कोहरा..

कोहरा देख कर , मैं इक पल को रुकी थी,
मैं बढ़ती रही आगे, और कोहरा छंटता गया…

*****✍️गीता*****


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20 Comments

  1. Piyush Joshi - September 29, 2020, 5:21 pm

    वाह वाह, गजब की लेखनी, गजब का लेखन

  2. Isha Pandey - September 29, 2020, 5:29 pm

    बहु
    बहुत खूब, वाह वाह, बहुत सुंदर कविता

    • Geeta kumari - September 29, 2020, 5:42 pm

      सुन्दर समीक्षा हेतु आपका हार्दिक धन्यवाद ईशा जी ।

  3. MS Lohaghat - September 29, 2020, 5:50 pm

    बहुत बढ़िया लिखा है

  4. Satish Pandey - September 29, 2020, 6:17 pm

    मैं बढ़ती रही आगे, और कोहरा छंटता गया…
    बहुत खूब लिखा है आपने गीता जी, आगे बढ़ने की बेहतरीन भावना का चित्रण एक सुलझी हुई लेखनी ही कर सकती है। आपकी प्रतिभा व क्षमता को अभिवादन

    • Geeta kumari - September 29, 2020, 6:36 pm

      आपकी सटीक समीक्षा और भाव को समझने के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद सतीश जी । सराहना के लिए आपका बहुत बहुत आभार ।

  5. Ramesh Joshi - September 29, 2020, 6:29 pm

    आगे बढ़ते रहे कोहरा छंटता गया वाह। ये होती है कविता, वाह

  6. Suman Kumari - September 29, 2020, 8:00 pm

    सुन्दर

  7. Chandra Pandey - September 29, 2020, 9:56 pm

    Very very nice

  8. Devi Kamla - September 29, 2020, 9:59 pm

    बहुत खूब wow

  9. मोहन सिंह मानुष - September 29, 2020, 10:32 pm

    बहुत सुंदर पंक्तियां

  10. प्रतिमा चौधरी - September 30, 2020, 10:36 am

    उत्साह व आगे बढ़ने की प्रेरणा देती हुई सुंदर पंक्तियां

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