बन्द मुट्ठी

बन्द मुट्ठी

बन्द मुट्ठी में कई राज़ दबाये बैठा हूँ,
अनगिनत शहीदों के कई नाम छुपाये बैठा हूँ,

मेरी खातिर होती रही हैं कितनी ही कुर्बानी,
मैं बेज़ुबान सही पर हर जवान की पहचान सजाये बैठा हूँ,

रंग भी गजब हैं और रूह भी अजब हैं ज़माने मे साहिब,
मगर मैं (तिरंगा)तीन रंगों में ही सारा हिन्दुस्तान समाये बैठा हूँ॥
राही (अंजाना)

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सरेआम रक्खे हैं।

बैठी है

बैठी है

जवाब माँगता है

7 Comments

  1. Nitesh Chaurasia - January 27, 2017, 11:57 am

    Jain Hind..Nice Poem

  2. Kirti - January 27, 2017, 4:46 pm

    nice

  3. Neha Saxena - January 28, 2017, 3:50 pm

    Awesome

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