मुक्तक

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किसलिए हर आदमी खुद को जला रहा है?
सिलसिला-ए-दर्द़ से खुद को सता रहा है!
ढल रही है जिन्दगी शीशे की शक्ल में,
रास्तों में तन्हा पत्थर सा जा रहा है!

मुक्तककार- #महादेव’

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1 Comment

  1. Kedar Sharma - October 10, 2016, 2:50 pm

    आपने तो दिल खुश कर दिया

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