पढ़ना नहीं जानती फिर भी चाट जाती हैं दीमकें जाने कैसे सारी किताबों को, रौशनी क्या है नहीं जानते फिर भी कर देते हैं जाने कैसे रौशन जुगनू सारे ज़माने को, नहीं जानते जिद्दी हवाओं […]

**तुम होते तो शायद और बात होती** सहर तो अब भी होती है, सूरज अब भी निकलता है फलक़ पर, मगर मैं सोचता हूं कि तुम होते तो शायद और बात होती, दिन तो अब […]

मुझको तेरी आहट़ आहों में नजर आती है! तेरी मुस्कराहट निगाहों में नजर आती है! तेरी ओर खींचती हैं मेरी मंजिलें मुझको, जिन्दगी भी दर्द की बाँहों में नजर आती है! #महादेव की कविताऐं

गणपति बप्पा मोरया, पुड्च्या वर्षी लौकरया मोरया रे, बप्पा मोरया रे \-४ गणपति अपने गाँव चले, कैसे हमको चैन पड़े जिसने जो माँगा उसने वो पाया, रस्ते पे हैं सब लोग खड़े गणपति बप्पा दुख […]

कोई भी कमी कोई भी शिकायत नहीं छोड़ती, अपने बच्चे की परवरिश में वो माँ कोई खामी नहीं छोड़ती, खुद रह भी ले भूखी पर वो माँ किसी दिन भी बच्चे को भूखा नहीं छोड़ती, […]

सर को कैसे याद पहाड़े ? सर को कैसे याद गणित ? यह सोचती है दीपाली यही सोचता है सुमित सर को याद पूरी भूगोल कैसे पता कि पृथ्वी गोल ? मोटी किताबें वे पढ़ […]

नजर के सामने कभी होते हैं मंजर जैसे! जिगर में चुभता हुआ हो कोई खंजर जैसे! पलक में होती है यादों की रफ्तार इसतरह, लहर फैली हुयी हो रग रग में समन्द़र जैसे! #महादेव की […]

नीले आसमान में कहीं अपना नाम लिख दूं ख्वाहिश है हर चीज को नीलम कर दूं वक्त कभी हमारा भी आयेगा ऐ दोस्त दुनिया मे में मैं अपना रंग भर दूं

तुम धरती हो, तुम आसमान हो और तुम ही ये जाहां हो सूरज सा तेज और चाँद की चांदनी की तरह ही तो तुम ही हम सब की शान हो मुश्क़िलों जैसी चीज़ों का ना […]

कोई भी कमी कोई भी शिकायत नहीं छोड़ती, अपने बच्चे की परवरिश में वो माँ कोई खामी नहीं छोड़ती, खुद रह भी ले भूखी पर वो माँ किसी दिन भी बच्चे को भूखा नहीं छोड़ती, […]

तू मेरे जिस्म मेरी जान जैसा है, कभी दिल की जुबां तो खुदा की अज़ान जैसा है, कभी हर प्रश्न का उत्तर तो कभी गणित के सवाल जैसा है, तू मेरी आँखों का ख़्वाब तो […]

कोई डरा कर किसी का मन बदल देता है, कोई डर कर अपना शहर बदल देता है, कोई सब कहकर कुछ बदल नहीं पाता, तो कोई खामोश रहकर भी बहुत कुछ बदल देता है, कोई […]

बचपन साथ बहारें देखें बड़े हुए बंटवारें देखें फिर आँगन में धुप ना आयी आँखे अब दीवारें देखें चल फिर रेत के महल बनायें और नदियों की धारें देखें मंदिर में तो मिला नहीं रब […]

आ जाओ कहाँ हो तुम, कहाँ हो तुम,कहाँ हो तुम . तुम्हारी गफलत के अफ़साने, करते फिरते है दीवानें, ए परवानों तुम्हे क्या खबर है- बुझ रही है शमां – कहाँ हो  तुम . तूफानों […]

ज़िंदगी को इस—–तरह से जी लिया । एक प्याला-–फिर; ज़हर का पी लिया ॥ वक़्त के सारे  ‘थ…पे…ड़े’  सह लिए । गम जो बरपा, इन लबों को सी लिया ॥ अब अगर कुन्दन—सा दीखता….मैं दमकता […]

मेरा ख्वाब पलकों में डरा हुआ सा रहता है! मेरा दर्द़ जिस्म में ठहरा हुआ सा रहता है! नाकामियों से टूटी है यूँ जिन्द़गी मेरी, मेरा दिल ख्वाहिशों से भरा हुआ सा रहता है! #महादेव […]

जो समझते नहीं कीमत खुद अपनी, अक्सर बिक जाते हैं वो सस्ते में बाज़ारों में, कहीं लगते हैं ऊँचे दाम किसी की काबलियत के, तो कहीं बेमोल खरीद लिए जाते हैं शख्स यहाँ ज़माने में, […]

देख कर ही मेरे घर की टूटी हुई खिड़की, जो फेर लिया मुँह तो अच्छा ही किया तुमने, छोड़ दिया साथ जब इतनी सी ही बात पर, अच्छा ही किया मेरा टूटा हुआ मकाँ देखा […]

हर एक कश के साथ धुंए में अपनी ज़िन्दगी उड़ाते हैं, देखो आजकल के मनचले कैसे अपने कदम भटकाते हैं, पाते हैं कितने ही संस्कार अपने घरों से मगर, हर सिगरट के साथ वो रोज […]

हर एक कश के साथ धुंए में अपनी ज़िन्दगी उड़ाते हैं, देखो आजकल के मनचले कैसे अपने कदम भटकाते हैं, पाते हैं कितने ही संस्कार अपने घरों से मगर, हर सिगरट के साथ वो रोज […]

तोड़नी है खरगोश की तरह छलाँगें मारते हजार- हजार प्रपातों को कोख में दबाये खड़ी चट्टान गर्वीली !अनुर्वरा !!   तोड़नी हैं जेवरा की धारियों सी सड़कों पर पसरी गतिरोधक रेखाएँ अनसुलझे प्रश्नों का जाम […]

मैं वहीं हूँ जहाँ तुम आए थे चमरौला जूता  ठीक कराने ‘छुट्टे पैसे नही हैं‘ कह कर चले गए थे —पचास साल पहले |   आज चमचमाते जूतों पर पॉलिश कराने आए हो —   पचास […]

अब तो संभलो नाजुक लड़कियों ये आशिक इतने नादान नहीं पीकर रस ये उड़ जाते हैं धरना इन पर ध्यान नहीं ढूँढे लड़कियों को गलियों में सब तो आज शिकारी हैं आगे क्या अब लड़कों […]

सावन का महीना आया बादल गरजे डम – डम – डम बिजली कड़की आसमान में पानी बरसा छम – छम – छम मुन्ना की दादी बोली घर में पानी टपक रहा मुन्ना के दादा बोले […]

तुम कविता का विषय बनो और मैं कविता का रचनाकार चलो इस तरह से रच लेते हैं कुछ कविताएँ दो – चार मौन रहें और बोलते रहें हम दोनों के नयन तुम ऐसे मुस्कराओ उसमें […]

जिनको ऊँगली पकड़ कर चलना सिखाया, जिनको देकर सहारा आगे बढ़ना सिखाया, वो सब आज हाथ छुड़ाने लगे, देखो बूढ़ा कह कर वो सताने लगे, जिनको अपना बनाया वो सपना था मेरा, कह कर आज […]

तू समन्दर मैं तेरा किनारा बनूं, तू जो बिखर जाए तेरा सहारा बनूँ, मुझसे टकराये तू, मुझमे मिल जाए तू, तुझमे बस जाऊं मैं, मुझमे बस जाए तू, तू समन्दर मैं तेरा…. ओ समन्दर तू […]

ღღ_ख़ुद से लेते हुए इन्तक़ाम, देखा नहीं तुमने; अच्छा हुआ मेरा अस्क़ाम, देखा नहीं तुमने! . उतर ही जाता चेहरा मेरा, शर्म से उसी दम; अच्छा हुआ मेरा अन्जाम, देखा नहीं तुमने! . कल रात […]

  गलतियाँ तुमसे भी हुई है , गुनाह हमने भी किये है पत्थर तुमने फेंके , गोलियों के जख्म हमने भी दिए है । गोली से मरे या शहीद हुए पत्थर से; नसले-आदम का खून […]

टिप टिप बरसी पानी की बूंदे ऐसी आई लिपटी हुई खुशी की लहर दौड़ाई उन्होंने प्यार कम हो गया था जिन रिश्तों में बरसाती लहर और गरजता आसमान भर सा गया वोह खंडार सा रेगिस्तान […]

अभी थोड़ा कच्चा हूँ, दिल का मैं सच्चा हूँ,      कवियों की महफ़िल मैं एक छोटा बच्चा हूँ| लिखे है कई ग्रन्थ कवियों ने दुनिया पर,      अब कुछ पंकितियां मैं कवियों पर लिखता […]

तुझे मैं ढूँढता हूँ कहाँ कहाँ पर? कदम यादों के हैं जहाँ जहाँ पर! दर्द की मिनारें हैं मौजूद जिसजगह, जिन्दगी भी दफ्न है वहाँ वहाँ पर!   रचनाकार- मिथिलेश राय #महादेव’

कुछ दीवाने थे , कुछ परवाने थे- इस महफ़िल में, शमां को जलाने के लिए सब थे बेताब- इस महफ़िल में . दर्द रक्काशा का कौन समझे यहाँ, उसके हुस्न को ही चाहने वाले  थे […]

ღღ_महबूब से मिलने की, हर तारीख़ ग़ज़ल होती है; महफ़िल में उनके हुस्न की, तारीफ़ ग़ज़ल होती है! . ग़ज़ल होती है महबूब की, बोली हुई हर बात; आशिक के हर ख्वाब की, तकदीर ग़ज़ल […]

जिन्दगी आज क्यु इस कदर वे-परवां हो गई, थी जो सपने साथ वो भी आज खफा हो गई/   बहारो ने भी रुख बदल लिये अब हमसे, गीत लिखना भी चाहुँ तो कैसे शब्द जुदा हो गई/   अरमॉ मचलते रहे दिल ही दिल मे योगी, सारी उम्र की चाहत आज रफा दफा हो गई/   खुदा से पुछू की यै खुदा ये जिन्दगी क्यु दी, जो साथ थी हमारी वो भी बेवफा हो गई /   योगेन्द्र कुमार निषाद घरघोड़ा जिला-रायगढ़ (छ.ग.) ९४०६२२०६८३

किनारे पर भी रहूँ तो लहर डुबाने को आ जाती है, बीच समन्दर में जाने का हौंसला हर बार तोड़ जाती है, दिखाने को बढ़ता हूँ जब भी तैरने का हुनर, समन्दर की फिर एक […]

ना तन्हाई की समझ है ना काफिले में चलने का सलीका मुझे, मगर ठहरकर कभी मन्ज़िल मिलती नहीं, सो अक्सर राहों पर बढ़ता रहता हूँ मैं, ना चुप्पी की समझ है ना शोरो गुल में […]

ღღ_मैं भी लिक्खूँगा किसी रोज़, दास्तान अपनी; मैं भी किसी रोज़, तुझपे इक ग़ज़ल लिक्खूँगा! . लिक्खूँगा कोई शख्स, तो परियों-सा लिक्खूँगा; ग़र गुलों का ज़िक्र आया तो, कमल लिक्खूँगा! . बात ग़र इश्क़ की […]