी, विश्वासघात कर जाते हैं।
मौका मिले तो वहशी गिद्ध नोच नोच खा जाते हैं,
सबूत के अभाव में दरिंदे, सज़ा से भी बच जाते हैं।।तू ही काली, तू ही दुर्गा, तू ही मां जगदम्बा है,
खड़्ग उठाले उस पर तू, जो मानवता ही खोता है।
निर्बल समझे जो तुझको, पालता मन में धोखा है,
सबक सिखादे वहशियों को, समझते जो “मौक़ा” है।।आम आदमी समीक्षा और चर्चा कर दूर हो जाते हैं,
पीड़ित नारी “अपनी नहीं”, इसी से संतुष्ट हो जाते हैं।
घटना घटने के बाद बहना, सब सहानुभूति जताते हैं,
जिम्मेदार, संभ्रांत व्यक्तियों के, वक्तव्य छप जाते हैं।अब नारी तू ही हिम्मत करले, शक्तियों को जगाले तू,
अपने मुंह को ढकने वाले, पल्लू को कफ़न बनाले तू।
इज्ज़त पे जोभी हाथ डाले, उसीको सबक सिखादे तू,
आंखों से खूनी आंसू पोंछ, गुस्सेको हथियार बनाले तू। -
बोलूँ कैसे बात
चुप रहना आता नहीं, बोलूँ कैसे बात,
चावल पककर बन गया, गीला गीला भात,
गीला गीला भात, हर तरफ पानी पानी,
सूखे सूखे होंठ, और मन में नादानी,
कहे लेखनी बात समझ मन तू जा अब छुप,
कर अनदेखी आज बोल मत हो जा तू चुप। -
अमृत कलश
स्वर्णिम किरणों के रेशमी तार
मन सबके मनके जैसे वो हार
कितना उसको है मुझसे लाड़
सुर संगीत लिए आता सबके द्वारसुनते हैं ऊज्ज्वलता का श्रोत वहीं
श्रृष्टि की सुन्दरता का वो ही रथी
बल बुद्धि ज्ञान का भंडार सही
तभी तो अहंकार का लेश नहींदिनकर दरस को न तरसे कभी
इतनी ही आकांक्षा ईश से है
अमृत कलश तूं अमर रहे यही
इतनी प्रार्थना जगदीश से है -
यश
यूं ही नहीं मिलता किसी का साथ
ये तो जन्मों जन्मों की अधूरी आशखेल कूद कर संगी साथी के संग
खबर न हुई कब बड़े हो गए
कीमती उनकी यादों के तार ने
सूने पल के गुजरने का सहारा बनेवक्त के साथ यादों पर धूल जमी
कभी हमी हतास कभी उनकी कमी
भूल कर प्रीत को जब आगे बढ़े
खूबसूरत अहसास थे पर में पड़ेसाथ बचपन की महक थी कहीं दबी
दूब को नमी मिलते ही वो चल पड़ी
मीठी सी आस है फिर तेरी प्यास है
शैशव में थे अकेले अब पूरी बारात हैफिर है मौका तेरे बचपन में जाने का
यादों के आंगन को फिर से जिलाने का
यश है तूं सभी के लिए ही जीना तेरा
तेरे खुशबू से है महका सूना मन मेरा -
तुम शायद जान नहीं पाए
*एक अंश तुम्हारा मुझमें है, तुम शायद जान नही पाए।
हर पल मैं तुममे दिखता हूँ, तुम शायद मान नहीं पाए।।*अब कैसे मैं तुमको दिखलाऊं ये सपना नहीं हकीकत है
जीवन का हर एक रंग ढंग यह निश्चित नहीं कदाचित है
अब तो खोलो आँखें अपनी जीवन को जान नहीं पाएं*हर पल मैं तुममे दिखता हूँ, तुम शायद मान नहीं पाए।।*
आयाम तेरे इस जीवन का फिर कौन भला क्यों समझेगा
तू आज नही तो कल लेकिन इस संसय में ही तड़पेगा
यह कुंठा है तेरे मन की जिससे तुम पार नहीं पाए*हर पल मैं तुममे दिखता हूँ, तुम शायद मान नहीं पाए।।*
मैं भीष्म नहीं ना अर्जुन हूँ ना और कोई अंदाज़ मेरा
तेरे जीवन पर न्यौछावर ये सपनो का संसार मेरा
अब साथ नहीं तो लगता है जीवन को जान नहीं पाए*हर पल मैं तुममे दिखता हूँ, तुम शायद मान नहीं पाए।।*
-
मरीचिका
सुंदरता के प्रति हमारा उन्माद इतना
अधिक रहा है कि हमनें तकनीकों
का सहारा लेकर हर वस्तु को
सुंदर बनाने का भरसक
प्रयास किया…!!जबकि हमें बदलनी चाहिए थी अपनी
दृष्टि जो रचती है भेद सुंदरता
और असुन्दरता का !!दुर्भाग्य से हम विफ़ल रहे हैं समस्याओं
के वास्तविक मूल को पहचानने में और
भटकते रहते हैं अपने मन द्वारा
रचित मरीचिकाओं में..!!©अनु उर्मिल ‘अनुवाद’
(06/03/2021) -
प्रार्थना
प्रिय 2020 तेरी विदाई में अब क्या शब्द कहूं,
हंगामेदार मौजूदगी की बातें किस मुंह से कहूं।
कभी सुना और सोचा भी नहीं वो सब घट गया,
तेरे काल में कोरोना का भारी आतंक मच गया।।लोकडाउन कर दुनिया में ताले तूने लगावा दिए,
मुंह बंद करवाए तूने, हाथ कई बार धुलवा दिए।
घरों में बंद करवाया हमको बाजार सूने करा दिए,
हर एक को डराया तूने मौत के दर्शन करवा दिए।।दूध के जले छाछ को भी फूंक फूंक कर पीते हैं,
साल 2021 का स्वागत हम डर डर के करते हैं।
आओ हम सब मिलकर प्रार्थना प्रभू से करते हैं,
मिट जाए कोरोना जग से, यही आशा रखते हैं।।राकेश सक्सेना बून्दी राजस्थान
9928305806 -
निज को परख
हद में रह
ज्यादा न बोल
फट जाए कहीं
जैसे कोई ढोलबड़ा या छोटा
समझ तो रख
तूं है क्या
निज को परखपिता हैं तेरे
आंखें न दिखा
पुत्र तैयार खड़ा
तेरा लौटाने कोनीचे ही बहती
तट तालाब सभी
पेय ऊपर फेंकी
शक्ल नीचे अभीआदर देकर ही
सबका हो पायेगा
स्वयं में खोकर
सब कुछ गंवाएंगा -
नन्हीं चिड़िया
बड़े का नाम बहुत ही है दुनियां में
छोटी चीजें पर खुशी का है कारणनन्हीं नन्हीं चिड़िया जमी पर फुदकती हुई
कितनों के मन को करती थी हरण
आज उनके बिना सुबह सूनी लगती
सबके ही जगने का जो थी कारणकाली सफेद लिबास में लिपटी हुई
नृत्य उसका मनोरंजन था कितना
कैसे कोई जीवंत उदाहरण भी
बन जाता है ऐसे इक दिन सपनाओझल हो चुकी ऐसा लगता था
इक्की दुक्की फिर हैं दिखने लगी
आओ संभाले कीमती नन्हीं परियों को
स्वर में जिनकी ईश ने मधुर संगीत भरी -
कचहरियां
अप्रमेय तथ्य है सदा से ही अविकल्प
जीवन में शांति उन्हीं से पर है कायम
प्रमाण सदन तो कुंठा से ही भरे हुए
जीवन अवसाद का जो सदा बने कारणन्याय नाम से मची है वहां पर अंधी दौड़
अन्याय का हितैषी है जहां का हर अवयव
काग भुसुंडी से दिखते हैं चारोओर कौवे
ज्ञान अंशमात्र भी कहां है पर वहां सुलभतिल मात्र सा भी दरार है जिन रिश्तों में
तार बनाने का इन्हें है डिप्लोमा हासिल
जन जो पहुंचे थे जख्म मरहम लेने यहां
जीवन नर्क बना गया जो भी था हासिलफिर भी कहां कमी है इनकी महफ़िल में
हर दिन निरीह आ फंसते हैं आश लिए
बिन सोचे करने की बनी आदत जिनकी
शतरंज बिछा फांसने का नया जाल लिएझगड़ा मतभेद स्वार्थ इंसानो को अक्सर
बेईमान कचहरियों के आंगन पहुंचाते हैं
सरकारी तंत्र सारे ही उलझे हैं यूं बदस्तर
कहां सफल हुए हैं भ्रष्टाचार और बढ़ाते हैं -
भूले- बिसरे गीत
घर आया है रात का पंछी
करने लाख सवाल
होठों पर अनुपम हिंदी
हाथों में है गुलाल।
रंग डालेगा शायद मुझको
मनसा उसकी लगती है
गीली-गीली उसकी आंखें
थोड़ा मुझको लगती है।
बैठ गया है चादर पर वह
दोनों पैर पसारे
गाने लगा है मीठी धुन में
भूले-बिसरे गीत हमारे।
” मैंने तो था चाहा जिनको वो ना हुए हमारे
हाय तौबा! वो ना हो हमारे”………..।। -
मेरी गुड़िया बड़ी हो गई…
मेरी नन्ही सी गुड़िया
खिलौनों से खेलते खेलते
न जाने कब बड़ी हो गई!
आज जब देखी उसकी हाथों में चूड़ियां
सिर पर लाल चुनर
तो समझ में आया।
जो आंगन में फुदकती रहती थी,
दिन भर खेलती रहती थी,
अपने आगे पीछे सबको नचाया करती थी
बातों का खजाना रहता था जिसके पास,
अपनी नादान हरकतों से
सबको हंसाया करती थी।
वह गुड़िया आज इतनी बड़ी हो गई कि
उसे डोली में बिठाकर,
उसके सपनों के राजकुमार के साथ
विदा करने का वक्त आ गया है।
हां जी ! सच में मेरी गुड़िया बड़ी हो गई।। -
मनु
मनु
मनु तू दौड़ता रह निरंतर
गलत, सही का कर अंतर
ठोकरें मिलेंगी अनन्तर
गिर, उठ फिर चल निरंतरमनु तू कौशिश कर निरंतर
हार जीत में ना कर अंतर
मौक़े और मिलेंगे अनन्तर
हिम्मत रख जीतेगा निरंतरमनु तू विश्वास रख निरंतर
खुशी, दु:ख में ना कर अंतर
दुनियां का दायरा है अनन्तर
दु:ख के बाद खुशियां निरंतरमनु तू मानव ही रह निरंतर
अमानवीयता में कर अंतर
सत्य, कर्म पथ है अनन्तर
उसी पर चलता रहा निरंतरराकेश सक्सेना बून्दी राजस्थान
9928305806 -
एहसास
कुछ एहसास हैं जो आकर ठहर गये हैं
ज़बान की नोंक पर…
होंठो की सीमाएँ लाँघने को आतुर,
बस उमड़ पड़ना चाहते हैं एक
अंतर्नाद करते हुए…!!मगर उन एहसासों के पैर बंधे हुए हैं
एक डर की ज़ंजीर से…!!
वही जाना-पहचाना डर “उसे खो देने का”
जिसे पाया है बड़ी मुश्किल से
या फिर इस भ्रम के टूट जाने का
कि हाँ! वो मेरा है…!!सच कुछ एहसास कितने बदनसीब होते हैं
लफ्ज़ों के साँचे में ढलते ही बिखेर कर
रख देते हैं ख्यालों की खूबसूरत दुनिया को..!!
कुछ रुई के फाहों से कोमल सपनें खो
देते हैं अपनी धवलता उन शब्दों के
पैरों तले दबकर..!!आख़िर कितना न्यायसंगत है उन एहसासों
को हकीकत के धरातल पर उतारना
बेहतर यही है कि वो दम तोड़ दें
हलक के भीतर ही….!!©अनु उर्मिल ‘अनुवाद’
(05/03/2021) -
“लेकर गुलाल रंगने लो हम आ गये”
इस फिजा में संवर कर लो हम आ गये,
कुछ अलग ही तेवर लेके लो हम आ गये…
थी नाराजगी यहाँ की हवाओं से हमको,
बदलकर हवाएं लो हम आ गये..
कुछ थे दुश्मन हमारे तो कुछ परवाने,
भुलाकर सभी गिले-शिकवे लो हम आ गये…
समयाभाव था मेरे जीवन में खालीपन,
लेकर थोड़ी फुर्सत लो हम आ गये…
मोहब्बत के मारे थे हम तो बेचारे,
भूलकर उस खता को लो हम आ गये…
स्वागत में हमारे हो कविता तुम्हारी,
है सावन हमारा और गीता हमारी…
हो गुलजार उपवन, है होली का मौसम,
लेकर गुलाल रंगने लो हम आ गये….. -
पैगाम ए मोहब्बत ” आर्यन सिंह
आर्यन सिंह की रचना से कुछ चुनिंदा शायरी एंड पक्तियाँ निकाली है जिनसे साफ पता चलता है कि आर्यन का दिल इश्क के समुंदर मे हिलोरें ले रहा है
ना जाने कौन हैं आर्यन की सच्चे इश्क़ की प्रतिमा वह लड़की ( रश्मि यादव, जो कि संगीत कलाकार हैं ) जिसके लिए आर्यन ने कविता के जरिये पैग़ाम किया है !1.
मोहब्बत है हमे जिससे ख्यालों का समुंदर है
नही मालूम तक उसको यहाँ उसका सिकंदर है
ये रिश्ता कब हकीकत मे हमे आशिक बनायेगा
मैं हूं अपने हुसूलों पर वो मर्यादा के अंदर है2.
अभी तो ख्वाब लगता है इश्क के पल सजाने मे
अभी डर सा सताता है किसी को सच बताने में
समझ आता नही कैसे करूँ इजहार सपनो को
बंदिशें घेर लेती हैं कि उसके पास जाने मे .3.
लहर आई समुंदर में ज्वार हिलने नही देता
सूर्य का ताप कीचड़ मे कमल खिलने नही देता
वही हालात दिखते हैं मोहब्बत की ये दुनिया मे
कोई दुश्मन मुझे उनसे अभी मिलने नही देता4.
है ताकत प्यार की मुझमे मोहब्बत रंग लाएगी
कोई ब्रह्मांड की ताकत ना हमको रोक पाएगी
जिस्म के मोह से हटकर प्यार का भाव रखता हूं
लफंगो की होशियारी हमें क्या आजमाएगी
5.
नशा करके मोहब्बत का मैं फिर से आज पछताया
ढूंढकर थक गया जानी मगर तुझको नही पाया
भाव नफरत का ठुकराकर तुम्हे अपना बनाया था
बन गए अजनबी फिर हम इश्क इस मोड़ पर लाया6.
अगर मुझको मिल जाए पैगाम तेरा तो सारी किताबें यहीं छोड़ दूंगा
मैं दिल से लगाकर पढूंगा तुम्हारा रिश्ता भी सब लोगों से तोड़ दूंगा7.
शरारत भरे जिस्म पर क्यों गुरूर करती है
ये नजाकत ही तुझे मुझसे दूर करती है
पछताओगी मुझे छोड़ कर ओ परियों की रानी
क्योंकि बार बार तू वही एक कसूर करती है8.
खामियां थमती नही मोहब्बत के उस दौर में
मैं एक इम्तिहान को अंजाम देता हूँ तो नया इम्तिहान तशरीफ लाता है9.
अजीब सी चहल ही इस शहर में जिस रास्ते से होकर निकलता हूँ मोहब्बत के परिंदे नज़र आते हैं.10.
अजीब दास्तान हैं तेरे इश्क की ए आर्यन, इम्तिहानों से टकराकर निकला है मोहब्बत को पाने के लिए.संकलन –
आर्यन सिंह यादव
( प्रसिद्ध लेखक & टीबी आर्टिस्ट )
Official number –
9720299285 -
जीवन की पहेली
मैं दौड़ती ही जा रही थी,
ज़िन्दगी की दौड़ में।
कुछ अपने छूट
गए इसी होड़ में।
मैं मिली जब कुछ सपनों से,
बिछड़ गई कुछ अपनों से।
दौड़ती जा रही थी मैं,
किसी मंज़िल की चाह में,
कुछ मिले दोस्त,
कुछ दुश्मन भी मिले राह में।
कभी गिरती कभी उठती थी,
इस तरह मैं आगे बढ़ती थी।
कभी चट्टाने थी राहों में,
कभी धधकती अनल मिली।
कहीं-कहीं दम घुटता था,
कहीं महकती पवन मिली।
यूं ही तो चलता है जीवन,
कैसी यह जीवन की पहेली।
कुछ यादों के फूल खिले,
कुछ खट्टी-मीठी स्मृति मिली।।
______✍️गीता