तुम्हें नहीं मालूम…
तुम्हें नहीं मालूम ,
मगर मंसूबों को तेरे ,
मैं जान लेता हूं,
रहता हूं परेशान,
मगर; फिर भी
खुद को हर हाल में ,
संभाल लेता हूं,
और इत्तेफाक से
तुम्हारी आंखों और
लफ्जों का तालमेल,
बिगड़-सा गया है आजकल ,
बस !इन्हीं हरकतों से ,
तुम्हें पहचान लेता हूं,
इन्हीं हरकतों से ,
तुम्हें पहचान लेता हूं।
वाह क्या बात है
सुन्दर रचना
बहुत बहुत आभार 🙏
NICE
Thank you
Wow, very nice poem
Thank you 🙏😊
जितनी तारीफ करूँ कम है
in fact इस महीने आपकी सबसे सुन्दर रचना
यह मेरे विचार हैं बस
🙏🙏🙏🙏
‘लफ़्ज़ों का तालमेल बिगड़ सा गया है आजकल’ बहुत अच्छी लाइन है..इस सुंदर रचना के लिए आप बधाई के पात्र है
बहुत बहुत आभार प्रयाग जी 🙏
Very nice👏
बहुत बहुत धन्यवाद 🙏
सुन्दर अभिव्यक्ति
बहुत बहुत धन्यवाद
सुंदर
हार्दिक धन्यवाद 🙏
बहुत ही सुंदर, आपकी लेखनी को सैल्यूट
बहुत बहुत धन्यवाद सतीश सर 🙏🙏
ऐसे ही प्रेम बरसाते रहे हैं और हौसला बढ़ाते रहें हैं
Nice
धन्यवाद