ना….री…..ना…..री….!!!

औरत मजह कोई
दिल बहलाने वाला खिलौना नहीं
जीती-जागती इंसान है
कोई क्यों नहीं समझता
कि उसमें भी जान है
पुरुष स्त्री को सिर्फ
विलासिता की वस्तु समझ लेता है
उसकी भावनाओं के संग खेलकर
सिर्फ मजा लेता है
औरतें अपने आपको
प्रेम के वशीभूत होकर पुरुष को
समर्पित कर देती हैं
बिना उसके अन्दर के पापी विचारों को जाने
देवता मान बैठती हैं
उठ जाग नारी….
तुझमें ही है दुनिया सारी
जो तू समझे पुरुष को श्रेष्ठ
तो यह तेरी गलती है भारी
ना….री…..ना…..री….!!!

Related Articles

प्यार अंधा होता है (Love Is Blind) सत्य पर आधारित Full Story

वक्रतुण्ड महाकाय सूर्यकोटि समप्रभ। निर्विघ्नं कुरु मे देव सर्वकार्येषु सर्वदा॥ Anu Mehta’s Dairy About me परिचय (Introduction) नमस्‍कार दोस्‍तो, मेरा नाम अनु मेहता है। मैं…

अपहरण

” अपहरण “हाथों में तख्ती, गाड़ी पर लाउडस्पीकर, हट्टे -कट्टे, मोटे -पतले, नर- नारी, नौजवानों- बूढ़े लोगों  की भीड़, कुछ पैदल और कुछ दो पहिया वाहन…

Responses

  1. स्वयं में ही हैं सारे पूर्ण
    अकेलेपन का अहसास अनुपम
    किंतु इसमेें ही होता अधिकार का हनन

  2. बहुत सुंदर और सच्चाई को साथ लिए हुए बेहद शानदार रचना
    “स्वयं के दोष दिखे नहीं,नारी को दोष दिया
    पुरुषों की इस सोच ने आखिर ,किसका भला किया” बहुत अच्छी कविता लिखी है प्रज्ञा ,एकदम जबरदस्त, लाजवाब👏👏

New Report

Close