रात तू अकेली नहीं

दूर तलक तनहाई का आलम
अकेली बिरह वेदना सहती
ख़ामोशी की गहरी चादर ओढ़े
चुपचाप रहती है रात।
किसको अपनी पीङ सुनाए
कैसे उसको अपना मीत बनाए
जिसके लिए कयी ख्वाब सजाए
उधेड़-बुन में रोती रात।
देखो ये कोयल क्यूं ‌ कूके
तुझसे भी क्या प्रीतम रूठे
तू भी है विरहा ‌की मारी
खुद से ही बातें करती रात।


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3 Comments

  1. Geeta kumari - January 30, 2021, 10:13 am

    विरहणी की व्यथा प्रस्तुत करती हुई श्रृंगार पक्ष के वियोग पक्ष का सुंदर चित्रण प्रस्तुत करती हुई कवि सुमन जी की सुंदर रचना

  2. Pt, vinay shastri 'vinaychand' - January 30, 2021, 8:59 pm

    बहुत खूब

  3. Rajeev Ranjan - February 13, 2021, 7:22 am

    अंत भला‌ तो सब भला
    बहुत सुंदर लाजबाव

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