मेरा मन भी करता है

इन मैले वस्त्रों में घूमूं,
अच्छा नहीं लगता है।
मैं भी कुछ बनूं,उडूं गगन को चूमूं,
मेरा मन भी करता है।
माँ संग जाना बर्तन धोना,
अच्छा नहीं लगता है।
मैं भी कुछ पढूं-लिखूं,
मेरा मन भी करता है।
फ़िर आकर अपनी झुग्गी में,
मन्द रोशनी में बैठूं,
अच्छा नहीं लगता है।
मेरे घर भी बल्ब जलें,
पढ़कर किसी परीक्षा में बैठूं
मेरा मन भी करता है।
बहुत हो चुका घर-घर का काम,
अब मैं भी विद्यालय जाऊं,
मेरा मन भी करता है।
मैंने माँ का मैला आंचल ही देखा,
सदा मन मारते देखा,पर
अब अच्छा नहीं लगता है।
पढ़ लिखकर कुछ काबिल बन कर,
माँ को सुंदर साड़ी भेंट करूं,
मेरा मन भी करता है।
____✍️गीता

Related Articles

दुर्योधन कब मिट पाया:भाग-34

जो तुम चिर प्रतीक्षित  सहचर  मैं ये ज्ञात कराता हूँ, हर्ष  तुम्हे  होगा  निश्चय  ही प्रियकर  बात बताता हूँ। तुमसे  पहले तेरे शत्रु का शीश विच्छेदन कर धड़ से, कटे मुंड अर्पित करता…

प्यार अंधा होता है (Love Is Blind) सत्य पर आधारित Full Story

वक्रतुण्ड महाकाय सूर्यकोटि समप्रभ। निर्विघ्नं कुरु मे देव सर्वकार्येषु सर्वदा॥ Anu Mehta’s Dairy About me परिचय (Introduction) नमस्‍कार दोस्‍तो, मेरा नाम अनु मेहता है। मैं…

Responses

  1. शिक्षा की ललक को दिखाती गरीब बाला की व्यथा
    प्रतिदिन भेंट मेरी है इससे आंखों देखी ये कथा

  2. पढ़ लिखकर कुछ काबिल बन कर,
    माँ को सुंदर साड़ी भेंट करूं,
    मेरा मन भी करता है।
    ——- कवि गीता जी की बहुत सुन्दर और लाजवाब अभिव्यक्ति

New Report

Close