हाइकु

हथेली पर
सपनों की घड़ियाँ
साकार नहीं।

नदी के पार
रेत के बडे़ टीले
हवा नाचती।

अशोक बाबू माहौर


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4 Comments

  1. Ashmita Sinha - December 4, 2018, 6:25 pm

    Aapko Kavita meri samaj se pare he…plz explain it also

  2. महेश गुप्ता जौनपुरी - September 8, 2019, 6:11 pm

    वाह बहुत सुंदर रचना

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