कितनी उधेड़बुन करती हूं, मैं इन धागों के साथ । जिसे जिंदगी कहते हैं , कभी गम की गांठ खोलती हूं। कभी खुशियों की गांठ बांधती हूं । बस लगी रहती हूं ,इसे सुलझाने में। […]
कितनी उधेड़बुन करती हूं, मैं इन धागों के साथ । जिसे जिंदगी कहते हैं , कभी गम की गांठ खोलती हूं। कभी खुशियों की गांठ बांधती हूं । बस लगी रहती हूं ,इसे सुलझाने में। […]
पलकों पर नींद बिखरी पड़ी होती है , फुर्सत में समेट कर सोते हैं।।
क्या उकेर देती , मैं इन कोरे पन्नों के ऊपर। अपने भीतर की वेदना या दूसरों की प्रेरणा । अनकही बातें या सुनी सुनाई बातें। नहीं जानती इसका अर्थ क्या होता । क्या उकेर देती, […]
ये किनारे दूर होते गए , सिर्फ शकों के सैलाब से।।
‘उलझ पड़ें न कहीं हम, के इस ज़िन्दगी से, अपनी क्या बनेगी, आज तक बनी किसकी है.. इसलिए रखता हूँ हर आतिश को खुद में दफन, कहीं वो पूछ न बैठे कि आगज़नी किसकी है..’ […]
प्रेम नगरी में मैने प्रेमा से पूछा प्रेम के क्या है परिभाषा। शर्माती हुई कही “ए अजनबी क्या है तेरा अभिलाषा”।।
हृदय के गुहा में सघन था अंधेरा ज्ञान की ज्योति जलाकर मिटाया। लगते भैंस बराबर जो थे उसका सम्यक अक्षर बोध कराया।। मूढ़मति को निज कृपा दृष्टि से ज्ञान जगत में मान दिखाया। पिला के […]
मत आना मेरे मैयत में , अश्क समंदर बन जाएंगे । डर है क़यामत के ए नूरी, कब्र भी मुझे ताने ही देंगे।।
दिल भी मेरा, दिमाग भी मेरा आंसू भी मेरे, मुसकान भी मेरी बसेरा तेरा।
‘फ़िज़ाओं के बदलने का इंतज़ार किसको है, रुसवा शख्सियत हूँ मैं ऐतबार किसको है.. आज दर-बदर हूँ तो ये भी सोचता हूँ, चलो देखता हूँ मुझसे प्यार किसको है..’ – प्रयाग मायने : रुसवा – […]
यूँ रास्तों में कैसे बैठे हुए हो यौवन क्यों बाजुओं में माथा टेके हुए हो यौवन। क्या कोई ऐसा गम है या कोई ऐसी पीड़ा, जिसकी तपिश से इतने मुरझा गए हो यौवन। यह बात […]
प्रेम के सागर में अमृत रूपी गागर है माँ मेरे सपनों की सच्ची सौदागर है भूल कर अपनी सारी खुशियां हमको मुस्कुराहट भरा समंदर दे जाती है अगर ईश्वर कहीं है ,उसे देखा कहाँ किसने […]
मंजुषा से नैतिकता की शिक्षा ** ** ** ** ** ** ** सिर्फ जननी-जनक कहलाने के नहीं अधिकारी हम विवेकशील, कर्तव्यपरायण कहाते मनुजधारी हम है मनुज पशु नहीं, क्यूँ दिखाये अब लाचारी हम बच्चों को […]
रोया हूं बहुत चादर में मुंह छुपा कर के, लायक हूं ना लायक नहीं, जो मरा नहीं किसी के प्यार में, गले में रस्सी का फंदा लगा करके| वह छोड़ दी तो कोई बड़ी बात […]
बेदर्दो से मत आस लगाओ, कि तुम्हारे दर्द के मल्हन बनेंगे| पराए काम आ सकते हैं, वक्त पर अपने साथ छोड़ जाएंगे|
Thousand miles apart Thinking about the same love which we shared The time we spent together The places we went Still memories are fresh Hope to see you again No pain no regrets Living upon […]
आज बात तोह होती नहीं एक अहसास सा ढोये जा रहा हुँ शायद मेरे जनाज़े के साथ यह मिटेगा
जिस राह पर कदम बढ़ें बिंदास भाव से बढ़ें उत्साह हो सजा हुआ थकें न पग चले चलें। न देखना इधर उधर नजर रहे मुकाम पर, सदा बुलंद हौसला चले चलें सुकाम पर।
दिखावे का मायाजाल बड़ा भयंकर, जो फंस जाएं निकल ना पाए, फिर उचित ,अनुचित सब परे-सा, अलग-अलग हाथी के दन्तों -सा।
कौन कहता है कि बारिश थम गई नैन में अब भी घुमड़ते मेघ हैं, रो रहा आकाश शायद अब नहीं यूँ तड़पती बून्द परिचय दे रही। जिंदगी सुनसान सड़कों सी बनी लालसाएँ ढेर सारी शेष […]
जब तुम गेसूओं में गुलाब गूंथते थे। तब मेरे अरमान के फूल खिलते थे।।
गमगीन है हिन्दुस्तान ———————- प्रणवदा थे राजनीति का एक जीता-जागता, सजीव संस्थान निधन,राजनीति ही नहीं, जनता के लिए भी बङा नुकसान । गुणी, पढ़े लिखे, सादगी की थे जो जीती-जागती प्रतिमान इस दौर में ढूँढे […]
पत्थर पे लकीर, खींचने वाले। खुद को किया, तुझको हवाले।। संवार दे तू , या बर्बाद कर दे। जो भी दे, हंस हंस के दे।
साजिशें भी थीं, सामने गुनहगार भी थे। जवाब हमारे पास, तैयार भी थे। हम चुप रह कर सब सहते रहे, थोड़े नादान ही सही हम,मगर थोड़े समझदार भी थे।
विश्वास में विष भी है, और आस भी है। धोखा मिले या घात,ये तो अपने नसीब की बात है
आज धरा से मिला आकाश ,तो अच्छा लगा। नन्हीं – नन्हीं बूंदों से हरी हो गई घास ,तो अच्छा लगा। तल्ख़ हो जाए ,कुछ बातों से जब दिल, कोई दे जाए बातों की मिठास , […]
तेरी दुआओं को सलाम, तेरी वफाओं को सलाम। तेरे दर से जो आई, उन हवाओं को सलाम।
क्यों कुछ कहते नहीं, सब गूंगे बहरे बैठे हैं , सबके भीतर जलती है आग, फिर क्यों खामोश बैठे हैं, खो दिया है सम्मान को , अपने भीतर के इंसान को, तभी तो चुप ही […]
चलो छुपा कर रखते हैं, खुशियों के बीज , बो देंगे कभी; अगर गम बढ़ जाए, ज़रा हंस लेना तुम , और हम भी मुस्कुराएं
कितना चले !कितना रुके! , हम जिंदगी के सफर में , ये कोई नहीं पूछता , मगर लोग अक्सर पूछते हैं, मंजिल के कितने करीब हो!
हर शाम इतनी मीठी ना होती, अगर तुम ना होते , खुश तो होते हम, पर खुशनसीब ना होते, गुजारिश है बस इतनी तुमसे, इस मुस्कान को खोने मत देना, खुशनुमा किया है हृदय को, […]
प्रेम ऐसा शब्द है जो दिलों को जोड़ता है, प्रेम के पथ का पथिक सच्ची खुशी को भोगता है। प्रेम नफरत से बड़ा है, जिन्दगी का सार है यह, प्रेम बांटों प्रेम पाओ वेद का […]
संसार मे दुख-सुख लगे रहते हैं मत घबरा मनुज। जिंदगी से प्यार खुदकुशी मत कर मनुज। गम मिले जिस राह पर उस राह को तू त्याग दे, आस मत रख दूसरे से जी स्वयं के […]
कितनी व्यथा है तुम्हारी जो कम होने का नाम ही नही लेती, आंख मेरी नम कर जाती रोटी से शुरू हुई पलायन तक गई पर मौत पर जा कर रुकी तुम्हारी उदर-ज्वाला संग जंग आंख […]
ए हमजोली जरा बता तो सही कहाँ गए वो दिन । रह नहीं पाते थे कभी हम एक दूसरे के बिन।। वो कसमे वादे वो हसीन ख्यालों के मीठा ख्वाब। आज वक्त के साथ सभी […]
किसी भी आलोचक के लिए सबसे अहम उसका आलोचनात्मक विवेक होता है | इस गुण के बिना आलोचक कवि या काव्य की आत्मा में प्रवेश ही नहीं कर सकता है | आचार्य राम चन्द्र शुक्ल […]
क्यों निभा रहे हैं हम, इस झूठे रिश्ते को, जहां वो हमें अपना नहीं मानते, और हम उन्हें पराया नहीं।
थाम कर तुम्हारा हाथ , आज भी चलना चाहते हैं, चाहे दूरी कितनी भी हो, साथ निभाना चाहते हैं।
कुछ इस तरह चला; यू मोहब्बत का सिलसिला, ना तुमको इसका एहसास था, ना मुझको इसका गम, हम दोनों मसरूफ रहे, इसे बेवजह निभाने में।
नन्हे से बच्चे को जब सड़क पर चाय बेचते देखती हूं इक बहन सिसकती है मां रोती है मेरे अंदर
यह कहक़हा लगा कर , मुझे झुकाकर कहां चल दिए। मेरी धूमिल आंखों से ओझल होकर, सच को झूठ बनाकर कहां चल दिए। मैं थी बेकसूर, तुम कसूरवार, ठहरा कर कहां चल दिए। मैं मांगती […]
नारी तुम पर कविता लिखने को वर्णांका असफल है मेरी तुम तो जीवन की जननी हो सब कुछ तो तुम ही हो मेरी। माँ बनकर जन्म दिया मुझको यह सुन्दर सा संसार दिखाया, अच्छी-अच्छी शिक्षा […]
जाग उठ जा, अब पथिक पूरा सवेरा हो गया है, देख ले खिड़की से बाहर सब अंधेरा खो गया है। क्या पता क्या थी कशमकश नभ-धरा के बीच में रात भर का प्रेम रण वह […]
क्यूँ बारम्बार किया जाता महिलाओं के साथ घृणित अपराध, कयी तरह की वेदना-संताप से गुजरती,जिनसे होता बलात्कार । हर कानून बौना सावित, हर जायज कोशिश जा रही बेकार, थमता दिखता नहीं, दिन-प्रतिदिन बढ़ता ही जा […]
यह न समझो हम कभी रोये नहीं आसुंओं से चेहरा धोए नहीं। पी गए भीतर ही भीतर अश्रुजल बस दिखावे के लिए रोये नहीं।
ओढ़ लो छतरी भरी बरसात है, आंसुओं से भीग जाओगे कहीं। मेघ अब भी हैं घुमड़ते वक्ष पर इसलिए छतरी बिना आओ नहीं।
अंधेरा इतना भी नहीं था कि रोशनी में अपनी जगह बना सके, और रोशनी भी इतनी नहीं थी कि अंधेरे को मिटा सके,
तुम्हें तुम्हारी ताजगी मुबारक , मुझे सुखें पत्तों से प्यार है, तुम्हें नाज है अपनी खूबसूरती पर , मुझे तेरी सीरत से प्यार है, तू खुश है इस नएपन से, मुझे तेरी नादानी से प्यार […]
माँ तुम्हारे चरणों को धोता है हिन्द सागर। बनके किरीट सिर पे हिमवान है उजागर।। माँ….. गांवों में तू है बसती खेतों में तू है हँसती गंगा की निर्मल धारा अमृत की है गागर।। माँ…. […]
‘इस कदर गुज़रेंं हैं हम इश्क के दौर से, दिल धड़कता है यहाँ, सदा आती है कहीं और से..’ – प्रयाग मायने : सदा – आवाज़
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