तुम्हारे सिले होंठ…

आजकल बड़े पैतरे आजमाने लगे हो तुम!
मुझसे दूर जाने के…
इतनी समझ आई कहाँ से तुम में?
पहले तो तुम बहुत नादान हुआ करते थे…
अच्छा तो अब ये भी मेरी
संगत का असर है!
ऐसा ही बोल रहे हैं
तुम्हारे सिले होंठ…
काश! कुछ और भी सीख जाते तुम मुझसे
रिश्ते संजोना, दिल रखना, वफ़ाई
तो कितना अच्छा होता!
यूंँ टूटते नहीं हम
बिखरते नहीं हम…
और समेटना नहीं पड़ता मुझे
जज्बातों को इस तरह
गज़लों में, कविताओं में
जिंदगी नहीं ढूंढते हम…

Comments

16 responses to “तुम्हारे सिले होंठ…”

  1. बहुत ख़ूब

  2. वाह वाह, अतिसुन्दर

  3. Rishi Kumar

    बहुत खुब कहा है आपने

    गागर मे सागर है
    कविता की पहली और आखिरी 4-4 लाईनो मे एक अच्छा मैसेज है👌👌✍✍

    1. Pragya Shukla

      थैंक्स फॉर कमेंट्स
      आपने इतनी गहराई से पढ़ा
      उसके लिए धन्यवाद

  4. Virendra sen Avatar

    क्या बात है अति सुन्दर

    1. Pragya Shukla

      धन्यवाद आपका

  5. Pragya Shukla

    🙏🙏

  6. Pragya Shukla

    धन्यवाद आपका

  7. vivek singhal

    This comment is currently unavailable

  8. बहुत ही उम्दा

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