**डोली अरमानों की**

अनगिनत सपनें लेकर
बैठी थी डोली में
कैसे होंगे ससुराल वाले
यह प्रश्न उठा करता था मन में
विदा होकर परिजनों से
पिया संग चल दी
मेरे अरमानों की डोली भी
मेरे साथ चल दी
मेरे सपनों को मेरा पति ही
पूरा करेगा
जिस डगर चलूंगी
मेरा साथ देगा
बसाऊंगी घर मैं उसके दिल में
कोई ना होगा संग
पर पिया साथ होगा
जब आई ससुराल तो
एक-एक करके
टूटते नजर आए सपनें
रोई मैं फूट-फूट करके
जो डोली अरमानों की
साथ आई थी मेरे
उठ गई अर्थी उसकी सदा के लिए!!

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Responses

  1. डोली अरमानों की या शीर्षक ही अपने आप में पूरे शिल्प को और कविता को समेटे हुए हैं कविता की एक खास बात होती है कि उसका शीर्षक है पूरी कहानी कह रहा हूं आपका यह शीर्षक ऐसा ही है की शीर्षक पढ़ते ही पूरी कविता पढ़ने को पाठक मजबूर हो जाता है वाकई में कभी-कभी जब विसंगत जीवनसाथी मिलता है तो ऐसे ही उठती है डोली अरमानों की शिल्प बहुत ही मजबूत और कला पक्ष बहुत ही प्रधान है आपकी यह रचना बहुत ही खास अति उत्तम है

  2. कवि प्रज्ञा जी की बहुत ही सुंदर और काबिलेतारीफ अभिव्यक्ति है यह। एक उभरती हुई रचनाकार की प्रखर झलक है वाह

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