महक रहा है सावन

महक रहा है सावन
सुन्दर सुन्दर कविताओं का आँगन,
और महक आ गई है जब से
हुआ नये कवियों का आगमन।

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जो तुम चिर प्रतीक्षित  सहचर  मैं ये ज्ञात कराता हूँ, हर्ष  तुम्हे  होगा  निश्चय  ही प्रियकर  बात बताता हूँ। तुमसे  पहले तेरे शत्रु का शीश विच्छेदन कर धड़ से, कटे मुंड अर्पित करता…

Responses

  1. बिल्कुल सही बात लिखी है आपने। अमिता जी, एकता जी व पाठक जी की बहुत सुंदर कविताओं के रसास्वादन का अवसर प्राप्त हो रहा है। बहुत आनंद की अनुभूति हो रही है।

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