वचन

यदि बाँधने जा रहे हो किसी को
वचनों की डोर से, तो इतना
स्मरण रखना

कहीं झोंक न दे वचन तुम्हारा
उसे उम्र भर की अनन्त
प्रतीक्षा में…

क्योकि,
प्रतीक्षा वह अग्नि है जो भस्म कर
देती है स्वप्नों और उम्मीदों के
साथ-साथ मनुष्य की
आत्मा को भी…!!

©अनु उर्मिल ‘अनुवाद’

Published in मुक्तक

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Responses

  1. प्रतीक्षा वह अग्नि है जो भस्म कर
    देती है स्वप्नों और उम्मीदों के
    साथ-साथ मनुष्य की
    आत्मा को भी…!!
    _________ बहुत सुंदर और उच्च स्तरीय विचार प्रस्तुत किए हैं अनु जी आपने अपनी रचना में,बहुत ही गहरा सत्य छिपा है। रचना हृदय को छू गई , लाजवाब अभिव्यक्ति

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