बेटी की आवाज

माँ की कोख में ही दबा देते हो,
मुझको रोने से पहले चुपा देते हो,
आँख खुलने से पहले सुला देता हो,
मुझको दुनियां की नज़र से छुपा देते हो,
रख भी देती हूँ गर मैं कदम धरती पर,
मुझको दिल में न तुम जगह देता हो,
आगे बढ़ने की जब भी मै देखूं डगर,
मेरे पैरों में बेडी लगा देते हो,
पढ़ लिख कर खड़ी हो न जाऊं कहीं,
मुझको पढ़ाने से जी तुम चुरा लेते हो,
क्यों दोनों हाथों में मुझको उठाते नहीं,
आँखों से अपनी मुझको बहा देते हो॥
राही (अन्जाना)


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7 Comments

  1. देव कुमार - January 30, 2017, 1:45 pm

    Bahut Khoob

  2. Anjali Gupta - January 30, 2017, 3:51 pm

    nice

  3. Neha - January 31, 2017, 12:03 pm

    Awesome

  4. Abhishek kumar - November 25, 2019, 7:09 pm

    सुन्दर रचना

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