अन्नदाता की व्यथा

टुकड़े-टुकड़े हुई मेदिनी , कैसी ये लाचारी है ।
ऐसे उजड़े खेत कि जैसे , कोई विधवा नारी है ।

शीश पकड़ बैठा किसान है , प्रश्न हजारों साल रहे ।
कैसे अन्न उगाऊँ मैं यदि , सूखे जैसे हाल रहे ।
बिन बरसे ही मेघ सिधारे , प्यासी धरा हमारी है ।।
ऐसे उजड़े खेत कि जैसे , कोई विधवा नारी है ।

कर्जदार था पहले से ही , धरती माता रूठ गई ।
कैसे मैं परिवार चलाऊँ , आस अन्न की टूट गई ।
व्यथा वंश की शूल चुभाए , भार हृदय पर भारी है ।।
ऐसे उजड़े खेत कि जैसे , कोई विधवा नारी है ।

जल बिन जीवन हुआ असंभव , चमत्कार विधिना कर दे ।
कहीं पेड़ से लटक न जाऊँ , खेतों में पानी भर दे ।
पानी लेकर अन्न दान दूँ , उतरे सभी उधारी है ।।
ऐसे उजड़े खेत कि जैसे , कोई विधवा नारी है ।

करुण पुकार न पहुँची उस तक , जो जग का पालनहारा ।
समाधान जब नहीं हुआ तो , तरुवर पर फंदा डारा ।
झूल गया यूँ कृषक निशा में , गृह में सुता कुंवारी है ।।
ऐसे उजड़े खेत कि जैसे , कोई विधवा नारी है ।

✍ माया अग्रवाल
👉 विशाखापट्टनम


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6 Comments

  1. महेश गुप्ता जौनपुरी - May 20, 2020, 7:26 pm

    वाह बहुत सुंदर

  2. Pragya Shukla - May 20, 2020, 8:41 pm

    Good

  3. Abhishek kumar - May 20, 2020, 8:48 pm

    👌

  4. Pt, vinay shastri 'vinaychand' - May 20, 2020, 9:02 pm

    Nice

  5. Dhruv kumar - May 22, 2020, 9:26 pm

    Nyc

  6. Satish Pandey - July 21, 2020, 7:28 pm

    Ati sundar varnan

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