धनुष उठायें रामचंद्र

अधर्म का हो खत्म राज
धर्म को विजय मिले,
धनुष उठाएं रामचंद्र
विश्व को निर्भय मिले।
दैत्य दम्भ खत्म हो
अहं की बात दूर हो,
घमण्ड भूमि पर गिरे,
बचे जो बेकसूर हो।
अशिष्टता समाप्त हो
अभद्र बात बन्द हो,
असंत सच की राह लें,
कदर मिले जो संत हो।
राम शर उसे लगे
गरल हो जिसकी जीभ पर,
वर्तमान शुद्ध हो व
गर्व हो अतीत पर।
रोग व्याधियां न हों
समस्त विश्व स्वस्थ हो,
हरेक तन व मन सहित
प्रकृति साफ स्वच्छ हो।
संतान हो तो इस तरह की
मातृ-पितृ भक्त हो,
सम्मान, प्रेम, त्याग की
भी भावना सशक्त हो।
धनुष उठायें रामचंद्र,
विश्व को निर्भय मिले,
अधर्म का हो खत्म राज,
धर्म को विजय मिले।
——– डॉ0सतीश चंद्र पाण्डेय
चम्पावत, उत्तराखंड।


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7 Comments

  1. Piyush Joshi - October 23, 2020, 9:05 am

    वाह
    अधर्म का हो खत्म राज
    धर्म को विजय मिले,
    बहुत ही शानदार सर, वाह क्या बात है। आप चाहें तो इस बेहतरीन कविता को पोएट्री ऑन पिक्चर काव्य प्रतियोगिता में भी डाल सकते हैं। उम्दा रचना है सर।

  2. Devi Kamla - October 23, 2020, 12:02 pm

    बहुत खूब, अत्यंत उम्दा रचना

  3. Anu Singla - October 23, 2020, 1:02 pm

    बहुत खूब लिखा है आपने

  4. Chandra Pandey - October 23, 2020, 2:34 pm

    Very very nice, wow

  5. Ramesh Joshi - October 23, 2020, 2:39 pm

    बहुत ही उत्तम कविता है सर

  6. Geeta kumari - October 23, 2020, 4:09 pm

    “,धनुष उठाएं रामचंद्र विश्व को निर्भय मिले।दैत्य दम्भ खत्म होअहं कीबात दूर हो,घमण्ड भूमि पर गिरे,बचे जो बेकसूर हो।” वाह, कवि सतीश जी की बेहद शानदार और जबरदस्त रचना । आजकल के राक्षसों को,मार गिराने की संपूर्ण योजना है इस कविता में । समाज को ऐसे ही साहित्य की आवश्यकता है आज के दौर में ।बहुत बढ़िया सर
    और मैं भी पीयूष जी की बात से सहमत हूं कि आप इसे पोएट्री ऑन पिक्चर काव्य प्रतियोगिता में भी डाल सकते हैं ।ये एक सुझाव है हो सकता है आपके पास इससे भी अच्छी कविता हो

  7. Pragya Shukla - October 23, 2020, 10:20 pm

    शानदार रचना

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