“शब्दों के सद्भाव”

” माँ ”
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शब्दों के सद्भाव
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मानवता भी धर्म है जैसे
इन्सानियत मज़हबी नाम,
शब्दों के सद्भाव भुलाकर
जीवन बना लिया संग्राम |

सच्चाई के पाठ को पढ़ कर
एक किनारे दबा दिया
अपनी पनपती नश्लों से ही
खुद हमने ये दगा किया
इन्हे बताना बताना त्याग दिया क्युँ
एक ही हैं अल्लाह और राम
शब्दों के सद्भाव भुलाकर
जीवन बना लिया संग्राम |

मालिक ने तो एक जात
इन्सान की सिर्फ बनाई है
हिन्दू-मुस्लिम-सिक्ख-ईशाई
कहते हैं सब भाई हैं
रख लो अदब बुज़ुर्गों की
वाणी का कर भी लो सम्मान
शब्दों के सद्भाव भुलाकर
जीवन बना लिया संग्राम |

नश्ल वाद का जहर उगलना
मज़हब के ऐ रखवालों
हर बस्ती के निगहबान
इसे रोक सको तो रुकवा लो
वरना दिखेंगे धरती पे बस
मरघट कहीं कहीं समसान
शब्दों के सद्भाव भुलाकर
जीवन बना लिया संग्राम |

कैसे ज़ुदा करोगे दिल से
दिल में रची बसी ये शान
मुमकिन नही ज़ुदाई इनकी
इक दूजे की हैं पहचान
दिल के लहू को रक्त हृहय का
कह देना कितना आसान
शब्दों के सद्भाव भुलाकर
जीवन बना लिया संग्राम |

रात मे दिन का राज है कायम
दिल से ये एहसास न रूठे
सच्चाई मे अच्छाई की
डोर बँधी है आश न टूटे
काया मे जब प्राण रहेंगे
तभी मिलेंगें जिस्मो-जान
शब्दों के सद्भाव भुलाकर
जीवन बना लिया संग्राम |

मस्ज़िद से मन्दिर की दूरी
इतनी बड़ी नही मज़बूरी
‘दर’ और ‘द्वार’ पे आश प्रयास की
ही तो होती दुआ है पूरी
मक़सद नेकी लक्ष्य भलाई
हैं अवदान तेरे पैगाम
शब्दों के सद्भाव भुलाकर
जीवन बना लिया संग्राम |

मानवता भी धर्म है जैसे
इन्सानियत मज़हबी नाम,
शब्दों के सद्भाव भुलाकर
जीवन बना लिया संग्राम |

…अवदान शिवगढ़ी

०९/०८/२०१०,
हुसैनपुरा लुधि.
०९:०४ बजे,प्रात: |

Published in हिन्दी-उर्दू कविता

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