देवेश साखरे ‘देव’'s Posts

घुंघरू की पुकार

अभी उम्र ही क्या थी, वक्त ने बांधे घुंघरू पांव में। अभी बचपन पूरा बीता नहीं, मां की आंचल के छांव में। हुई अवसर मौकापरस्तों की, चंद रुपयों के अभाव में। मजबूरियां पहुंचाईं कोठे पर, यादें दफन रह गई गांव में। इन वहशी खरीदारों के बीच, जवानी लूट गई मोलभाव में। इनके जख्म सहलाने के बजाय, एक और घाव दे जाते घाव में। खत्म करो यह तवायफ लफ्ज़, क्यों लगाते मासूम जिंदगी दांव में। देवेश साखरे ‘देव’ »

एक दीप

एक दीप जवानों के नाम, जो सरहद पर खड़े हैं। एक दीप शहीदों के नाम, जो हमारे लिए लड़े हैं। इनके हिस्से कोई पर्व, खुशियाँ या परिवार कहाँ, देश की सुरक्षा इनके लिए सब खुशियों से बड़े हैं। देवेश साखरे ‘देव’ »

मुफ़लिस

गुजर कभी मुफ़लिसों की बस्ती में। मिल कर हर खुशी मनाते मस्ती में। जरूरतें पूरी होने से बस मतलब इन्हें, क्या रखा दिखावे की महंगी सस्ती में। परवाह किसे, किनारा मिले ना मिले, कश्ती पानी में है, या पानी कश्ती में। दौलतमंद को खुद से ही फुर्सत कहाँ, मद में चूर, वो अपनी बड़ी हस्ती में। दूसरों के गम से, इन्हें सरोकार कहाँ, जीते हैं ये, बस अपनी खुदपरस्ती में। देवेश साखरे ‘देव’ »

जख्म

जख्म हरा रहता हरदम नहीं। वक़्त से बड़ा कोई मरहम नहीं। जिस्मानी घाव तो भर जाते हैं, मिटता दिल पर लगा जख्म नहीं। देवेश साखरे ‘देव’ »

नई सहर

रौशनी की किरण आई नजर, कभी तो आएगी नई सहर । कभी तो गम का अंधेरा हटेगा, कभी तो आएगी खुशियों की लहर । स्याह रात का पर्दा, कभी तो हटाएगी नई सहर । कभी तो दुःखों का बादल छटेगा, कभी तो आएगी सुनहरी पहर । मेरी उम्मीदों का सूरज, कभी तो लाएगी नई सहर । कभी तो दुःखों का जख्म मिटेगा, कभी तो खत्म होगी ये कहर । मेरे दुखते रग में खुशियाँ, कभी तो फैलाएगी नई सहर । कभी तो दुःखों का बांध टुटेगा, अभी तो जिंदगी थोड़ी और... »

ख़त

गुज़रा ज़माना याद दिलाता है ख़त। अब बीता ज़माना कहलाता है ख़त। रूठे को मनाना, हाले-दिल बताना, अपनों को अपना बनाता है ख़त। ना हुई कभी मुलाक़ात ना कोई बात, दो अंजानो को करीब लाता है ख़त। जो बात ज़बान ना कर पाये बयान, तेरे – मेरे जज़्बात मिलाता है ख़त। जवाब का इंतजार, करता बेकरार, एक नया एहसास दिलाता है ख़त। देवेश साखरे ‘देव’ »

दोस्ती

दोस्ती ऐसा, जैसे खुदा की परस्तिश। दोस्ती में है, बेइंतिहा प्यार की कशिश। दोस्तों की दोस्ती पे है कुर्बान ये जान, हमें अज़ीज़ हैं, अपने सभी मोनिस। देवेश साखरे ‘देव’ परस्तिश- पूजा, मोनिस- दोस्त »

मय की तलब

जो तू सीने से लगा ले । मय की तलब भूला दे । खुमारी कम नहीं मय से, लबों से जाम पिला दे । यूँ तो पीता नहीं लेकिन, नशा तेरा जहाँ भूला दे । ये लत मेरी ना छूटे कभी, बेसुध तू मुझको डूबा दे । नश्तर सी ख़लिश दिल में, जुदाई तेरी मुझको रुला दे । देवेश साखरे ‘देव’ »

तकदीर

हर पल आँखों में रहती तेरी तस्वीर है। माने या ना माने, तू ही मेरी तकदीर है। गर बन जाओ तुम, मेरी सदा के लिये, ये सुहाने पल हो सकती मेरी जागीर है। देवेश साखरे ‘देव’ »

वंदेमातरम

मां तुझ से है मेरी यही इल्तज़ा। तेरी खिदमत में निकले मेरी जां। तेरे कदमों में दुश्मनों का सर होगा, गुस्ताख़ी की उनको देंगे ऐसी सजा। गर उठा कर देखेगा नजर इधर, रूह तक कांपेगी देखके उनकी कज़ा। कभी बाज नहीं आते ये बेगैरत, हर बार शिकस्त का चखकर मज़ा। दुश्मन थर – थर कांपेगा डर से, वंदे मातरम गूंजे जब सारी फिज़ा। देवेश साखरे ‘देव’ »

चौदहवीं का चाँद

मेरे महबूब के हुस्न की जो बात है। चौदहवीं के चांद तेरी क्या बिसात है।। चांद भी देख गश खाएगा, मेरे महबूब को देख शर्माएगा। मेरे महबूब से हंसीन ये रात है। चौदहवीं के चांद तेरी क्या बिसात है।। ले अंगड़ाई, दिन निकल आए, खोल दे गेसूं, शाम ढल जाए। झटक दें जुल्फें तो होती बरसात है। चौदहवीं के चांद तेरी क्या बिसात है।। चांद तू क्यों उखड़ा उखड़ा है, मेरे महबूब की चूड़ी का टुकड़ा है। खनकती चूड़ियां तो मचलते ज... »

दहेज़

उम्र भर पिता ने जो, पाई पाई रखा था सहेज। बिटिया के ब्याह में, आज वह दे दिया दहेज।। ब्याह में लिए कर्ज का चुका रहे अभी किस्तें। थमा दिया जाता मांगों के फिर नए फेहरिस्ते। भीख के दहेज से क्या सारी जिंदगी गुजार लेंगे, दूषित सोच को हक नहीं, बनाने के नए रिश्ते। ब्याह कोई व्यवसाय नहीं, दो परिवारों का संबंध है, मां बाप भी आंखें बंद कर, बिटिया को ना दें भेज। उम्र भर पिता ने जो, पाई पाई रखा था सहेज। बिटिया ... »

नशा ही नशा

किसी को इश्क का नशा, किसी को रश्क का नशा। किसी को शय का नशा, किसी को मय का नशा। किसी को दौलत का नशा, किसी को शोहरत का नशा। किसी को इबादत का नशा, किसी को शहादत का नशा। किसी को हिफाज़त का नशा, किसी को अदावत का नशा। किसी को शराफ़त का नशा, किसी को शरारत का नशा। किसी को नफ़रत का नशा, किसी को मोहब्बत का नशा। किसी को गीत का नशा, किसी को संगीत का नशा। किसी को ख़ुशी का नशा। किसी को ख़ामोशी का नशा। किसी को ... »

अपना बनाया क्यों

जब भूलना ही था तो अपना बनाया क्यों। भटके को सही राह, तुमने दिखाया क्यों। तन्हा हम कैसे भी हो, जी ही तो रहे थे, उम्मीद का शम्मा जला, तुमने बुझाया क्यों। भूलने की बात से, एक तूफान सा उठा है, कश्ती को मझधार से, तुमने बचाया क्यों। छोड़ दिया होता हमारे हाल पे उसी वक्त, गमे-जुदाई दिल पर, तुमने लगाया क्यों। आज हाल ये है, न ही जीते हैं, न मर सकते, हाथ थाम कर मरने से, तुमने बचाया क्यों। तुम्हें भूल पाना ना... »

करवा-चौथ विषेश

ऐ चाँद तू आज भाव खाना नहीं। मेरे चाँद को तू आज सताना नहीं। बैठी पलकें बिछाए, तेरा दीदार हो जाए, तेरे इंतज़ार की घड़ी बढ़ाना नहीं। ऐ चाँद तू आज भाव खाना नहीं। मेरे चाँद को तू आज सताना नहीं। बगैर आबो-दाना, मुश्किल दिन बिताना, मकसद मेरा, तुझे बताना नहीं। ऐ चाँद तू आज भाव खाना नहीं। मेरे चाँद को तू आज सताना नहीं। मेरी लंबी उम्र का जिक्र है, मुझे मेरे चाँद की फिक्र है, मंज़ूर मुझे बादलों का बहाना नहीं।... »

कहावतें

दुनिया में ‘चेहरे पर चेहरा चढ़ाए’ हुए लोग। ‘मुंह में राम बगल में छुरा’ छिपाए हुए लोग। ‘अपने मुंह मियां मिट्ठू’ बनते हुए देखे हैं, ‘नाच ना आवें आंगन टेढ़ा’ बताए हुए लोग। ‘पूत के पांव पालने में ही नजर आते हैं’, फिर भी ‘सपोले को दूध पिलाए’ हुए लोग। यूं तो ‘आस्तीन के सांप’ नज़र नहीं आते, अपनों ही से ‘मुंह की खाए&... »

तेरी याद में

दिल रोया, आंखों ने अश्क बहाया तेरी याद में। रौशनी भाती नहीं, चराग़ बुझाया तेरी याद में। तस्वीर बातें करती नहीं, अब जी भरता नहीं, इंतजार में दिन गिन-गिन बिताया तेरी याद में। ख्वाबों में तेरा आना, मेरा चैन, मेरी नींदें उड़ाना, किसी रात फिर नींद ना आया तेरी याद में। कब होगा तुमसे मिलन, ना मैं जानू या रब जाने, अब जुदाई और सह ना पाया तेरी याद में। देवेश साखरे ‘देव’ »

इंतज़ार

रौशनी में अक्स दिखा, लगा तुम आए। हर एक आहट पर ऐसा लगा तुम आए। इंतज़ारे-बेक़रारी बढ़ती गई, साँसे घटती गई, हर एक सदा पर ऐसा लगा तुम आए। देवेश साखरे ‘देव’ »

पराकाष्ठा

ये विलासिता, वैभवता व भौतिकता की पराकाष्ठा। ये क्षणिक सुविधाएं प्राप्त होती, करने से थोड़ी चेष्टा। परंतु छू सकते हैं, गगन की ऊंचाई मात्र ही नहीं, सुदूर क्षितिज भी, गर मन में हो दृढ़ आत्मनिष्ठा। मोह, छल, आलस्य त्याग जो करे अथक परिश्रम, वो ही प्राप्त कर सकता है, संसार में उच्च पद प्रतिष्ठा। देवेश साखरे ‘देव’ »

फ़तह

गुलाब सी हो जिंदगी तुम्हारी, जो काँटों के बीच भी हँसीन हो। हर कदम हो तुम्हारा फ़तह का, हर पल जिंदगी बेहतरीन हो। देवेश साखरे ‘देव’ »

बयां करती है

बिस्तर की सलवटें, शबे-हाल बयां करती है। भीगा सिरहाना, हिज़्रे-मलाल बयां करती है। बेशक लाख छुपाओ, ग़मे-जुदाई का दर्द लेकिन, बेरंग सा चेहरा, बेनूर हुस्नो-जमाल बयां करती है। मुस्कुराहट के पीछे, गम छुपाने का हुनर आता है ‘देव’, फिर भी तसव्वुर तेरी, महबुबे-खयाल बयां करती है। देवेश साखरे ‘देव’ »

रिंद

बेक़रारी का आलम है, दीवाने की मानिंद। ना सहरे-सकूँ मिलता, ना आती शबे-नींद। तेरी आँखों से पिया करते थे जामे-शराब, तेरी जुदाई में अब कहीं, हो ना जाऊँ रिंद। देवेश साखरे ‘देव’ रिंद- शराबी »

ज़ुल्फ तुम्हारा

ज़ुल्फ तुम्हारा, जैसे काली घटा हो। चाँद के रुख़्सार से, इसे तुम हटा दो। बिखरने दो चाँदनी हुस्नो-जमाल की, इसपे जैसे कोई चकोर मर मिटा हो। पहलू में बैठो, लौटा दो मुझे दिले-सुकूँ, मेरी नींद, मेरा चैन जो तुमने लूटा हो। सारी रात यूँ ही, आँखों में गुज़रने दो, करें पूरी, गर कोई बात अधूरा छूटा हो। माँगु मुराद, ये मंजर यहीं ठहर जाए, देखो दूर कहीं कोई सितारा टूटा हो। देवेश साखरे ‘देव’ »

सत्ता का खेल

कल भी वही दौर था, आज भी वही दौर है । पन्ने पलट लो, इतिहास गवाह बतौर है । तख्तो-ताज लूट गये । राजे-महराजे मिट गये । इस सियासती जंग में, अपने अपनों से छुट गये । बेटा बाप को मारता, भाई-भाई को काटता, सत्ता के खेल में बहता खून चारों ओर है । कल भी वही दौर था, आज भी वही दौर है । सत्ता पैसे वालों की । घोटाले और हवालों की । चोर-चोर मौसेरे भाई, हम प्याले, हम निवालों की। पूंजीपति और सत्ताधारी, देश के पालनहार... »

तुम्हारे लिए

शब्द-शब्द पिरोकर, कविता की माला बनाऊं तुम्हारे लिए। माला के हर मनके में, मन के मनोभाव सजाऊं तुम्हारे लिए। लहराते उजले दामन में, प्रेम का रंग चढ़ाऊं तुम्हारे लिए। थरथराते गुलाबी अधरों पे, प्रेम का रस बरसाऊं तुम्हारे लिए। महकाया जीवन के उपवन को, फूलों से सेज महकाऊं तुम्हारे लिए। रौशनी लजाती गर प्रेमालाप में, जलता दीपक बुझाऊं तुम्हारे लिए। देवेश साखरे ‘देव’ »

दर्द

नन्हा सा बेटा बोला, लिपट कर मेरे पैर। आज ले चलोगे पापा, संग अपने सैर। कब जाते हो, कब आते हो, पता ही नहीं चलता, लगाते हो बड़ी देर। ना चलेगा कोई बहाना, थक गया हूं मैं, या फिर मुझे है जाना। मुझसे प्यार है, या कोई बैर। ले चलोगे मुझे, संग अपने सैर।। उस अबोध को, मैं कैसे समझाऊं। दर्द अपना उसे, मैं क्या बताऊं। रोटी की जद्दोजहद में, इस भागदौड़ बेहद में, परिवार के लिए, समय कहां से लाऊं। कर्म देखूं तो, कर्त... »

मैं ख़्वाब में नहीं

तुम्हारे सुर्ख लबो में वो कशिश है, जो किसी शराब में नहीं। तुम्हारे तन कि वो मदहोश खुशबू है, जो किसी गुलाब में नहीं। तुम्हारे आगोश में वो जादू है, जो किसी भी शबाब में नहीं। तुम मेरी हो यही हकीकत है, जमाने से कह दो मैं ख़्वाब में नहीं। मेरी मोहब्बत में वो ज़लज़ला है। जो दरिया के सैलाब में नहीं। तुम्हारी ज़ुदाई में वो तकलीफ है। जो किसी अज़ाब में नहीं। देवेश साखरे ‘देव’ »

इश्के-फ़साना

इश्के-फ़साना हमारा, मशहूर जमाने में। हमारी मोहब्बत पाक है, सही माने में। सीने में दिल तेरे नाम से ही धड़कता है, दिलो-जाँ कुर्बान, क्या रखा नज़राने में। बे-इंतिहा इश्क की इंतिहा गर गुलामी है, मुझे शर्म नहीं, तेरा गुलाम फ़रमाने में। दिले-सूकूँ जो तेरी आँखों के ज़ाम में है, मिला नहीं डूब कर, किसी मयखाने में। मुतमइन है ‘देव’, मुकम्मल है इश्क मेरा, कम हैं, जो यकीं रखते ताउम्र निभाने में। देव... »

विजयादशमी

सभी को विजयादशमी की शुभकामनाएं नि:संदेह मेरा दहन किया जाए। परंतु केवल वो ही समक्ष आए। जिसमें न हो रत्ती भर अहंकार। जिसने न किया हो व्यभिचार। जिसने किया पतितों का उद्धार। जिसने किया पर-दुखों का संहार। केवल वो ही समक्ष आए। जो माता-पिता का आज्ञाकारी हो। जो बंधु-बांधुओं का हितकारी हो। जो धैर्य, शील और संयम धारी हो। जिसके शरण में सुरक्षित नारी हो। केवल वो ही समक्ष आए। जो स्त्रियों का सम्मान करता हो। जो... »

काश ऐसा होता

क्यों है ये जात-पात की ऊंची दीवार। धर्म के नाम पर हर कोई लड़ने को तैयार। सब एक ही तो है, ये हवा जिसमें हम सांस लेते हैं। ये पानी जो हम सभी पीते हैं। एक ही तो है, यह धरती जहां हम महफूज़ रहते हैं। फूलों की खुशबू सभी महसूस करते हैं। एक ही तो है, सभी के खून का रंग। जीवन मृत्यु का ढंग। एक ही तो है, फिर क्यों धर्म को लेकर आपसी लड़ाई। मैं हिंदू, मैं मुस्लिम, मैं सिख्ख, मैं ईसाई। इस ‘मैं’ के द... »

प्रति उत्तर

एक दिन मैंने पुत्र से कहा, बेटा, तू मेरा हमसूरत है, तू ही मेरी ज़रूरत है। छोड़ अकेले मुझे जाना नहीं, खून के आंसू मुझे रुलाना नहीं। तुम से ही ज़िंदगी ख़ूबसूरत है। तू ही तो मेरी ज़रूरत है।। पुत्र ने कहा पापा, आप नहीं दादाजी के हमसूरत हैं? आप नहीं उनकी ज़रूरत है। आप भी तो उनको छोड़ आए हो, मुझसे कैसी उम्मीद लगाए हो। सुन हुआ स्तब्ध, जैसे मूरत है। आप नहीं उनकी ज़रूरत हैं।। यह तो प्रकृति का नियम है, इंसा... »

कहानी

वो जिंदगी बेमानी, जिसमें कोई रवानी ना हो। किस काम की जवानी, जिसकी कहानी ना हो। मैंने भी मोहब्बत किया है, हाँ बेहद किया है, किसी से दिल्लगी नहीं की, जो निभानी ना हो। हमारा भी जमाना था, मशहूर इश्के-फसाना था, इश्क ऐसा कीजिए, फिर जिसे छिपानी ना हो। कहने को नहीं कहता, जिया जो वही लिखता हूँ, सच कहता ‘देव’, वो नहीं कहता जो सुनानी ना हो। देवेश साखरे ‘देव’ »

आंगन

बचपन का आंगन कहीं छूट गया । पुराना मकान था जो टूट गया ।। ऊँची इमारतें खड़ी वहाँ, सैकड़ों परिवारों का बसेरा है । चारदीवारी में ही रात, घर के भीतर ही सवेरा है। ऊँची इमारतें आज हँसती हम पर, मजबूरी में इंसान खून के पी घूंट गया । बचपन का आंगन कहीं छूट गया ।। हवाओं में रहता इंसान, आंगन तो एक सपना है । ना तो जमीन अपनी, ना ही छत अपना है । जमीन का एक टुकड़ा आज बचा नहीं, लगता है किस्मत भी हमसे रूठ गया । बचपन... »

तेरे शहर में

यूं तो हंसीनों की कमी नहीं तेरे शहर में। एक तुझ पे ही दिल आया पहली नज़र में। और कोई नजर आता नहीं, एक तेरे सिवा, इंकार नहीं, प्यार घोलकर पिला दो ज़हर में। रहने को तो हम हुस्नों के बीच भी रहे हैं, ना थी वह बात, उन हुस्नों के असर में। नहीं कहता चांद तारे कदमों में बिछा दूंगा, सजाकर रखूंगा ताउम्र तुम्हें दिल के घर में। दिल की गहराई में ‘देव’ उतर कर तो देख, नहीं मिलेगा ऐसा सैलाब गहरे समंदर ... »

हँसीन नजारा

ये रंगे – बहारा, ये हँसीन नजारा। खुदा ने तुझको, फुर्सत से संवारा। ना मैंने सुना कुछ, ना तुने पुकारा, समझते हैं तेरी, नजरों का इशारा। तू बहती धारा, मैं शांत किनारा, दिल की गहराई में, तुमने उतारा। मचलते जज्बात पर, न जोर हमारा, तू भी हँसीन है, और मैं भी कंवारा। ना मेरा कसुर कुछ, ना दोष तुम्हारा, यह तो खेल है देखो, वक्त का सारा। बैठ पास मेरे, करूँ तुझको निहारा, पल भर की जुदाई, ना मुझे गवारा। तू ... »

जय जवान जय किसान जय विज्ञान

“शास्त्री जी” को अवतरण दिवस पर शत शत नमन शास्त्री जी का नारा था ‘जय जवान’ ना होली दिवाली, ना ईद रमजान। एक ही जश्न, हिफाजते-हिंदुस्तान। सुकून से मनाते हम खुशियाँ यहाँ, सरहद पर खड़ा, वहाँ वीर जवान। ‘जय किसान’ सुस्ताने बैठ जाए मेहनतकश किसान। तो फिर भूखा रह जाए समस्त जहान। निःस्वार्थता से करता, अथक परीश्रम, खून पसीने से सिंचता, खेत खलिहान। अटल जी ने जोड़ा ‘जय व... »

खुली किताब

मैं तो खुली किताब हूँ, यूँ भी कभी पढ़ा करो। अच्छा लगता है, बेवजह भी कभी लड़ा करो। मेरे कदम तेरी ओर उठते, तुझपे ही रूकते हैं, एक कदम मेरी ओर, तुम भी कभी बढ़ा करो। काँटों से दामन तेरा, ना उलझने दिया कभी, फुल बनकर मुझपे, तुम भी कभी झड़ा करो। मैं तो तेरे इश्क में, पहले से ही गिरफ़्तार हूँ, शक के कटघरे में, मुझे ना कभी खड़ा करो। बदला नहीं, आज भी हूँ वही, देखो तो गौर से, बदलने का दोष मुझपे, यूँ ना कभी मढ़... »

मुकाम

साम दाम दण्ड भेद से मुकाम तो पा लोगे। पर आईने में खुद से, क्या नजरें मिला लोगे? काबिलियत कितनी है, गिरेबां में झाँक लो, काबिल हकदार से उसका हक तो चुरा लोगे। पर आईने में खुद से, क्या नजरें मिला लोगे? मुकाम पाना आसान है, वहाँ ठहरना कठिन, गलत की जोर पे अपनी जगह तो बना लोगे। पर आईने में खुद से, क्या नजरें मिला लोगे? ज़मीर जानता है, मुझसे भी बेहतर यहाँ पर, ज़मीर को मारकर, खुद को बेहतर बना लोगे। पर आईने... »

‘गांधी’ एक विचारधारा

गांधी जी पर कविता तो हर कोई रचते हैं। आओ बापू के विचारों पर चर्चा करते हैं। बापू ने कहा था बुरा मत देखो। मैं मुँह फेर लेता हूँ, देख कमजोरों पर अत्याचार होते। मैं आँखें फेर लेता हूँ, देख शोषण और भ्रष्टाचार होते। मुझे वो कागज का टुकड़ा भाता है। जिस पर छपा बापू मुस्कुराता है। बुरा तो मैं देखता ही नहीं, मुझे बस हरा ही हरा नजर आता है। बुरा कर, ईश्वर से हम क्यों नहीं डरते हैं। आओ बापू के विचारों पर चर्च... »

तक़दीर

सागर किनारे रेत पर फेरी उँगलियाँ, देखा जो गौर से बन गई तस्वीर तेरी। ख्वाब से हकीकत में ले आई मुझे, एक लहर बहा ले गई तक़दीर मेरी। »

ये जिंदगी

ये जिंदगी भी कैसे करवट बदलती है । इस करवट खुशी, दूसरे गम मिलती है। रेत की मानिंद हो गई हसरतें सारी, जितना समेटो, मुठ्ठी से फिसलती है। जमीं छोड़ा आसमां छूने की ख्वाहिश में, जमीं पर ही ला औंधे मुँह पटकती है । भीड़ में उँगली छूटे बच्चे सी जिंदगी, गिरते पड़ते भी अब नहीं संभलती है । राजा से फकीर पल में बना दे, जिंदगी भी कैसे कैसे खेल खेलती है । नहीं पास कोई, आज हालात ऐसे हैं, हर निगाहें मुझसे बच निकलती ... »

अवचेतन मन

तुम अवचेतन मन की चेतना। तुम विरह की मधुर वेदना। तुम इच्छित फल की साधना। तुम ईश्वर की आराधना। तुम सुंदर अदृश्य सपना। तुम साकार मेरी कल्पना। तुम संपूर्ण मेरी कामना। हाथ सदैव ‘देव’ का थामना। देवेश साखरे ‘देव’ »

अदावत

ऐसे भी रफ़ीक़ जो कयामत ढाते हैं। दावत देकर वो अदावत निभाते हैं। जान बनाकर जान लेने की कोशिश की, ज़ख्मों का सेज देकर अयादत आते हैं। ज़ुल्म करने से सहने वाला गुनहगार, यही सोच कर अब बगावत लाते हैं। ऐ दगा करने वाले, कुछ तो वफ़ा कर, दोस्ती पर से लोग अकीदत उठाते हैं। देवेश साखरे ‘देव’ 1.रफ़ीक़ – दोस्त, 2. अदावत – दुश्मनी, 3.अयादत – रोगी का हाल पुछना 4. अकीदत – आस्था »

फोन पर बातें

जब रूबरू हों। तो गुफ्तगु हो। एक मैं रहूँ, और एक तू हो। कुछ अनकही बातें, आँखों से सुन लूं। फोन पर बातें मुझे भाती नहीं, बगैर देखे बातें समझ आती नहीं। होंठ से तेरे, शब्दों का झड़ना, दिल में उतरना, कानों में पड़ना। प्रेम मनुहार, वो मीठी तकरार, तेरा रुठना, और मुझसे लड़ना। दिल की धड़कनें, दिल से सुन लूं। फोन पर बातें मुझे भाती नहीं, बगैर देखे बातें समझ आती नहीं। तेरी बातों की चहक। तेरे तन की महक। तेरे च... »

वो क्या जाने

रुह जिसकी बिक चुकी है, दिल के जज्बात वो क्या जाने। इंसानियत भी जो बेच चुका, गम की बात वो क्या जाने। खुशियों का लुटेरा है जो, खुशियों की सौगात वो क्या जाने। दूसरों के फूंक, घर अपना रौशन करें, घनघोर स्याह रात वो क्या जाने। मुंह से निवाला, छीनने वाला, भूख के हालात वो क्या जाने। अस्मत जिनके बिस्तर पे दम तोड़ती, संजोए सपनों की बारात वो क्या जाने। दौलत ही जिनका खुदा हो ‘देव’, खुदा से मुलाकात... »

बुजुर्गों का साया

बेशक दौलत बेशुमार नहीं कमाया है। मगर मेरे सर पर, बुजुर्गों का साया है। ज़हां की दौलत कम है, मेरे खजाने से, दुआओं का खजाना, मेरा सरमाया है। हादसा सर से गुजर गया, मैं बच गया, लगता है, दुआओं ने असर दिखाया है। पाँव में काँटा, कभी चुभ नहीं सकता, पाँव जिसने भी, बुजुर्गों का दबाया है। जन्नत सुना था, ज़मीं पर ही देख लिया, कदमों में इनके, जब भी सर झुकाया है। देवेश साखरे ‘देव’ सरमाया- संपत्ति »

दुनिया एक अखाड़ा

ये दुनिया बनता एक अखाड़ा है। हर कोई लिए हथियार खड़ा है।। कभी मजहब के नाम फसाद। तो कभी सबब ज़मीं जायदाद। हर एक, दूसरे से बड़ा है। हर कोई लिए हथियार खड़ा है। ये दुनिया बनता एक अखाड़ा है।। भाई, भाई के खून का प्यासा। नहीं बचा प्रेमभाव जरा सा। इंसान किस फेर में पड़ा है। हर कोई लिए हथियार खड़ा है। ये दुनिया बनता एक अखाड़ा है।। कल तक, नारी को पूजता संसार। आज है, उनकी आबरू तार-तार। देखो कैसे मानसिकता सड़ा... »

गुरूर है

देर मिलता है, पर मिलता जरूर है। किस्मत पे अपने, इतना तो गुरूर है। खामोशी मेरी, लगने लगी कमजोरी, रहम दिल हूं, बस इतना कुसूर है। छत है सर, फिर भी हूं बेघर, घर जिनके हैं, वो कितने मगरूर हैं। हैं सब, पर कोई भी नहीं अब, सोच है मेरी, या मेरा फितूर है। हर हाल में, करुं ना मलाल मैं, नफरत से तो ‘देव’ होते सभी दूर हैं। देवेश साखरे ‘देव’ »

तसव्वुर तेरी

कम्बख़त तसव्वुर तेरी की जाती नहीं है। भरी महफिल भी मुझे अब भाती नहीं है। जिंदगी तो अब बेसुर-ताल सी होने लगी, नया तराना भी कोई अब गाती नहीं है। पुकारूं कैसे, अल्फ़ाज़ हलक में घुटने लगे, सदा भी सुन मेरी तू अब आती नहीं है। कहकहे नस्तर से दिल में चुभने लगे, सूखी निगाहें अश्क अब बहाती नहीं है। संग दिल से दिल मेरा संगदिल हो गया, कोई गम भी मुझे अब रुलाती नहीं है। देवेश साखरे ‘देव’ »

तुम्हें क्या कहूँ

तुम्हें चांद कहूं, नहीं, तुम उससे भी हंसीन हो। तुम्हें फूल कहूं, नहीं, तुम उससे भी कमसीन हो। तुम्हें नूर कहूं, नहीं, तुम उससे ज्यादा रौशन हो। तुम्हें बहार कहूं, नहीं, तुम सावन का मौसम हो। तुम्हें मय कहूं, नहीं, तुममें उससे भी ज्यादा खुमार है। तुम्हें नगीना कहूं, नहीं, तुम्हारे हुस्न का दौलत बेशुमार है। तुम्हें सूरज कहूं, नहीं, तुममें उससे भी ज्यादा तपीश है। तुम्हें तश्नगी कहूं, नहीं, तुममें उससे भ... »

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