काँव काँव मत करना कौवे

काँव काँव मत करना कौवे
आँगन के पेड़ों में बैठ
तेरा झूठ समझता हूं मैं
सच में है भीतर तक पैठ।
खाली-मूली मुझे ठगाकर
इंतज़ार करवाता है,
आता कोई नहीं कभी तू
बस आंखें भरवाता है।
जैसे जैसे दुनिया बदली
झूठ लगा बढ़ने-फलने
तू भी उसको अपना कर के
झूठ लगा मुझसे कहने।
रोज सवेरे आस जगाने
काँव-काँव करता है तू
मुझ जैसों को खूब ठगाने
गाँव-गाँव फिरता है तू।
अब आगे से खाली ऐसी
आस जगाना मत मुझ में
तेरी खाली हंसी ठिठोली
चुभती है मेरे मन में।


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10 Comments

  1. Geeta kumari - February 21, 2021, 10:49 am

    किसी अपने की प्रतीक्षा में लिखी गई कवि सतीश जी की बहुत सुन्दर कविता और संसार में झूठ बोलने की आदत पर भी विचार व्यक्त करती हुई अति उत्तम रचना

  2. Piyush Joshi - February 21, 2021, 11:06 am

    बहुत खूब, अति सुन्दर

  3. Devi Kamla - February 21, 2021, 11:08 am

    शानदार लेखन

  4. Rakesh Saxena - February 21, 2021, 7:47 pm

    अति उत्तम

  5. Pt, vinay shastri 'vinaychand' - February 22, 2021, 7:33 pm

    बहुत खूब

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