हाल -ए- दिल

हाल -ए- दिल

हम अपना हाल -ए- दिल आपसे कहते रहे
कभी बच्चा तो कभी मासूम आप हमें कहते रहे

आज तक कोई सबक पढा न जिंदगी में हमने
ताउम्र हम आपकी आखों जाने क्या पढते रहे

इक अरसा बीत गया हम मिले नहीं आपसे
तुझसे मुलाकात के इंतजार में हम तनहा मरते रहे

न हुई सुबह न कभी रात इस दिल ए शहर में
कितने ही सूरज उगे कितने ही ढलते रहे

अनजान राहों में चलते रहे मंजिल की तलाश में
चलना ही मुसाफिर का नसीब है सो हम चलते रहे

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7 Comments

  1. अंकित तिवारी - September 17, 2015, 10:08 am

    Behatarin bhai….. Badhai aapki

  2. Anjali Gupta - September 18, 2015, 9:03 am

    nice

  3. Mohit Sharma - September 22, 2015, 11:29 pm

    gud one!

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