दिया जब भी दिखाता हूँ मैं तुम सूरज दिखाती हो, निराशा में हमेशा हौसला मुझमें जगाती हो। बताओ ना कि इतना क्यों मुझे सम्मान देती हो, स्वयं की हर ख़ुशी को क्यों भला मुझ पर […]

मिटा देना मसल कर तू मेरी हस्ती को जूते से, चींटी हूँ नन्हीं सी क्या पता डंक मारूंगी। मेरे जीने का हक बस तू इसी चिन्ता में खा लेना कि चींटी हूँ जरा सी क्या […]

‘हाँ मैंने उसको रोका था, फिर भी वो चौखट लाँघ गई.. जैसे बस जागने वाले तक, हो इस मुर्गे की बाँग गई.. बाकी सब निष्फल सिद्ध हुआ, हम क्या थे वो कल सिद्ध हुआ.. उस […]

जहाँ संघर्ष दिखता है, वहां पर कूद जाता हूँ। यहीं पर हूँ गलत मैं लक्ष्य पाने जूझ जाता हूँ। हृदय है कोमल कवि कलम है सत्य लिखता हूँ, नए उत्साह का संचार हो नवगीत लिखता […]

महज़ ख़्वाब देखने से उसकी ताबीर नहीं होती ज़िन्दगी हादसों की मोहताज़ हुआ करती है .. बहुत कुछ दे कर, एक झटके में छीन लेती है कभी कभी बड़ी बेरहम हुआ करती है … नहीं […]

शिक्षक दिवस की हार्दिक बधाई | कविता- ज्ञान दाता | ज्ञान दाता विज्ञान दाता तुम ही हो | हे गुरु प्रकाश दाता मुक्ति दाता तुम ही हो | जीवन मे अंधेरा बहुत था तुमसे पहले| […]

सावन की रिमझिम बूंदों में, भीगे तुम भी, भीगे हम भी भीग गया है तन – मन सारा। नभ से मेघा जल बरसाते, धरती को हैं सरस बनाते गीले हैं आगे के रस्ते। अरे! अरे, […]

आज पकड़े गए तुम कन्ह। माखन चुराते हुए,’ माखन खाते हुए।। रोज़ खीजते हो तुम रोज़ सताते हो । नटखट बड़े हो तुम कान्हा.🌹……….।। हाथ नहीं आते हो माखन चुराते हो🌷। माखन खाते तो तुम […]

हास्य- कविता सत्य – नारायण जी की पूजा थी, शर्मा जी के धाम। गुप्ता जी भी पहुंच गए, छोड़ के सारे काम। आरती के समय सामने, जब थाली आई, डाला दस रुपए का फटा नोट, […]

मान हैं सम्मान हैं देश की जान हैं। आम नहीं खास नहीं राष्ट्र निर्माता हैं शिक्षक। नाक से नेटा टपक रहा था। आंसू का कतरा लुढक रहा था। बाहुपाश में भरकर जिसने अपनाया वो मेरे […]

मैं शिक्षक हूं वर्तमान का, मुझे बच्चों से डर लगता है, मजबूर-सा हूं पढ़ाने में, बेरोजगारी से डर लगता है। सम्मान-वम्मान जुति बराबर मगर लाचारी से डर लगता है, अध्यापन ही एक काम नहीं अतिरिक्त […]

गुरू की महिमा का मैं, कैसे करूं बखान । गुरू से ही तो किया है, ये सब अर्जित ज्ञान। ऐसा कोई कागज़ नहीं, जिसमे वो शब्द समाएं। ऐसी कोई स्याही नहीं, जिससे सारे गुरू – […]

गुरु अर्चना ,गुरु प्रार्थना ,गुरु जीवन का आलंबन है गुरु की महिमा ,गुरु की वाणी जैसे परमात्मा का वंदन है प्रेम का आधार गुरु है ,ज्ञान का विस्तार गुरु है भविष्य का निर्माण वही है […]

कितनी उधेड़बुन करती हूं, मैं इन धागों के साथ । जिसे जिंदगी कहते हैं , कभी गम की गांठ खोलती हूं। कभी खुशियों की गांठ बांधती हूं । बस लगी रहती हूं ,इसे सुलझाने में। […]

क्या उकेर देती , मैं इन कोरे पन्नों के ऊपर। अपने भीतर की वेदना या दूसरों की प्रेरणा । अनकही बातें या सुनी सुनाई बातें। नहीं जानती इसका अर्थ क्या होता । क्या उकेर देती, […]

‘उलझ पड़ें न कहीं हम, के इस ज़िन्दगी से, अपनी क्या बनेगी, आज तक बनी किसकी है.. इसलिए रखता हूँ हर आतिश को खुद में दफन, कहीं वो पूछ न बैठे कि आगज़नी किसकी है..’ […]

हृदय के गुहा में सघन था अंधेरा ज्ञान की ज्योति जलाकर मिटाया। लगते भैंस बराबर जो थे उसका सम्यक अक्षर बोध कराया।। मूढ़मति को निज कृपा दृष्टि से ज्ञान जगत में मान दिखाया। पिला के […]

‘फ़िज़ाओं के बदलने का इंतज़ार किसको है, रुसवा शख्सियत हूँ मैं ऐतबार किसको है.. आज दर-बदर हूँ तो ये भी सोचता हूँ, चलो देखता हूँ मुझसे प्यार किसको है..’ – प्रयाग मायने : रुसवा – […]

यूँ रास्तों में कैसे बैठे हुए हो यौवन क्यों बाजुओं में माथा टेके हुए हो यौवन। क्या कोई ऐसा गम है या कोई ऐसी पीड़ा, जिसकी तपिश से इतने मुरझा गए हो यौवन। यह बात […]

प्रेम के सागर में अमृत रूपी गागर है माँ मेरे सपनों की सच्ची सौदागर है भूल कर अपनी सारी खुशियां हमको मुस्कुराहट भरा समंदर दे जाती है अगर ईश्वर कहीं है ,उसे देखा कहाँ किसने […]

मंजुषा से नैतिकता की शिक्षा ** ** ** ** ** ** ** सिर्फ जननी-जनक कहलाने के नहीं अधिकारी हम विवेकशील, कर्तव्यपरायण कहाते मनुजधारी हम है मनुज पशु नहीं, क्यूँ दिखाये अब लाचारी हम बच्चों को […]

रोया हूं बहुत चादर में मुंह छुपा कर के, लायक हूं ना लायक नहीं, जो मरा नहीं किसी के प्यार में, गले में रस्सी का फंदा लगा करके| वह छोड़ दी तो कोई बड़ी बात […]

जिस राह पर कदम बढ़ें बिंदास भाव से बढ़ें उत्साह हो सजा हुआ थकें न पग चले चलें। न देखना इधर उधर नजर रहे मुकाम पर, सदा बुलंद हौसला चले चलें सुकाम पर।

कौन कहता है कि बारिश थम गई नैन में अब भी घुमड़ते मेघ हैं, रो रहा आकाश शायद अब नहीं यूँ तड़पती बून्द परिचय दे रही। जिंदगी सुनसान सड़कों सी बनी लालसाएँ ढेर सारी शेष […]

गमगीन है हिन्दुस्तान ———————- प्रणवदा थे राजनीति का एक जीता-जागता, सजीव संस्थान निधन,राजनीति ही नहीं, जनता के लिए भी बङा नुकसान । गुणी, पढ़े लिखे, सादगी की थे जो जीती-जागती प्रतिमान इस दौर में ढूँढे […]