घर में डाॅन

मीच के आँखें रोते -रोते
खोज रहा हूँ होकर मौन।
मुझको रुलानेवाला जग में
छुपकर बैठा आखिर कौन?
नजर भला वो आए कैसे
घर में बैठा बनकर डाॅन ।।

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Responses

  1. जीवन के कठोर अनुभव और सच्चाई से लबरेज है यह कविता, बार बार पढ़ने और सोचने पर मजबूर कर रही है, आपकी लेखनी विलक्षण है, जन-भाषा का सुंदर प्रयोग है, बहुत सुंदर कविता।

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