वृक्षों को काट-काट कर, इति करे सब वन प्रकृति का सर्वनाश किया है, कमाने को केवल कुछ धन। दोहन कर-कर प्रकृति का भी, चैन मनुज को ना आया पशु , पक्षियों को बेघर किया है, […]

रेत सी है अपनी ज़िन्दगी रेगिस्तान है ये दुनिया, रेत सी ढलती मचलती ज़िन्दगी कभी कुछ पैरों के निशान बनाती और फिर उसे स्वयं ही मिटा देती, कांटों को आसानी से पनाह देती फूलों को […]

समन्दर का वो किनारा साथी है हमारा, जहां बैठ घंटों है वक्त हमने गुजारा, जैसे कि उनसे सदियों से नाता हो हमारा, बहुत बार तो मिलना नहीं हुआ है पर एक अनोखा रिश्ता सा कायम […]

किसी पिंजरे में कैद पंछी की तरह जैसे हमारा मन भी कैद हो गया है, सामने खुली चांदनी नजर आती है पर चार दिवारियों के बाहर नहीं निकल पाती, कुछ रस्मों की दीवारें हैं कुछ […]

मैं हिन्दी हूं भारत की भक्त हिन्दी, संस्कृत मेरी जननी जिसमें अंकित है संस्कृति, उस संस्कृति की अब मैं उत्तराधिकारणी, उद्धरित हुई मेरे संग कई और बहने भी, उर्दू, पंजाबी, गुजराती, सिंधी, कश्मीरी, हरियाणवी, गढ़वाली […]

अजीब नौटंकी लगा रखी है जमाने ने मेरी विकलांगता पर खुल के हंसते हैं और अपनी कमी को दिन रात रोते हैं; गिर पड़ी जब ठोकर खाकर पत्थर से अंधा बताकर हमे मज़े लेते रहे […]

सोच रही हूँ डालने को बालू समंदर में ताकि राह खुल जाये मुसाफिर की; अजीब दास्ता है ये, हो सकता नहीं ये संभव, पर है ये दुनिया असंभव को संभव करने वाली, हर सपने की […]

पूर्ण समृद्ध न तो मैं हूं और न ही कोई अन्य, सर्वज्ञ तो इस जहाँ में कोई भी नहीं, हर किसी में कुछ न कुछ रिक्तता है जैसे, किसी भी ह्रदय का ज्ञान सम्पूर्ण नहीं, […]

हैं बहुत यहाँ एक से बढ़कर एक, है काबिलों की बस्ती ये जहाँ , हैं कितने ही माहिर आये यहाँ और आकर चले गए न जाने कहाँ, कोई रहा कहाँ एक वक़्त जीकर यहाँ, हर […]

धूल, कंकड़, पत्थर, पहाड़ सबकी अपनी शान है, अपना मान है; हवा, जल, अग्नि सबकी अपनी पहचान है, कौन किससे भला समान है? समान कुछ नहीं यहां सबका बस अपना स्थान है छोटी सी झोपड़ी […]

हो चाहे कैसी भी घड़ी, आंधी तूफ़ान की लगी हो लड़ी, या मन को झुलसा रही हो अग्नि, डर हो यदि आगे हार जाने की, या फिर अपना सब खो देने की, शुरुआत जरूरी है; […]

निर्भया कितनी दफा रोई दरिंदों की पनाहों में सिसकता ही रहा यौवन वासना की बाँहों में तब तलक रूठेगा बचपन पूँछती है यही नारी मरेगी कब तलक बेटी बचेगा कब तलक अत्याचारी पुरुष की बन […]

दो पंक्तियाँ तुम पर न लिख पाऊं तो मैं भी कवि नहीं, स्वप्न तक शायरी न पहुंचाऊं तो मैं भी कवि नहीं। जब कभी मन टूट कर बिखरा हुआ हो, दर्द हो, दर्द तक मलहम […]

मनोरम रात है बिखरी हुई है चांदनी तुम्हारी मुस्कुराहट सी दिखाई दे रही है चांदनी। जिस तरह चाँद खिलता है कभी कुछ दिन महीने में, उसी की भांति तुम भी हो जो हंसते हो महीने […]

दिन गुजर जाते हैं हम वहीं रह जाते हैं नये दिनों की तरह कहां नये हो पाते है पुराने जख्म मिले कहीं क्यों न भुला पाते हैं आये नये जो पल हाथ बीती बातों को […]

सो जा मजे से चैन से तू सोमरस पीकर न कर चिंता हमारी हम भले, भूखे ही मर जाएं, तेरे नशे ने ही हमें सड़कों में ला पटका, तुझे अब भी नहीं है लाज जाएं […]

जब मेरा अंत समय है नज़दीक हो, तब आँखों में छवि मेरे बच्चों की हो, और मेरे हाथों में हाथ तेरा हो… आयी थी जिस क़दर वद्दू बनकर इस घर में, उसी जोड़े में विदा […]

पड़ चुकी है साँझ घर घर में चमकते बल्ब ऐसे लग रहे हैं, जैसे तारों ने किया धरती में डेरा। और चंदा आसमां में आ चुका है, फुल चमक में, चाँद-तारे और बल्बों का मिलन […]

पापा की प्यारी हूँ मैं फूलों की क्यारी हूँ मैं पर सबसे पहले नारी हूँ मैं… अहिल्या हूँ मैं सीता हूँ मैं पवित्र पावन गीता हूँ मैं कभी शेरनी तो कभी चीता हूँ मैं पर […]

अचरज भरा आकाश है कहीं धूप है कहीं छांव है आसमान की चादर में सितारों के बूटे हैं बादलों के घोड़े हैं जो दौड़ते हैं इधर-उधर जुगनू भी अपनी प्रेयसी को ढूंढते हैं रात भर […]

कविता- सयानी ———————– तेरी एक ज़िद से, सभी रो रहे हैं| पापा मम्मी चिंता करके, ओ भी रो रहे हैं| इण्टर के बाद दीदी, घर से ही बाहर हो SSC मे जाॅब बा, देके गई […]

दूर – दूर से कवि पधारे, कोई पर्वतीय, कोई मैदानों से । यहां पे आकर , धूम मचा कर, लिखें बड़े अरमानों से । मैं भी आई, नाम है गीता , लिख दी मैनें, भी […]

अचरज भरा आकाश है कहीं धूप है कहीं छांव है आसमान की चादर में सितारों के बूटे हैं बादलों के घोड़े हैं जो दौड़ते हैं इधर-उधर जुगनू भी अपनी प्रेयसी को ढूंढते हैं रात भर […]

नीले आसमान पर सूरज की उपस्थिति सौंदर्य की पराकाष्ठा किरणों की लालिमा से चमक रहा है पृथ्वी का हर कण हर क्षण…. पत्तियों की सरसराहट से मधुमास का सुंदर आगमन चमन की सुगंध से महक […]

विविध काव्यों से सजा है न्यारा कविवर ने है जिसे संवारा समालोचना की मुखरता से मिलकर सबने जिसे निखारा छन्द- अलंकार की बहती धारा हाँ, वह है “सावन” मंच हमारा। बनी एक पहचान हमारी खुद […]

कोई ख्वाहिश कहाँ कोई पछतावा भी नहीं पतझङ-सी है वीरानी बसंत आया ही नहीं दूर तक फैला है सूनापन जैसे शून्य निकल आया हो हाँ, कुछ इस तरह तेरा ख़याल आया हो । काली निशा […]

कुछ वक्त की ज़िन्दगी है, फ़िर तो हमको है जाना कुछ समझौते भी हुए यहां, कुछ उपहार मिले माना खाली हाथ ही तो आए थे, खाली हाथ ही है जाना ये तो निर्भर, करता है […]

चाँद देखो, चाँद की शीतल छटा का लाभ लो। दाग-धब्बे खोजने की मंद आदत त्याग दो। इंसान में कमियां भी होंगी और अच्छाई भी होगी बस कमी ही खोजने की मंद आदत त्याग दो। हो […]

दिल वालों की दिल्ली देखो , हो गई है बीमार कहीं किसी का साथी छूटा, कहीं किसी का प्पार दिल्ली का तो अब ये नसीब हो गया हो गया वहीं दूर, जो करीब हो गया […]

कड़ी बेरोजगारी से दुखी है हर युवा देखो धरी ही रह गई तैयारियां परीक्षा रुक गयीं देखो। निराशा के भंवर में पड़ न जाए देश का यौवन समय रहते करो मिलकर संवारो देश का यौवन।

तुम्हारे हाथ में अपनत्व की जो कुछ लकीरें हैं उन्हीं में एक मैं भी हूँ जरा सा गौर से देखो। आईना सामने रख खुद की नजरों में जरा देखो, मिलूंगा नीलिमा में तुम जरा सा […]

वे सो रहे हैं व्यवस्था को, जेब में लेकर, हम रो रहे हैं , हाथ में मोमबत्तियां लेकर! वे जागते हैं अक़्सर चुनाव में, और हम हादसों में ….