muktak

      मैं एेसे दरिया के किनारे बैढा हुं,
हर घडी जहा से समुन्दर दिखने लगता है।
ये मेरा दिल भी एक जिद्दी बुजुर्ग् जैसा है,
जो रात होते ही किस्से सुनाने लगता है।
आपका अपना कवि नवीन गौड

 

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5 Comments

  1. पंकजोम " प्रेम " - December 11, 2015, 12:32 pm

    Bhut khub….naveen ji

  2. Ankit Bhadouria - December 12, 2015, 10:48 am

    waah…..bht khoob

  3. अंकित तिवारी - December 12, 2015, 12:28 pm

    wow

  4. Mohit Sharma - December 12, 2015, 5:05 pm

    bahut ache

  5. महेश गुप्ता जौनपुरी - September 12, 2019, 10:57 pm

    वाह बहुत सुंदर

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