मजदूर

गरीबी में पला बड़ा,धूप छाँव रहा खड़ा,

मजबूरी में पनपा,किस्मत का मारा है ।

मेहनत पर जीता रहा,हर गम पीता रहा,
देख कभी लेता नही,किसी का सहारा है ।

दो समय के खाने को,लेता नही बहाने वो,
अपने तन की पीड़ा,खुद ही नाकारा है ।

दर्द उसे भी होता है,मन ही मन रोता है,
मजदूरी के अलावा, पर नही चारा है ।।

नवीन श्रोत्रिय”उत्कर्ष”

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