होता

होता

काश! मेरे चाहने भर से मेरे पास वो होता ।
खुद से जाग कर के वो मुझी में सो गया होता ।
दौलतें सारे जहाँ की मैं लुटा देता उसी पर गर,
ज़रा सा मुस्करा कर उसने मुझको खरीद लिया होता ॥

निहायती खूबसूरत रूप ना आँखों में बसाया होता ।
नयन अंकित समर्पित भाव, काश! उसने भी पढ़ा होता ।
गौर करता वो भी मेरी बाते, मेरी आदते, फरियादें,
उसने मुझसे तो क्या, खुद से ही प्यार कर लिया होता ॥

लड़कपन मुझ में भर आया, हुआ तहलका-ए-स्वांग ।
लता ने कल्प मन भरमाया, हुआ तहलका-ए-स्वांग ।
सबने खुद को खलनायक माना, पढ़कर किस्सा मुहब्बत का,
मैं उसी किस्से का नायक बन गया, हुआ तहलका-ए-स्वांग ॥

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पेशे से इंजीनियर,,, दिल से राईटर

7 Comments

  1. Payal sharma - August 20, 2015, 11:51 am

    Awesome poem!

  2. amit sharma - August 20, 2015, 7:58 pm

    loved your poetry 🙂

  3. Sanjeev Bajaj - August 31, 2015, 6:18 pm

    Heart touching poetry

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