उसे ही शिकायत करते देखा
September 15, 2021 in हिन्दी-उर्दू कविता
जिसके सहारे जग को देखा
उसे ही शिकायत करते देखा
आशाओं के तार लगाकर
असली नकली प्यार दिखाकर
अपने इतने पास बुलाकर
न समझाना समझाते देखा
नेह के दावे इतने सारे
सामने आकर पांव पसारे
बीते पल के सहारे को
नये पलों में किनारे देखा
हर दिन वही गलती दुहराते
निर्जीवों को गले लगाते
सजीव सहारों पे झल्लाते
करनी पर पछताते देखा
लहरों का लम्बा साथ मिला
साथ का आभास जगा
भरोसा था जिनके कंधों पर
पर हाथ सिसकते देखा
जीवन है इक अनजान छांव
सपना ही है सबका गांव
छोड़ना है जिन छांव को भी
उन्हें कसके पकड़ते देखा
टूटी है किसी की आस
आते बनके जिनकी प्यास
अरमान बिखरने के कारण ही
हर सपने को बिखरते देखा
जिसके सहारे जग को देखा
उसे ही शिकायत करते देखा