सोचा न था

सुन सदा मेरी, वो चल निकले।
मेरे अपने ही संगदिल निकले।

जिन पे भरोसा किया था हमने,
वो भी साजिशों में शामिल निकले।

ना रही कोई उम्मीद उनसे अब,
मेरे जज़्बातों के, वो कातिल निकले।

हम तो नादान, नासमझ ठहरे,
समझदार हो, क्यों नाकाबिल निकले।

हमें तैरने का हुनर आता नहीं,
बीच मझधार छोड़, वो साहिल निकले।

उन्हें अंदाजा है, ‘देव’ की ताकत का,
पीठ पर वार कर, वो बुजदिल निकले।

देवेश साखरे ‘देव’


लगातार अपडेट रहने के लिए सावन से फ़ेसबुक, ट्विटर, इन्स्टाग्राम, पिन्टरेस्ट पर जुड़े| 

यदि आपको सावन पर किसी भी प्रकार की समस्या आती है तो हमें हमारे फ़ेसबुक पेज पर सूचित करें|

7 Comments

  1. महेश गुप्ता जौनपुरी - September 12, 2019, 10:57 am

    वाह बहुत सुंदर रचना

  2. Poonam singh - September 12, 2019, 1:48 pm

    Wahh

  3. Abhishek kumar - December 23, 2019, 10:16 am

    Awesome

Leave a Reply