खुशबू नहीं रही

मुझे मिटाकर कहता है वो
तुम पहले जैसी नहीं रही,
फकत शक्ल ही बची है
खुशबू नहीं रही…

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जो तुम चिर प्रतीक्षित  सहचर  मैं ये ज्ञात कराता हूँ, हर्ष  तुम्हे  होगा  निश्चय  ही प्रियकर  बात बताता हूँ। तुमसे  पहले तेरे शत्रु का शीश विच्छेदन कर धड़ से, कटे मुंड अर्पित करता…

नारी वर्णन

मयखाने में साक़ी जैसी दीपक में बाती जैसी नयनो में फैले काजल सी बगिया में अमराई जैसी बरगद की शीतल छाया-सी बसन्त शोभित सुरभी जैसी…

Responses

  1. मन में उठ रहे जज्बात, ठेस मिलने पर उपजी संवेदना, परिलक्षित हो रही है। भाव और लय का सुन्दर तारतम्य है।
    बहुत खूब लिखा है प्रज्ञा जी

  2. खिन्न हृदय के जज्बातों को बहुत ही खूबसूरती और लय बद्ध तरीके से बयां किया है, कवियित्री ने लेखनी में दम है भई ।

  3. सरल शब्दों में जीवन की पूर्णबंदी को उजागर करना
    सिर्फ आपसे ही ग्रहण किया जा सकता है

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