शंका ना थी कोई भी,वो समाधान करने बैठ गए। हम तो बात करना चाहते थे,वो व्याख्यान करने बैठ गए।
शंका ना थी कोई भी,वो समाधान करने बैठ गए। हम तो बात करना चाहते थे,वो व्याख्यान करने बैठ गए।
जिंदगी कितनी सुलझी हुई है, अगर हम माहिर हो उसे सुलझाने में।
मेरे दिल ने एक सवाल किया.. आज लखनऊ का मौसम कैसा है? हूबहू मेरे महबूब जैसा है..
गीता का सार जिसने भी समझ लिया संसार में उसी ने औरों से कुछ अलग किया तेरा मेरा अपना पराया माया मोह से जो दूर हुआ उसी को मिला मोक्ष का द्वार वही हर आंखों […]
हम वो शख्स नहीं जो, गड़े मुर्दे को भी कब्र में सोने न दे। मुद्दत बाद नींद आयी है कम से कम कुछ पल सोने तो दे।।
हमने दर्द को दावत दे दिया अपनी गुलिस्ताँ में। देखें क्या रंग लाती है इन अमीरों के अंजुमन में।।
दिखाईं देता है, तुझे अपना दुःख, और तकलीफें भी, और नज़र आ जाती है, अपनी अच्छाईयां भी, मगर मानुष! तू बहुत लालची, दिखावे के लिए तुने, क्या-क्या नहीं किया, फिर दिखाई देती है, तुम्हें अपनी […]
जो कभी दुश्मन था मेरा, वो आज मुझसे हमदर्दी रखता, ये मेरा दर्द ही अब मुझे , आजकल तसल्ली देता है।
आ सनम तुझे मैं आज, अपनी इन गेसूओं में छुपा लूं। ए आँखें बंद होने से पहले, मैं तुझे आँखों में बसा लूं।।
जिसने परखा औरत के दर्द। वही कहलाया जवां एक मर्द।। भाई ताक़त से नहीं जाना जाता। उसे उसका हक़ दो तो ही मर्द।। हुकूमत की चक्की में पीसने वाले। क्यों कहलाते हो तुम जवां एक […]
हे गणपति देव! चतुर्थी पर, प्रणाम आपके चरणों में, कृपा दृष्टि बनी रहे प्रणाम आपके चरणों में, मैं गिरा हुआ अज्ञानी हूँ, सच्ची राह मुझे देना, मेरी वाणी से कभी किसी को ठेस न लगे […]
जितना रोकूं उतना ही बहते , दर्द का किस्सा पल में कहते, आंसू मेरे बड़े ही मनमाने-से, जरा सी बात पर बहते रहते।
‘ये रब करे कि मोहब्बत मेरी असर कर ले, वो दिल को भेज दे, दिल को ही नामाबर कर ले..’ – प्रयाग मायने : नामाबर – डाकिया
इम्तिहां की हद हो गई वक़्त भी बेवफ़ा बन आया जिनके दम पर चलते थे सबसे पहले उनसे विसराया खुद कहा `दूर रहो मुझसे ʼ प्रेम की भिन्न परिभाषा से परिचित करवाया यह कोरोना काल […]
छह मास हो गए पिताजी को गए, छठा मासिक श्राद्ध भी आज हो गया, दिन बीतते से जा रहे हैं, सब कुछ कहीं खो गया। जाने कहाँ चले जाती है आत्मा, कहाँ विलीन हो जाती […]
गणेश – चतुर्थी के शुभ अवसर पर —- गणपति आज हमारे घर आए, खुशियां बहुत साथ वो लाए। साथ रहेंगे कुछ दिन हमारे, हम भी खाएंगे लड्डू ,मोदक उनके सहारे। उनके आने से घर महका […]
शरीफों की सभा लगी फिर लुटती रही क्यों द्रौपदी? दु:शासन के दुराचार पर संवेदना क्यों मर गई? यही पूँछे द्रौपदी हर सड़क और हर गली… देवताओं का दाग अहिल्या के दामन जा लगा.. वह नारी […]
नारी है वह यह मत समझ वह तो हुनर की रात है… एक बीमारी से वह लड़ रही है बस यही दु:ख की बात है…
उम्र में एक छोटे जीव के पीछे बड़े दिग्गज पड़े हैं. और कहते हैं हम रिश्ते में उनके करीबी ही रहे हैं…
अगर दर्द समझता तू तो अपनी हरकतों पर शर्मिन्दा होता.. अलग-अलग पहचान से यूँ ताने ना मार रहा होता…
दिल दुखाने की बात ना कर तो अच्छा है एक दिन तुझे सब छोड़ जाएगे.. रह जाएगा बस तेरा ही निशान बाकी तो सब तेरी बातों से ही मर जाएगे..
खाली कविता नहीं करते हैं दर्द भी समझते हैं, दूसरों को दिया हुआ भी, दूसरों से लिया हुआ भी।
अपने दिल का हाल हमें न सुनाओ, हम तो मजाक बना देंगे, बेदर्द राही हैं हम तुम्हारे दर्द पर कविता बना देंगे।
सामने थी, मगर कुछ न कह पाये हम बिन कहे अपने दिल की न रह पाये हम। कुछ न बोले मगर कह दिया हाल सब, आंसुओं में सने से दिखे गाल तब।
‘तू करले जितना अपने दिल पे इख़्तियार मगर, निगाह जानती है उसकी, अपना वार मगर.. ये भी मुमकिन है आज पहली दफा बच जाए, मगर बचेगा कहाँ और कितनी बार मगर..’ – प्रयाग मायने : […]
हम तुम्हारी गली में कहां आ गए हम तो गुस्ताख़ हैं जो यहां आ गए, अब मुहोब्बत हुई है यहां से हमें जाने का मन नहीं है यहां से हमें। दिल दुखाकर भगा दो, तभी […]
खुद को उत्साह में रख न हो मन दुखी, तू बढ़े जा, बढ़े जा न हो मन दुखी। यह तो संसार है, इसमें संघर्ष है, जो बढ़ेगा उसी का ही उत्कर्ष है। तेरे कदमों की […]
सावन की बदरी सी बरसी जो तेरे जुल्फो से बूंदे, कच्चे मकां सा मेरा ये दिल ढह गया।। मदिरा के जाम सी छलकी जो तेरी आंखों से मस्ती, शराबी सा बदन मेरा ये झूमता ही […]
एक था जिम और एक थी डैला, दोनों लंदन में रहते थे। कहानी ये बिल्कुल सच्ची है, मेरे दादा कहते थे। डैला थी बहुत ही सुन्दर, बाल सुनहरी थे उसके जिम भी बांका युवक था, […]
ज़रा सी बात पर चिढ़ना दूसरों को बुरा कहना ये आदत छोड़ दो ना जी उल्टी बात शुरुआत तुमने ही करी थी ना, मिला उत्तर तो चिढ बैठे ये आदत छोड़ दो ना जी
बात ठंडी हो चुकी थी फिर लगाने आग आये सोचते हैं जो कहें हम सब करें स्वीकार उसको। दूसरों पर फेंक कीचड़ मत बनो यूँ पाक-साफ़ खुद की गलती देख लो पहले करो स्वीकार उसको।
गमज़दा सा हूं ;उसके लिए जो तुमने मेरे साथ किया। और बहुत ही निशब्द सा है, यह दर्द जो तुमने मुझे हर पल दिया। मगर रहे तू हमेशा बाग़-बाग़ , चल छोड़ो ! हमने तुम्हें […]
चल आ मैदान में पुलकित हो, ना रख चिंता ना विचलित हो.. तेरे मार्ग की हर इक-इक व्याधि, तेरी आत्म शक्ति से परिचित हो.. भय बंधन काट के बाहर आ, नित क्रंदन काट के बाहर […]
रास्ते जलमग्न हैं हर तरफ बरसात है, दूसरे की छतरियों में भीगते जज्बात हैं
जीवन में सबके होते हैं ऐसे लोग… जो रिश्तों महज खिलौना ही समझते हैं.. जब तक मन करता है खेल लेते हैं.. जब जी चाहे रिश्ते तोड़ देते हैं..
‘तेरे एहसास में रहूँगा मैं असर बनकर, या कभी दिल में ही साँसों की रवानी बनकर.. संभालकर मुझे रखना है इम्तेहान तेरा, अब मैं रहूँगा तेरी आँखों में पानी बनकर..’ – प्रयाग मायने : रवानी […]
कैसे रिश्ते और कहाँ के.. पल टूट ही जाते हैं.. अपना उल्लू ना सीधा हो तो खुद ही रिश्तों से मुकर जाते हैं..
हम खूबसूरती को अलग पैमाने से आंकते हैं, वे चेहरा देखते हैं, हम दिल में झांकते हैं। 1। हजारों बार कान भरे फिर भी हमें बदल नहीं पाये वे ऐसा क्यों करते हैं आशय नहीं […]
मेहनत बेकार नहीं जाती है आज नहीं तो कल वह उग कर, नई कली बन मुस्काती है। आज सोचते हैं हम इतना करने पर भी मिला नहीं कुछ, लेकिन करने पर मिलता है, यही शाश्वत […]
अपनी कुटिल मुस्कान से तू मुस्कुरा मत आज हम पर (भाजी बनाने को), आलू जरूरी हैं जरा सा दाम कम कर।
मुस्कुरा मत इस तरह अंजान राही पर अधिक दर्ज होगा जब मुकदमा दण्ड पायेगा पथिक।
सुनहरी धूप है, चारों तरफ प्रकाश है, आज लगता कि बारिश ने लिया अवकाश है। यूँ तो बारिश के बिना इस जिन्दगी कल्पना कर नहीं सकते हैं हम सृजन की प्रमुख साज है। फिर भी […]
मेरी छः महीने की गुड़िया आज लगी है स्वयं पलटने, हूँ, हाँ, करती, हाथ उठाती धीरे-धीरे लगी समझने। अगर गोद मे नहीं उठाओ तो लगती थोड़ा सा रोने, प्यारी सी लोरी गाते ही मीठी नींद […]
‘किसी की आह से महसूस हुआ है मुझको, कि बहुत दूर तक पहुँची है आज मौज-ए-लहू..’ – प्रयाग मायने : मौज ए लहू – खून की लहर
रोशनी आई अचानक बादलों ने घेर ली, दे गए खुद ही दिलासा आंख क्यों फिर फेर ली।
कोशिश कर आगे बढ़ने की बंदे, तुझमें है सिंहों-सा दम… ना मान हार तू लहरा दे, अपनी ताकत से जग में परचम… नित अग्रसर हो जीवन पथ पर, मत गवां समय तू रुक-रुककर… तू जवाँ […]
वो भी क्या उमर थी,जब मस्ती अपने संग थी , सारी फिकर और जिम्मेदारियाँ, किसी ताले मे बंद थी, वो गलियाँ जिसमे खेलते थे क्रिकेट,पतंग उड़ाते कभी थे, कभी तोड़ते थे कांच तो कभी पेंच […]
“साँस लेता हूँ फकत ये भी कोई कम तो नही, ज़िंंदगी तू ही बता मुझपे तू सितम तो नही.. कभी पूछा न ज़माने के शरीफ लोगों ने, ‘दीवाने ये बता कि तुझको कोई गम तो […]
दूसरे को ठेस देने से पहले यह याद रखो चोट दिल पर लगेगी अहसास रखो चार दिन की जिंदगी में नफरत नहीं प्रेम पास रखो ककड़ी सी शीतल तासीर रखो जलेबी सी गर्म मिठास रखो […]
सब रूठ सकते हैं लेकिन माँ नहीं रूठती है। सब थक जाते हैं लेकिन माँ थक कर भी नहीं थकती है। सब सो जाते हैं, लेकिन माँ नहीं सोती है। वो हमारे लिए रात-रात भर […]
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