ये पथ ले जाएंगे, लक्ष्य तक जरूर मत छोड़ना मनुज तू अपना गुरूर हौसले बुलंद ही रखना तू सदा, अंधेरों के बाद ही आती है रौशनी…. *****✍️ गीता*****

तू खुद सक्षम बन , ए ! नारी शक्ति! जमाना खुद बदल जाएगा, बैठा है हर ज़हन में रावण, राम कब तक तुझे बचाएगा, तू सीता बन नए युग की, रावण खुद मर जाएगा, ना […]

हर घर की खुशी व रौनक है बेटी उसी से दुनियां शुरू व खत्म होती किलकारी सब को हर्षा जाती हर मात पिता को ही भा जाती परिवार एकता का कारण जो जीवन जीने की […]

जब-जब , मैं रोई! तब-तब , चैन से मां ना सोई, मां ने पाला , मां ने सम्भाला, अपना निवाला, मेरे उदर में डाला, कोने में रोकर , मुझको हंसाया, जिंदगी क्या है, सलीका सिखाया।

अतीत की छाया पड़ने न देना, यादों का साया दुख देता है । खूश रख अपने को फिलहाल से, उम्मीद का सवेरा सुकून देता है, लगा अनुमान मस्तिष्क से तू, कौन बुरा, कौन अच्छा है! […]

बहुत ही है मुश्किल औरों में सुधार लाना बेहतर है खुद को ही निश दिन सुधारते जाना काम बहुत है सारे हर दिन पांव पसारे कुछ कर नाम कमाते तो कोई कल पर टारे दिन […]

न्यूज़ ना देखना दोस्त ! वहां केवल भ्रम फैलाया जाता है । कुछेक मुद्दो के पीछे, सत्ता को बचाया जाता है। सब कुछ पहले से तय होता है बहस जिस मुद्दे पर , उसे गर्व […]

माना मैं सुन्दर नहीं पर इस सुन्दरता की मुझे जरूरत नहीं क्योंकि जिनकी मैं दुनिया हूँ उनकी दुनिया में मुझसा सुन्दर और नहीं कवित्री ….कविता तंवर

यह जिंदगी की दौड़ है, जनाब! यहां सब दौड़ लगाते हैं। कोई हार कर जीतने की, दौड़ लगाता है। कोई जीत कर, फिर से जीतने का, जश्न मनाता है। यह जिंदगी की दौड़ है, जनाब।

हे प्रभु! तुम ही तो हो। तुम हो सृजन दाता, तुम हो रचना निर्माता। तुम हो जीवन की आस, तुम ही हो निश्चित श्वास। तुम ही हो अमूर्त प्रेम, तुम ही दिशा और दिन। हे […]

है डर मुझे आज भी, उन सुनसान गलियों से। वह सन्नाटे में चिल्लाते , शोर की गहराइयों से। वह डरा देती है, मुझे। मैं जब उस ओर गुजरती हूं। याद आता है, मुझे उसका चेहरा। […]

मेरी बेटी। छोटी सी गुड़िया, कभी हंसती, कभी रोती। तो कभी रुलाती, तो कभी हंसाती। मेरी बेटी। अभी सीखा है, उसने शब्दों से खेलना। भाता है उसे, एक ही सार में, स्वर और व्यंजनों को […]

मैं अभिमन्यु मां के पेट में ही मज़दूरी के गुर सीख चुका था; किंतु निकल नहीं पाया इस चक्रव्यूह से- इसी से पीढ़ी दर पीढ़ी मज़दूरी की विरासत बांट रहा हूं !

कविता क्या होती है कुछ शब्दों की तुकबंदी, या लय का विस्तार। जो अंत मन को व्यक्त कर लेती है या फिर सौंदर्य श्रृंगार। कविता क्या होती है? जिसने देश की खुशबू और होता है […]

मैं जिंदगी जी रहा हूं। दूसरों के दिए एहसानों, पर पल रहा हूं। भटक रहा हूं मैं, अपने आप से। घर के रास्ते, बार-बार टोह रहा हूं। कहां जाऊं, मैं किस डगर। जो भूख मिटा […]

खुशियां कई तरह की गम भी कई तरह के जीवन सफर निराला साथी कई तरह के। चलते चली है गाड़ी कोई तो चढ़ रहा है कोई उतर रहा है राही कई तरह के। कोई स्नेह […]

(भाग दो में आपने पढ़ा – रुपा अपने पति के पेट की आग बुझाने के लिए खुद को दिलचंद के हाथों बिकने के लिए तैयार हो जाती है। वह अपने पति के ख़ातिर इज्ज़त क्या […]

लगता पूछती हो, बता माँ कबतक बंदिशो में रहना होगा कब खुलकर हंसना, बोलना बेखौफ़ घर से निकलना होगा । कब मैं भी बेखौफ़, सुबह की सैर पर जाया करूँगी दिन ढले भी निश्चिंतता से, […]

कभी शौक था मुझे, रंगों से खेलने का, सपनों को बुननें का, तारों को गिनने का, चंदा से छिपने का , फूलों को छूने का, कभी थी झूले की चाह, तो कभी गुड़ियों की कभी […]

माँ की सबसे अच्छी सहेली पिता की हर ज़रूरतों का ख़्याल बिटिया के बिना सब अधूरा इसके जैसा कहाँ कोई मिशाल । भाई की हर घङी हिमायत करने वाली बात -बात में, ठुनक कर लङाई […]