“मैं कौन हूँ”

ღღ_मैं कौन हूँ आखिर, और कहाँ मेरा ठिकाना है;
कहाँ से आ रहा हूँ, और कहाँ मुझको जाना है!
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किसी मकड़ी के जाले-सा, उलझा है हर ख़याल;
जैसे ख़ुद के ही राज़ को, ख़ुद ही से छुपाना है!
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मेरी पहचान के सवालों पर; ख़ामोश हैं सब यूँ;
जैसे पोर-पोर दुखता हो, और बोझ भी उठाना है!
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वैसे तो इन गलियों से, मैं मिला ही नहीं कभी;
पर इस शहर से लगता है, रिश्ता कोई पुराना है!
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इक भूला हुआ फ़साना, ज़हन में उभर रहा है;
कोई जो मुझको पूछे, कहना कि ये दिवाना है!
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कोई शख्श हो शायद, मेरी पहचान का शहर में;
कि तलाश-ए-इश्क़ में हमने, छोड़ा आशियाना है!!…#अक्स

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