इन्सान और जानवर (भाग – २)

(आपने भाग १ में पढ़ा – वीराने में कलूआ की मुलाकात एक अदभुत गिद्ध से होता है। वह मनुष्य की भाषा में बात करता है। वह अपने घर परिवार व समाज को छोड़ चूका है। क्योंकि सभी गिद्ध जानवर के मांस खा खा कर जानवरों जेसे बर्ताव करने लगे है। गिद्ध स्वंय अपनी आहार तालाश करने मे सक्षम नहीं है।वह इंसान के मांस खा कर जीवित रहना चाहता है। वह अपनी व्यथा कलूआ को कहता है ।कलूआ क्या जवाब देता है) अब आगे —
कलूआ –“हे गिद्ध राज। मैं अवश्य आपकी मदद करूंगा। मैं अभी आपके लिए श्मशान से इन्सान के मांस ले आता हूँ। आप प्रतीक्षा करें। कुछ देर बाद कलूआ श्मशान से एक अधजली लाश ला कर उसके सामने रख दिया। गिद्ध लाश को देखते ही कहा – ” भाई। मुझे इन्सान के मांस चाहिए, जानवर के नहीं ” ।कलूआ निराश हो गया। कलूआ श्मशान से इसी तरह से चार पाँच मर्तबा अधजली लाश लाता रहा , मगर गिद्ध सभी लाश को जानवर के लाश कह कर कलूआ को निराश करता रहा ।कलूआ — “क्षमा हो गिद्ध राज। मै आपकी समक्ष इन्सान के मांस ही लाया हूँ। जानवर के नहीं। गिद्ध — ” शायद तुम्हें इन्सान और जानवर में फर्क नहीं मालूम “। कलूआ – ” मैं समझा नहीं गिद्ध राज। आप कहना क्या चाहते हैं “। गिद्ध — ” तुम यहाँ जितने भी लाशें लाए हो, सब अपने जीवन काल में इन्सान तो थे मगर व्यवहार जानवरों जैसा था । ए सभी गरीबों के खून चूस कर स्वार्थ की रोटी सेकने के ही कार्य किया। इन्सान हो कर भी अपने से कमजोरों पर जानवर जैसे बर्ताव करते थे। परायी बहू बेटी को हमेशा हवस के नजरों से तौलते थे। ए सभी धर्म की आर में अधर्म के घिनौने खेल खेलते थे। यहाँ तक कि मन्दिर मस्जिद को भी नही छोड़ा”। कलूआ –“हे गिद्धराज।इस संसार में हर कोई कुछ न कुछ जरूर पाप किया है। आपके कहे अनुसार इतना नेक इन्सान इस भ्रष्टयुग में मिलना बहुत ही मुश्किल है “। गिद्ध — ” मैं भूखा मरना पसंद करूंगा लेकिन जानवरों के मांस खाना पसंद नहीं करूंगा। यह मेरी प्रण है। कलूआ वहां से चुपचाप अपने घर के तरफ चल पड़ा।

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