वचन

जब कभी भी टूटे ये तंद्रा तुम्हारी,
जब लगे कि हैं तुम्हारे हाथ खाली!

जब न सूझे ज़िन्दगी में राह तुमको,
जब लगे कि छलते आये हो स्वयं को!

जब भरोसा उठने लगे संसार से ,
जब मिलें दुत्कार हर एक द्वार से!

जग करे परिहास और कीचड़ उछाले,
व्यंग्य के जब बाण सम्भले न सम्भाले!

ईश्वर करे जब अनसुना तुम्हारे रुदन को,
जब लगे वो बैठा है मूंदे नयन को!

न बिखरना, न किसी को दोष देना,
मेरे दामन में स्वयं को सौंप देना..!!

अपने नयनों में प्रणय के दीप बाले,
मैं मिलूँगी तब भी तुम्हें बाहें पसारे!!

©अनु उर्मिल’अनुवाद’


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6 Comments

  1. Geeta kumari - February 22, 2021, 7:28 pm

    अपने नयनों में प्रणय के दीप बाले,
    मैं मिलूँगी तब भी तुम्हें बाहें पसारे!!
    ________बहुत ही कोमल भावनाओं के साथ और समर्पण का भाव लिए बहुत सुंदर कविता है सखी। उच्च स्तरीय लेखन

  2. Pt, vinay shastri 'vinaychand' - February 22, 2021, 7:29 pm

    बहुत खूब

  3. अनुवाद - February 22, 2021, 8:30 pm

    धन्यवाद सखि..क्षमा कीजियेगा कुछ दिनों से आपकी प्रतिक्रियाओं का जवाब नहीं दे पाई 🙏🙂

  4. Rakesh Saxena - February 23, 2021, 12:49 am

    बहुत खूब

  5. Pragya Shukla - February 23, 2021, 2:34 pm

    Awesome poem

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