खाने सोने में रहे, जीवन लोग गंवाय
उन्नति देखी और की, सिर धुन धुन पछिताय
सिर धुन धुन पछिताय, काम कुछ करिए ऎसा
जगत करे सम्मान और पाए भी पैसा
कह पाठक कविराय, कर्म बिन जीवन सूना
जग यह करम प्रधान, धर्म से सुख ले दूना
छंद कुण्डली कर्म
Comments
3 responses to “छंद कुण्डली कर्म”
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आप बुरा मत मानियेगा लेकिन कुंडलिया छन्द लिखने पर कुछ कहना चाहती हूँ। क्योंकि कुंडलिया छन्द में जिस शब्द से शुरुआत होती है अंत मे भी वही शब्द आना चाहिए। जैसे खाने शब्द से शुरुआत हुई है तो खाने शब्द ही अंत मे आता है।
साथ ही इसमें दोहा सोरठा की 13-11 और 11-13 मात्राएं होती हैं। इसमें मात्रा का ध्यान आवश्यक होता है। -
बेहतरीन
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बहुत सुंदर
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