मेरा कुछ भी नहीं है, मुझमें राम
सब-कुछ तेरा ही तेरा है राम
बस देना साथ हमें सदा राम
हम हैं तुम्हारे, तुम हो हमारे राम ।।1।।
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एक तेरा ही रूप फैला है कण-कण में राम
एक तुम्हीं हो सृष्टि में सबकुछ राम
व्याख्या की नहीं जा सकती तेरी महिमा की राम
एक तुम्हीं हो सबकुछ राम ।।2।।
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वेदव्यास गीता हो तुम राम
तुलसी की रामायण घर-घर में गायी जाती है राम
संत कबीर की वाणी हो तुम राम
मीरा की गिरिधर, गणिका का उद्धारक हो राम ।।3।।
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क्या-क्या हो तुम राम
क्या ना हो तुम राम
किसमें सामर्थ्य है, तुझपे लेख लिखे राम
तुम्हीं लिखे, तुम्हीं सुने हैं राम ।।3।।
जय श्री सीताराम ।।
MERA KUCH BHI NAHI HAIN
Comments
3 responses to “MERA KUCH BHI NAHI HAIN”
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श्री राम जी पर बहुत सुंदर कविता, जय श्री राम 🙏
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एक तेरा ही रूप फैला है कण-कण में राम
एक तुम्हीं हो सृष्टि में सबकुछ राम
व्याख्या की नहीं जा सकती तेरी महिमा की राम
एक तुम्हीं हो सबकुछ राम
—— कवि विकास जी की बहुत ही सुंदर रचना है यह। बहुत सुंदर लय, बहुत सुंदर भाव। -
खूब
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