Tag: संपादक की पसंद

संपादक की पसंद

  • जीभ महान्

    हिम्मत तो देखो ज़ुबान की, कैंची जैसी चलती है,
    बत्तीस दांतों घिरी होकर भी निडर हो मचलती है।
    बिना हड्डी की मांसल जीभ, कई कमाल करती है,
    फंसा दांत में तिनका, निकाल के ही दम भरती है।।

    दुनियां भर के स्वाद का, ठेका जुबां ने ही ले रखा,
    मजबूत दांतों के झुंड को गुलाम जुबां ने बना रखा।
    पहले चखती फिर कहती, ये खा और वो मत खा,
    बीमारी हो या चिढ़ाना, पहली हरकत जीभ दिखा।।

    द्रोपदी की जुबान ने ही, महाभारत करवाया था,
    अंधे का बेटा अंधा कह, दुर्योधन को भड़काया था।
    जुबां से निकला वचन, राजा दशरथ ने निभाया था,
    केकई को दिए वचन ने राम को वन भिजवाया था।।

    इस जीभ ने ही कईयों के सर और घर तुड़वा दिए,
    जीभ सम्भाल कर बात कर कईयों को लड़वा दिए।
    जीभ ने मानव से खतरनाक कारनामे करवा दिए,
    जीभकला से अनभिज्ञ जानवर बेजुबां कहला दिए।।

    हिम्मत तो देखो ज़ुबान की, कैंची जैसी चलती है,
    नेता, कवि और वक्ता को जुबां ही फेमस करती है
    याद करना होतो वाक्यों को कई कई बार रटती है,
    सदा सच बोलना और एक चुप सौ को हराती है।।

    राकेश सक्सेना, बून्दी, राजस्थान
    9928305806

  • लापरवाही – व्यंग्य

    लाख समझाने पर भी, गली-बाजार में भीड़ करें,
    बिना मास्क खुल्लमखुल्ला सबसे वार्तालाप करें।
    सेनेटाइजर का इस्तेमाल, हाथ धोना भी बंद करें,
    आओ साथी हम भी मरें, औरों का इंतजाम करें।।

    बार-बार हाथ धो कर, समय क्यों बर्बाद करें,
    हैंड सेनेटाइजर से हाथ, क्यों अपने खराब करें।
    मास्क पहनकर अपनी, सुन्दरता क्यों नष्ट करें,
    आओ साथी हम भी मरें, औरों का इंतजाम करें।।

    ज़ुखाम खांसी बुखार को, हम नज़रअंदाज़ करें,
    अपनी बीमारी छुपाकर, स्वस्थता का भ्रम करें।
    रिपोर्ट पोजेटिव हो तो, व्यवस्थाओं पे प्रहार करें,
    आओ साथी हम भी मरें, औरों का इंतजाम करें।।

    कोरोना कोई मजाक नहीं, हल्के में क्यों लेते हो,
    बिना मास्क घूम कर, दूसरों की मुसीबत बनते हो।
    नियम और निर्देशों का, भरपूर मज़ाक उड़ाते हो,
    अपनी लापरवाही की सज़ा, अपनों को ही देते हो।।

    मेरे इस व्यंग को बंधुवर, मज़ाक में मत उड़ा देना,
    जैसे भी हो कौशिश कर, नियम सभी अपना लेना।।
    मास्क पहन हाथ धो कर, सेनेटाइज भी कर लेना,
    अपने साथ अपनों परभी अहसान मात्र कर देना।।

  • राधे कृष्ण सा प्रेम धागा

    हवा में उड़ाओ पतंग,
    खुद को जमीं पे खड़ा रखो।

    दान धर्म करके बंधुवर,
    अपना दिल भी बड़ा रखो।

    घमण्ड रुपी पतंग कटवाकर,
    सपनों को बुलंद रखो।

    रंग-बिरंगी पतंगों जैसा ,
    परचम अपना लहराए रखो।

    धागे अनेक रंगों के,
    पकड़ मजबूत बनाए रखो।

    कच्चा हो या पक्का धागा,
    उलझने से बचाए रखो।

    प्रेम का धागा पक्का होता,
    उसपे विश्वास बनाए रखो।

    राधा-कृष्ण सा प्रेम धागा,
    दिल में सदा संजोए रखो।

    घर, परिवार, यार, दोस्त
    सबको धागे से बांधे रखो।।

  • बम लहरी, बम बम लहरी

    बम लहरी, बम बम लहरी

    (शिव महोत्सव विशेष)

    शिव शम्भू जटाधारी, इसमें रही क्या मर्जी थारी,
    सर पे जटाएं, जटा में गंगा, हाथ रहे त्रिशूलधारी।
    गले से लिपटे नाग प्रभू, लगते हैं भारी विषधारी,
    असाधारण वेश बना रखा, क्या रही मर्जी थारी।।

    भुत-प्रेत, चांडाल चौकड़ी, करते सदा पूजा थारी,
    राक्षस गुलामी करते सारे, चमत्कारी शक्ति थारी।
    शिवतांडव, नटराज नृत्यकला नहीं बराबरी थारी,
    मस्तक त्रिनेत्र खुले तो प्रभू, हो जाए प्रलय भारी।।

    ब्रह्मा विष्णु देवी देवता भी अर्चना करते हैं थारी,
    पुत्र गणेश प्रथम देवता, पार्वती मां पत्नी थारी।
    हे शिव शंकर बम लहरी प्रजा पीड़ित क्यों थारी,
    बम लहरी बम बम लहरी, बड़ी कृपा होगी थारी।।

    विनती सुनो हे कालजय तीनों लोक है जय थारी,
    कोरोना बाढ़ भूकंप प्रलय से, रक्षा करो थे म्हारी।
    भ्रष्टाचार, महंगाई से भी पीड़ित जन प्रजा थारी,
    भू-मण्डल सुरक्षित कर दो प्रभू कृपा होगी थारी।।

    शिव शम्भू, जय जटाधारी, कृपा होगी थारी भारी,
    शिवरात्री तिलक भोग लगावें बलिहारी प्रजा सारी।
    भक्त के वश में भगवन् सारे, फिर कैसी मर्जी थारी,
    कृपा करो हे दीना नाथ, विनती करे सब नर नारी।।

    राकेश सक्सेना, बून्दी, राजस्थान

  • पाँव फिर से जी उठे हैं

    जब मिलीं दो युगल आँखें
    अधर पर मुस्कान धर के।
    गा उठे टूटे हृदय के
    भ्रमर मधुरिम तान भर के।

    सर झुकाकर दासता
    स्वीकार की अधिपत्य ने।
    गर्मजोशी जब परोसी
    अतिथि को आतिथ्य ने।

    यूँ लगा रूखे शहर में
    गाँव फिर से जी उठे हैं।
    🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺

    किंशुकों की कल्पना में
    कंटकों से घिर चुके थे।
    पत्थरों की ठोकरों से
    लड़खड़ाकर गिर चुके थे।

    सोंचकर छिलने की पीड़ा घाव
    डरने से लगे थे।
    फिर सफर के प्रबल आशा भाव
    मरने से लगे थे।

    तुम बने आलम्ब जब से
    पाँव फिर से जी उठे हैं।
    🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹

    लब्धि का प्रारब्ध के संग
    द्वन्द्व जब पर्याप्त देखा।
    एक मरुथल मित्रता के
    चक्षुओं में व्याप्त देखा।

    मरुथलों के ढेर दिखते
    रहे हर सम्बन्ध में।
    तब कहीं तुम आ मिले
    सम्बन्ध के अनुबंध में।

    मरुथलों में आश्रयों के
    ठांव फिर से जी उठे हैं।।
    🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹

    प्रीत पर सर्वस्व बरबस
    वार बैठे हैं।
    प्रीत की नव रीत पर हिय
    हार बैठे हैं।

    हारकर हिय प्रिय स्वजन की
    जीत यों साकार की है।
    जीत कर भी प्रीत हित में
    हार भी स्वीकार की है।

    हार में भी जीत वाले
    दाँव फिर से जी उठे हैं

    -संजय नारायण

  • मुस्कुराना

    मुस्कुरा कर बोलना,
    इन्सानियत का जेवर है।
    यूं तेवर न दिखलाया करो,
    हम करते रहते हैं इंतज़ार आपका,
    यू इंतजार न करवाया करो।
    माना गुस्से में लगते हो,
    बहुत ख़ूबसूरत तुम
    पर हर समय गुस्से में न आया करो।
    बिन खता के ही खतावार से रहते हैं हम,
    यूं न हमें डराया करो।
    एक दिन छोड़ देंगे हम ये जहां,
    फिर ढूंढोगे तुम हमें कहां।
    तो मुस्कुराओ जी खोलकर,
    कह दो जो कहना है बोलकर।
    हमको यूं न सताया करो,
    मुस्कुराना इन्सानियत का जेवर है।
    यूं तेवर न दिखलाया करो।।
    ____✍️गीता

  • वह बेटी बन कर आई है

    एक युवती बन कर बेटी,
    मेरे घर आई है।
    अपने खेल खिलौने माँ के घर छोड़कर,
    हाथों में लगाकर मेहंदी
    और लाल चुनर ओढ़ कर
    मेरे घर आई है।
    छम छम घूमा करती होगी,
    माँ के घर छोटी गुड़िया सी
    झांझर झनकाकर, चूड़ियां खनका कर,
    मेरे घर आई है।
    बेटी बन चहका करती थी,
    बहू बन मेरा घर महकाने आई है।
    एक युवती बन कर बेटी,
    मेरे घर आई है।
    अपनी किताबें वहीं छोड़कर,
    उन किताबों को भीतर समाए
    मेरे पुत्र के नाम का
    सिन्दूर माँग में सजाए,
    वह बेटी से माँ का सफर
    तय करने आई है।
    एक युवती बन कर बेटी,
    मेरे घर आई है।
    हर दिवाली पर,
    जो सजाती थी माँ का घर,
    अब रौनक बन कर
    मेरे घर रंगोली बनाने आई है
    मेरे घर को अपना बनाने आई है।
    एक युवती बन कर बेटी,
    मेरे घर आई है।।
    ____✍️गीता

  • चिंता से चिता तक

    मां बाप को बच्चों के भविष्य की चिन्ता,
    महंगे से स्कूल में एडमिशन की चिन्ता।
    स्कूल के साथ कोचिंग, ट्यूशन की चिन्ता,
    शहर से बाहर हाॅस्टल में भर्ती की चिन्ता।।

    जेईई, नीट, रीट कम्पीटीशन की चिन्ता,
    सरकारी, विदेशी कं. में नौकरी की चिन्ता।
    राजशाही स्तर का विवाह करने की चिंता,
    विवाह पश्चात विदेश में बस जाने की चिंता।।

    फर्ज निभाकर अब कर्ज चुकाने की चिंता,
    बुढ़ापे तक कोल्हू में फंसे रहने की चिंता।
    बच्चों के होते अकेले पड़ जाने की चिंता,
    मरने तक बच्चों के वापिस आने की चिंता।।

    बस यही चक्र, जीवन है, यही कड़वा सच है,
    बीज पौधा पेड़ फल, फल ही पेड़ का कल है।
    लीक के फकीर बन, कठपुतली से हो जाते हैं,
    न जाने क्यों चमक के पीछे, दीवाने हो जाते हैं।।

  • उदास खिलौना : बाल कबिता

    मेरी गुड़िया रानी आखिर
    क्यों बैठी है गुमसुम होकर।
    हो उदास ये पूछ रहे हैं
    तेरे खिलौने कुछ कुछ रोकर।।
    कुछ खाओ और मुझे खिलाओ
    ‘चंदा मामा….’ गा-गाकर।
    तुम गाओ मैं नाचूँ संग- संग
    डम -डम ड्रम बजाकर ।।
    वश मुन्नी तू इतना कर दे।
    चल मुझ में चाभी भर दे।।
    देख उदासी तेरा ‘विनयचंद ‘
    रहा उदास खिलौना होकर।
    मेरी गुड़िया रानी आखिर
    क्यों बैठी है गुमसुम होकर।।

  • भोजपुरी गीत – बड़ा प्यार आवेला |

    भोजपुरी गीत – बड़ा प्यार आवेला |
    हमके त यार याद तू हर बार आवेला |
    काहे हमके त तोहरे पर बड़ा प्यार आवेला |
    मिलना होई की ना हमके कुछउ ना पता |
    हमार जान हऊ मत करिहा तू हमसे खता |
    प्यार बा तोहरे दिल मे इ बस सवाल आवेला |
    हमके त यार याद तू हर बार आवेला |
    उजड़ल दिल के कब सजईबु बतावा हमके |
    बन के फूल कब महकइबु सुनावा हमके |
    तोहरा अईले से उजड़ल बाग मे बहार आवेला |
    हमके त यार याद तू हर बार आवेला |
    हंसेलु त जईसे मुहवा तोहरे मोती झरी जाला |
    देखी मुस्कान दिलवा हमरे बिजुरी गिरि जाला |
    आवा बहार बनके सुनी जिनगी ई विचार आवेला |
    हमके त यार याद तू हर बार आवेला |
    मुहवा तोहार टुकड़ा चान जस लगेला अंजोर |
    उठेला पलक आँख तोहार सांझ लगेला भोर |
    सिवा तोहरे ना केवनों अब दिलदार भावेला |
    हमके त यार याद तू हर बार आवेला |

    श्याम कुँवर भारती (राजभर )
    कवि /लेखक /गीतकार /समाजसेवी
    बोकारो, झारखंड,मोब- 9955509286

  • लालच वृद्धि करता प्रति पल

    जंगल का दोहन कर डाला,
    इन्सान तेरे लालच ने।
    कुदरत के बनाए पशु-पक्षी भी ना छोड़े,
    इन्सान तेरे लालच ने।
    हाथी के दांत तोड़े,
    मयूर के पंख न छोड़े
    मासूम से खरगोश की
    नर्म खाल भी नोच डाली,
    इन्सान तेरे लालच ने।
    चंद खनकते सिक्कों की खातिर,
    यह क्या जुल्म कर डाला।
    सृष्टि की सुंदरता का अंत ही कर डाला
    इन्सान तेरे लालच ने।
    कितना भी मिल जाए फिर भी,
    लालच वृद्धि करता प्रति पल।
    सुंदर पक्षी ना शुद्ध पवन
    कैसा होगा अपना कल।
    लगा लगाम लालच पर अपने
    सोच यही होगा इसका फ़ल।।
    ____✍️गीता

  • जाने तुम कहां गये

    अरमानों से सींच बगिया,
    जाने तुम कहां गए।
    अंगुली पकड़ चलना सीखाकर,
    जाने तुम कहां गए।।

    सच्चाई के पथ हमको चलाकर,
    जाने तुम कहां गए।
    हमारे दिलों में घर बनाकर,
    जाने तुम कहां गए।।

    तुम क्या जानो क्या क्या बीती,
    तुम्हारे बनाए उसूलों पर।।

    वृद्धाश्रम में मां को छोड़ा,
    बेमेल विवाह मेरा कराया।
    छोटे की पढ़ाई छुड़ाकर,
    फैक्ट्री का मजदूर बनाया।।

    पुश्तेनी अपना मकान बेच,
    अपना बंगला बना लिया।
    किस्मत हमारी फूटी निकली,
    आपको काल ने ग्रास बना लिया।।

    बंधी झाड़ू गई बिखर बिखर,
    ना जाने तुम कहां गये।
    यूं मझधार में छोड़ बाबूजी,
    ना जाने तुम कहां गये।।

    राकेश सक्सेना, बून्दी, राजस्थान

  • वह एक मज़दूर है

    भवन बनाए आलीशान,
    फ़िर भी उसके रहने को
    नहीं है उसका एक मकान।
    झोपड़पट्टी में रहने को मजबूर है
    हाँ, वह एक मज़दूर है।
    मेहनत करता है दिन रात,
    फ़िर भी खाली उसके हाथ।
    रूखी- सूखी खाकर वह तो,
    रोज काम पर जाता है।
    किसी और का सदन बनाता,
    निज घर से वह दूर है,
    हाँ, वह एक मज़दूर है।
    सर्दी गर्मी या बरसात,
    चलते रहते उसके हाथ।
    जीवन उसका बहुत कठिन है,
    कहता है किस्मत उसकी क्रूर है।
    हाँ, वह एक मज़दूर है।।
    _____✍️गीता

  • कविता : समय का पहिया

    मानो तो मोती ,अनमोल है समय
    नहीं तो मिट्टी के मोल है समय
    कभी पाषाण सी कठोरता सा है समय
    कभी एकान्त नीरसता सा है समय
    समय किसी को नहीं छोड़ता
    किसी के आंसुओं से नहीं पिघलता
    समय का पहिया चलता है
    चरैवेति क्रम कहता है
    स्वर्ण महल में रहने वाले
    तेरा मरघट से नाता है
    सारे ठौर ठिकाने तजकर
    मानव इसी ठिकाने आता है ||
    भूले से ऐसा ना करना
    अपनी नजर में गिर जाए पड़ना
    ये जग सारा बंदी खाना
    जीव यहाँ आता जाता है
    विषय ,विलास ,भोग वैभव सब देकर
    खूब वो छला जाता है
    समय का पहिया चलता है
    चरैवेति क्रम कहता है
    जग के खेल खिलाने वाले को
    मूरख तू खेल दिखाता है ||
    कर्म बिना सफल जनम नहीं है
    रौंदे इंसा को वो धरम नहीं है
    दिलों को नहीं है पढ़ने वाले
    जटिलताओं का अब दलदल है
    भाग दौड़ में जीवन काटा
    जोड़ा कितना नाता है
    अन्तिम साथ चिता जलने को
    कोई नहीं आता है
    समय का पहिया चलता है
    चरैवेति क्रम कहता है
    मानवता को तज कर मानव
    खोटे सिक्कों में बिक जाता है ||

  • चला चली का मेला

    आखिर इक दिन सबको जाना है

    यह जग चला चली का मेला है
    यहाँ किसी का नही ठिकाना है
    फिर किस बात का घबराना है
    बस इतना सा हमारा अफ़साना है
    आख़िर इक दिन सबको जाना है

    ना कुछ संग आया था,ना जाना है
    कर्मो ने ही अपना फर्ज निभाना है
    पाप पुण्य की गठरी बांध उड़ जाना है
    पांच तत्व की काया को मिट्टी हो जाना है
    आखिर इक दिन सबको जाना है

    आत्मा को आवागमन से मुक्त कर क्षितिज पार जाना है
    कुछ प्रतीक्षारत तारों को एक बार गले लगाना है
    फिर मोह माया की डोर तोड़ रूहानी यात्रा पर जाना है
    आत्मा को परमात्मा में विलीन हो जाना है
    आखिर इक दिन सबको जाना है।

  • सोंच अलग है

    सोंच अलग है
    याददाश्त विलग है
    अपनी चाहतों के लिए
    वो आज हमसे अलग हैं

    लाखों जमा कर दोस्तों ने
    सारी उम्र की कमाई गवांई
    शहर की छोटी जमी के लिए
    वहीं पे सारी सुविधाएं जुटाई
    सिसकती रही गांव भूमि बेचारी
    जिन संसाधनों से जिंदगी बनाई

    कुछ ने बहुत सी फसलें उगाई
    जमीनें भी ली और बहुत सारी
    वहीं जहां की खुशबू ने पढ़ाई
    उन्हें शहर मंजिलो में पहुंचाई
    करनी पड़ेगी उनकी पर बड़ाई
    बचपन ने उन्हें यहीं खींच लाई

    आकर्षण के तार को तोड़कर
    गांव के स्नेह को यूं छोड़कर
    आशीर्वादों से कैसे मुंह मोड़कर
    पूर्वजों की धरोहर को तजकर
    नया आशियाना बनाते हैं दोस्त
    कहां से हिम्मत जुटाते हैं दोस्त

    अपनेपन की कमी से शायद
    बसें है जा इतनी दूर कहीं
    कैद हो गये सुविधा सुरक्षा में
    शहर की चकाचौंध भाया सही
    गांव आज भी रह गया है वहीं
    नई सोंच वहां कहां पहुंच सकी

    सोंच अलग है
    याददाश्त विलग है
    अपनी चाहतों के लिए
    वो आज हमसे अलग

  • वजूद

    लफ़्ज़ों की कमी थी आज शायद
    या रूह में होने वाले एहसास की
    💐💐💐💐💐💐💐💐
    नही पता मुझको कहानी तेरी शायद
    बस इतना जानती हूं कि वजूद को तेरे

    💐💐💐💐💐💐💐💐
    तूझसे ज्यादा जानती हूं शायद
    ख्वाबबगाह में जो बसता है वो
    💐💐💐💐💐💐💐💐💐
    अलग सी खुमारी और कशिश शायद
    मेरे रोम रोम में बसी है जो
    💐💐💐💐💐💐
    कैसे बताऊं तुमको क्या रूमानी एहसास है वो
    कैसे यकीं दिलाऊं कितना रूमानी है वो
    💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐
    बिन फरेब कितना मासूम है वो
    किसी ख्वाबगाह का सरताज हो शायद

  • एक अजन्मी की दास्तान

    सुन्दर सपने देख रही थी,
    अपनी माँ की कोख में।
    मात-पिता का प्यार मिलेगा,
    भाई का भी स्नेह मिलेगा
    यह सब सुख से सोच रही थी,
    सहसा समझ में आया कि
    एक कैंची मुझको नोंच रही थी।
    क्यों कैंची से कटवाया,
    मुझको मेरी माँ की कोख में।
    पूछ रही है एक अजन्मी,
    एक सवाल समाज से।
    मैं भी ईश्वर का तोहफा थी,
    क्यों मेरे जीवन का अपमान किया।
    तुम्हें एक वरदान मिला था,
    क्यों ना उसका सम्मान किया।
    अगर मैं जीवित रहती तो,
    प्रेम से घर-आंगन महका देती।
    तुम कभी दुखी होते तो माँ,पापा,
    अपनी सरल सरस बातों से,
    तुम्हारा जीवन चहका देती।
    कुछ मैडल मैं भी ले आती,
    चंद प्रमाण पत्र भी लाती मैं,
    इस दुनिया में मात-पिता,
    तुम्हारा नाम रौशन कर जाती मैं।
    अफ़सोस मगर यह ना हो पाया,
    क्यों मेरा आना ना भाया।
    यह जान कभी ना पाऊंगी,
    अलविदा! अभी जाती हूं मैं..
    लेकिन किसी समझदार
    और सौभाग्य वालों के माध्यम से,
    मैं लौट कर वापिस आऊंगी।।
    _____✍️गीता

  • माँ

    अपनी माँ को छोड़ कर,
    वृद्धाश्रम के द्वार पर।
    जैसे ही वो बेटा अपनी कार में आया,
    माँ के कपड़ों का थैला,
    उसने वहीं पर पाया।
    कुछ सोचकर थैला उठाकर,
    वृद्धाश्रम के द्वार पर आया।
    बूढ़ा दरबान देख कर बोला,
    अब क्या लेने आए हो
    वह बोला बस यह माँ का,
    थैला देने आया हूं।
    दरबान ने फ़िर जो कहा उसे,
    सुन कर वह सह नहीं पाया,
    धरा निकली थी पैर तले से
    खड़ा भी रह नहीं पाया।
    वह रोता जाता था,
    भीतर बढ़ता जाता था
    मां सब मेरी ही गलती है,
    मन ही मन दोहराता था।
    दरबान ने उसे जो बताया,
    सुन कर उसका अस्तित्व हिला..
    चालीस वर्ष पूर्व बेटा तू
    मैडम को यहीं मिला।
    6-7 माह का एक बच्चा,
    सड़क किनारे रोता था।
    उनसे नहीं कोई तुम्हारा नाता है,
    वो जन्म देने वाली नहीं,
    बस पालने वाली माता है।
    जिसको यहां से उठाकर ले गई,
    वह छोड़ उसे फ़िर यहीं जाता है।
    तू ही जाने यह कैसा तेरा खेल विधाता है।
    वो करती हैं काम यहां,
    उनके जीवन में आराम कहां।
    जिसको दिया सहारा कभी,
    पढ़ा-लिखा कर बड़ा किया।
    वह आज सारे नाते तोड़कर,
    उसे बेसहारा छोड़ गया।
    फ़िर उस बेटे को अफसोस हुआ,
    आंखों से अश्रु-धार न थमती थी,
    जिसने मेरी उंगली थामी,
    मैं उसका हाथ छोड़ चला था,
    आह! मैं क्या करने चला था।
    वापिस जाकर माँ को लाया,
    माँ ने उसको गले लगाया।
    माँग कर माफी अपने कृत्य की,
    तब जाकर उसने चैन पाया।।
    ____✍️गीता

  • किसानों का किया है इन्हीं ने तो बुरा हाल

    आतंकियों के ठिकाने बदल रहे हैं
    शिकारियों के पैमाने बदल रहें हैं
    छिप-छिप के करते थे कभी ठगी जो
    लालच के उनके आशियाने बदल रहे हैं

    भोले-भाले को ठगना ही जिनका काम
    चींटियों की तरह बांबियां बनायी सरेआम
    सब का ही कर रखा है देखो रास्ता जाम
    इतने निष्ठुर तो नहीं कहीं होते हैं किसान

    बेईमानों की प्रत्यक्ष है पहली बार मंडली
    लूट का पता बता रही हैं तन जमी चर्बी
    नहीं है ये हितकारी न ही कोई किसान
    फुटपाथ पे ले आई इन्हें इनकी खुदगर्जी

    किसानों का किया है इन्हीं ने तो बुरा हाल
    उनके हक को खा-खा करने आये हलाल
    टिड्डियों की तरह छाये हैं जहां भी मंडी
    फसल वाले परेशान ऐसे जैसे करते थे फिरंगी

    आश्चर्य है कि दिल्ली अब तक है सहनशील
    उन्हें नहीं दिखा क्या रूप इनका अश्लील
    ये हैं सभी के दुश्मन सभी के ही विरोधी
    पर निकले चींटियों के तो शहर की ओर हो ली

  • मैं-मैं व तूं तूं

    सारे व्यापार को तेरा आधार
    संबंधों में भी तुझसे ही है प्यार
    तुझमें ही सब और सबमें प्रकट तूं
    फिर भी सब में क्यूं भरा मैं मैं व तूं तूं

    पल पल के मीत जाते बीत
    प्यार सच्चा पर अंतराल का गीत
    नीरस जीवन में लाता मधुरता संगीत
    प्रियतम तेरे आशीष संबंध सुख पाते जीत

    तुझसे ही बने हैं सारे रूप
    नेह आगार भरे कितने अनूप
    सुंदर जो थे कैसे बन जाते कुरूप
    प्रभु तुझसे ही तो सब की छांव धूप

    अंत तुम्हीं तुझमें विश्राम
    तुझमें रमन कर होते शाम
    तुझसे ही सफल तो सारे काम
    करूणानिधि तुझसे ही मिले हर बिहान

  • बेटी

    गांव गांव में मारी जाती, बेटी मां की कोख की,
    बेटी मां की कोख की, बेटी मां की कोख की।।

    जूही बेटी, चंपा बेटी, चन्द्रमा तक पहुंच गई,
    मत मारो बेटी को, जो गोल्ड मेडलिस्ट हो गई,
    बेटी ममता, बेटी सीता, देवी है वो प्यार की।
    बेटी बिन घर सूना सूना, प्यारी है संसार की,
    गांव गांव में मारी जाती, बेटी मां की कोख की।।

    देवी लक्ष्मी, मां भगवती, बहन कस्तूरबा गांधी थी,
    धूप छांव सी लगती बेटी, दुश्मन तूने जानी थी।
    कल्पना चावला, मदरटेरेसा इंदिरागांधी भी नारी थी,
    खूब लड़ी मर्दानी वो तो, झांसी वाली रानी थी,
    गांव गांव में मारी जाती, बेटी मां की कोख की।।

    पछतावे क्यूं काकी कमली, किया धरा सब तेरा से,
    बेटा कुंवारा रह गया तेरा, करमों का ही फोड़ा है।
    गांव शहर, नर नारी सुनलो, बेटा बेटी एक समान,
    मत मारो तुम बेटी को, बेटी तो है फूल बागान।।

    (मेरे द्वारा लिखित नाटक “भ्रूण हत्या” का गीत)
    राकेश सक्सेना

  • सागर और सरिता

    सागर ने सरिता से पूछा,
    क्यों भाग-भाग कर आती हो।
    कितने जंगल वन-उपवन,
    तुम लांघ-लांघ कर आती हो।
    बस केवल खारा पानी हूं,
    तुमको भी खारा कर दूं।
    मीठे जल की तुम
    मीठी सी सरिता,
    क्यों लहराती आती हो।
    नि:शब्द हो उठी सरिता,
    उत्तर ना था उसके पास,
    बोली तुम हो कुछ ख़ास।
    ऐसा हुआ मुझे आभास,
    विशाल ह्रदय है तुम्हारा।
    फैली हैं दोनों बाहें
    देख, हृदय हर्षित होता है।
    आ जाती हूं पार कर के,
    कठिन कंटीली राहें।।
    ____✍️गीता

  • ‘‘फितरत’’

    हे मानव तेरी फितरत निराली, उलट पुलट सब करता है,
    बंद कमरे में वीडियो बनाकर, जगजाहिर क्यों करता है?

    शादी पार्टी में खाना खाकर, भरपेट झकास हो जाता है,
    बाहर आकर उसी खाने की, कमियां सबको गिनाता है

    जिस मां की छाती से दूध खींच, बालपन में तू पीता है
    उसी मां को आश्रम में भेजकर, चैन से कैसे तू जीता है

    बचपन में तू जिद्द करके अपनी, हर बात मनवाता है
    बुढ़े माॅ-बाप की हर इच्छा को, दरकिनार कर जाता है

    मां, बहन, बेटी और भाभी की, रक्षा का दम तू भरता है,
    ये सब अगर दूसरे की हों तो, नीयत बुरी क्यों करता है?

    दवा, दारु, बड़े शौ-रुम में, मुंहमांगा दाम चुकाता है
    रिक्षा, सब्जी, ठेलेवालों से भाव-तौल क्यूं करता है

    कमियां गिनाकर इलेक्शन में, सबको खूब भड़काता हैं
    जीता तो सत्ता में आकर, तू सभी समस्या झुठलाता हैं

    पक्ष-विपक्ष के मकड़जाल में, कार्यकर्ताओं को उलझाता हैं
    शादी-पार्टी में विरोधियों संग, जमकर जाम उड़ाता हैं

    दूर दराज के नामी मंदिरों में, जेवर और धन भिजवाता है
    पड़ोस की गरीब बेटी की शादी में, रुपया भी नहीं चढ़ाता है

    हे मानव दो-दो चेहरों से क्यूं, बहुरुपिया जीवन जीता है
    सीधी सादी-सी जिन्दगी में, सब उलट पुलट क्युं करता है

  • भटके हुए रंगों की होली

    आज होली जल रही है मानवता के ढेर में।
    जनमानस भी भड़क रहा नासमझी के फेर में,
    हरे लाल पीले की अनजानी सी दौड़ है।
    देश के प्यारे रंगों में न जाने कैसी होड़ है।।

    रंगों में ही भंग मिली है नशा सभी को हो रहा।
    हंसी खुशी की होली में अपना अपनों को खो रहा,
    नशे नशे के नशे में रंगों का खून हो रहा।
    इसी नशे के नशे में भाईपना भी खो रहा।।

    रंग, रंग का ही दुश्मन ना जाने कब हो गया।
    सबका मालिक ऊपरवाला देख नादानी रो गया,
    कैसे बेरंग महफिल में रंगीन होली मनाएंगे।
    कैसे सब मिलबांट कर बुराई की होली जलाऐंगे।।

    देश के प्यारे रंगों से अपील विनम्र मैं करता हूँ।
    धरती के प्यारे रंगों को प्रणाम झुक झुक करता हूँ
    अफवाहों, बहकावों से रंगों को ना बदनाम करो,
    जिसने बनाई दुनियां रंगों की उसका तुम सम्मान करो।।

    हरा, लाल, पीला, केसरिया रंगों की अपनी पहचान है।
    इन्द्रधनुषी रंगों सा भारत देश महान है,
    मुबारक होली, हैप्पी होली, रंगों का त्यौहार है।
    अपनी होली सबकी होली, अपनों का प्यार है।।

    हैप्पी होली

  • भोजपुरी पारंपरिक होली गीत – ये किसन कन्हईया |

    भोजपुरी पारंपरिक होली गीत – ये किसन कन्हईया |
    होली मे करेला काहे बलजोरिया
    ये किसन कन्हईया |
    चुनरिया रंग देला मारी पिचकरिया
    ये किसन कन्हईया |
    केतनो लुकाई जहवा भाग जाई |
    खोजी हरदम हमके रंगवा लगाई |
    मनबा ना त कहब यशोदा मईया |
    ये किसन कन्हइया |
    जब हम जाई यमुना किनरवा |
    लुकाई भिंगाई देला मोर अंचरवा |
    छोड़ेना ना हमके केवनों ठहियां |
    ये किसन कन्हइया |
    गोरे गाल रंग देला कइसन ढंग बा |
    छूटे नाही कबों श्याम अइसन रंग बा |
    मुसकाई मरोड़ देला कोमल कलईया |
    ये किसन कन्हइया |
    मीठी फुसलाई बुलावेला ठीक नईखे आदत |
    फोड़ी मटकी भिंगावेला बिना हमरे इजाजत |
    बिना रंगवा रंगईली राधा श्याम रंग देहिया |
    ये किसन कन्हइया |
    श्याम कुँवर भारती (राजभर )
    कवि /लेखक /गीतकार /समाजसेवी
    बोकारो, झारखंड,मोब- 9955509286

  • बसन्त का आगमन

    हवाओं ने मौसम का,
    रूख़ बदल डाला।
    बसन्त के आगमन का,
    हाल सुना डाला।
    नवल हरित पर्ण
    झूम-झूम लहराए।
    रंग-बिरंगे फूलों ने,
    वन-उपवन महकाए।
    बेला जूही गुलाब की,
    सुगंधि से हृदय हर्षित हुआ जाए।
    कोमल-कोमल नव पर्ण,
    अपने आगमन से
    जीवन में ख़ुशहाली का,
    सुखद संदेशा लाए।
    बीता अब पतझड़ का मौसम,
    हृदय प्रफुल्लित हुआ जाए।।
    _____✍️गीता

  • पारिजात के फूल

    पारिजात के फूल झरे,
    तन-मन पाए आराम वहां।
    स्वर्ग से सीधे आए धरा पर,
    ऐसी मोहक सुगंधि और कहां।
    छोटी सी नारंगी डंडी,
    पंच पंखुड़ी श्वेत रंग की।
    सूर्य-किरण के प्रथम स्पर्श से,
    आलिंगन करते वसुधा का।
    वसुधा पर आ जाती बहार,
    इतने सुन्दर हैं हरसिंगार।
    रात की रानी भी इनका नाम,
    ये औषधीय गुणों की खान।
    श्री हरि व लक्ष्मी पूजन में होते अर्पण,
    इनकी सुगन्ध सौभाग्य का दर्पण।
    कितनी कोमल कितनी सुंदर,
    इन फूलों की कान्ति है।
    इन के सानिध्य में आकर बैठो,
    महसूस करो कितनी शान्ति है।
    ____✍️गीता

  • वचन

    जब कभी भी टूटे ये तंद्रा तुम्हारी,
    जब लगे कि हैं तुम्हारे हाथ खाली!

    जब न सूझे ज़िन्दगी में राह तुमको,
    जब लगे कि छलते आये हो स्वयं को!

    जब भरोसा उठने लगे संसार से ,
    जब मिलें दुत्कार हर एक द्वार से!

    जग करे परिहास और कीचड़ उछाले,
    व्यंग्य के जब बाण सम्भले न सम्भाले!

    ईश्वर करे जब अनसुना तुम्हारे रुदन को,
    जब लगे वो बैठा है मूंदे नयन को!

    न बिखरना, न किसी को दोष देना,
    मेरे दामन में स्वयं को सौंप देना..!!

    अपने नयनों में प्रणय के दीप बाले,
    मैं मिलूँगी तब भी तुम्हें बाहें पसारे!!

    ©अनु उर्मिल’अनुवाद’

  • सूर्य कांत त्रिपाठी निराला

    “बदली जो उनकी आंखें
    इरादा बदल गया।
    गुल जैसे चमचमाया कि,
    बुलबुल मसल गया।
    यह कहने से हवा की
    छेड़छाड़ थी मगर
    खिलकर सुगंध से किसी का,
    दिल बहल गया।”
    सूर्यकांत त्रिपाठी निराला जी की,
    “बदली जो उनकी आंखें”
    से ली गई चंद पंक्तियां
    निराला जी की जन्म
    २१ फरवरी १८९६ को,
    हुआ मिदनापुर बंगाल में।
    हाथ जोड़ शत्-शत् नमन है उनको,
    २०२१वें साल में।
    पिता,पंडित राम सहाय त्रिपाठी,
    माता का नाम था रुक्मिणी।
    एक पुत्री का नाम सरोज था,
    १८वें साल में उनकी मृत्यु हुई।
    उनकी याद में लिखी थी कविता,
    नाम था सरोज स्मृति।
    बहुत उच्च-कोटि के कवि रहे,
    नाम उनका अमर रहे।
    इन महान कवि को,
    कोटिश नमन है मेरा
    प्रणाम करूं मै हाथ जोड़
    इनकी कविताओं से,
    आया था एक नया सवेरा।
    _____✍️गीता

  • मेरा मन

    किसी की सिसकियां सुनती थी अक्सर,
    कोई दिखाई ना देता था।
    देखा करती थी इधर-उधर,
    व्याकुल हो उठती थी मैं,
    लगता था थोड़ा सा डर।
    एक दिन मेरा मन मुझसे बोला..
    पहचान मुझे मैं ही रोता हूं,
    अक्सर तेरे नयन भिगोता हूं।
    मासूमों पर अत्याचार,
    बुजुर्गों को दुत्कार,
    वृद्धाश्रमों में बढ़ती भीड़,
    नारियों की पीड़,
    इन्हीं से दिल दुखी है
    दुनिया में क्यों हो रहा है यह व्यवहार।
    कब समाप्त होगा यह अत्याचार,
    बस यही सोच-सोच कर हो जाता हूं दुखी,
    कब तक होगा यह जग सुखी।।
    ____✍️गीता

  • शब्द-चित्र

    कहती है निशा तुम सो जाओ,
    मीठे ख्वाबों में खो जाओ।
    खो जाओ किसी के सपने में,
    क्या रखा है दिन-रात तड़पने में।
    मुझे सुलाने की कोशिश में,
    जागे रात भर तारे।
    चाँद भी आकर सुला न पाया,
    वे सब के सब हारे।
    समझाने आई फिर,
    मुझको एक छोटी सी बदली
    मनचाहा मिल पाना,
    कोई खेल नहीं है पगली।
    पड़ी रही मैं अलसाई,
    फ़िर भोर हुई एक सूर्य-किरण आई।
    छू कर बोली मस्तक मेरा,
    उठ जाग जगा ले भाग,
    हुआ है नया सवेरा।।
    ____✍️गीता

  • मातृभाषा

    दर्द बनके आँखो के किनारों से बहती है!
    बनकर दुआ के फूल होंठो से झरती है!!

    देती है तू सुकून मुझे माँ के आँचल सा!
    बनके क़भी फुहार सी दिल पे बरसती है!!

    खुशियाँ ज़ाहिर करने के तरीक़े हज़ार है!
    मेरे दर्द की गहराई मगर तू समझती है!!

    जाऊँ कहीं भी मैं इस दुनिया जहान में!
    बन कर मेरी परछाईं मेरे साथ चलती हैं!!

    होगी ग़ुलाम दुनिया ये पराई ज़बान की !
    मेरी मातृभाषा तू मेरे दिल में धड़कती है!!

    ©अनु उर्मिल ‘अनुवाद’

  • धरती-पुत्र

    मूसलाधार बारिश से जब,
    बर्बाद हुई फ़सल किसान की
    बदहाली मत पूछो उसकी,
    बहुत बुरी हालत है भगवन्,
    धरती-पुत्र महान की।
    भ्रष्टाचार खूब फैल रहा,
    काले धन की भी चिंता है।
    मगर किसी को क्यों नहीं होती,
    चिंता खेतों और खलिहान की।
    अपनी फ़सलों की फ़िक्र लेकर,
    हल ढूंढने निकला है हलधर
    लेकिन सबको फ़िक्र लगी है,
    अपने ही अभिमान की।
    मूसलाधार बारिश से जब,
    बर्बाद हुई फ़सल किसान की
    बदहाली मत पूछो उसकी,
    बहुत बुरी हालत है भगवन्,
    धरती-पुत्र महान की।
    भरे पेट जो सभी जनों का,
    माटी से फ़सल उगाता है।
    क्यों नहीं करते हो तुम चिंता,
    उसके भी सम्मान की।
    संपूर्ण नहीं है कोई देश,
    बिन गांव और किसान के
    अफ़सोस, अन्नदाता ही फांसी खाता,
    कुछ चिंता कुछ फ़िक्र करो,
    धरती-पुत्र की जान की।
    मूसलाधार बारिश से जब,
    बर्बाद हुई फ़सल किसान की
    बदहाली मत पूछो उसकी,
    बहुत बुरी हालत है भगवन्,
    धरती-पुत्र महान की।।
    ____✍️गीता

  • फुलझडियां

    मनचले ने रुपसी पर, तंज कुछ ऐसा गढ़ा,
    काश जुल्फ़ों की छांव में, पड़ा रहूं मैं सदा।
    रुपसी ने विग उतार, उसे ही पकड़ा दिया,
    ले रखले जुल्फ़ों को तू, पड़ा रह सदा सदा।।

    फेसबुक की दोस्त को, बिन देखे ही दिल दे दिया,
    जो भी मांगा प्रेयसी ने, आॅनलाईन ही भेज दिया।
    एकदिन पत्नी के पास वही गिफ्ट देख चौंक गया,
    उसकी पत्नी ही फ्रेंड थी, बेचारा मूर्छित हो गया।।

    पत्नी से प्रताड़ित पति ने ईश्वर को ताना दिया,
    क्या पाप किया मैंने जो इससे मुझे बांध दिया।
    ईश्वर ने तपाक से भ्रमित पति को समझा दिया,
    धैर्य रख अज्ञानी पुरुष, कई जन्मों का साथ है।।

    कत्ल आंखों से करती हसीना, पर वो क़ातिल नहीं,
    दिल हसीनाओं के चुराते हैं, पर चोर वो शातिर नहीं।
    हर महिला में औरत है, कुछ पुरुषों में पुरुषार्थ नहीं,
    मुकाम तक पहुंचाती सड़क, खुद कहीं जाती नहीं।।

    राकेश सक्सेना, बून्दी (राजस्थान)

  • मेहनत के रंग

    वो बूढ़ी थी, गरीब थी
    भीख नहीं मांगी थी उसने,
    पैन बेच रही थी राहों में
    मेहनत का खाने की ठानी,
    मेहनत का ही खाती खाना
    मेहनत का ही पीती पानी।
    कहती थी यह पैन नहीं है,
    यह तो है किस्मत तुम्हारी
    खूब पढ़ना लिखना बच्चों
    बदलेगी तकदीर तुम्हारी।
    बदलेगा फिर भारत सारा,
    बदलेगी तस्वीर हमारी।।
    ____✍️गीता

  • काँव काँव मत करना कौवे

    काँव काँव मत करना कौवे
    आँगन के पेड़ों में बैठ
    तेरा झूठ समझता हूं मैं
    सच में है भीतर तक पैठ।
    खाली-मूली मुझे ठगाकर
    इंतज़ार करवाता है,
    आता कोई नहीं कभी तू
    बस आंखें भरवाता है।
    जैसे जैसे दुनिया बदली
    झूठ लगा बढ़ने-फलने
    तू भी उसको अपना कर के
    झूठ लगा मुझसे कहने।
    रोज सवेरे आस जगाने
    काँव-काँव करता है तू
    मुझ जैसों को खूब ठगाने
    गाँव-गाँव फिरता है तू।
    अब आगे से खाली ऐसी
    आस जगाना मत मुझ में
    तेरी खाली हंसी ठिठोली
    चुभती है मेरे मन में।

  • मनुष्य हो तुम

    मनुष्य हो तुम
    मनुष्यता सदैव पास रखो
    पाशविक वृत्तियों को
    पास आने न दो।
    दया का भाव रखो
    प्रेम की चाह रखो
    ठेस दूँ दूसरे को
    भाव आने न दो।
    दया पहचान है कि
    आप में मनुष्यता है
    अन्यथा फर्क क्या है
    फर्क का भान रखो।
    पेट भर जाये खुद का
    खूब भरता ही रहे
    भले औरों को क्षुधा
    चैन लेने ही न दे,
    भावना आदमियत की
    नहीं यह ध्यान रखो,
    दया धरम ही सच है
    मन में इसका ज्ञान रखो।

  • बहकावों में छले गए..

    कुछ दावों में, वादों में, कुछ बहकावों में छले गए,
    भोले-भाले कुछ किसान झूठे भावों में चले गए..

    खेतों में पगडण्डी की जो राह बनाया करते थे,
    आज भटक कर वो खुद ही ऐसे राहों में चले गए..

    वो ऐसे छोड़ के आ बैठे अपने खेतों की मिट्टी को,
    सागर को छोड़ सफीने भी बंदरगाहों में चले गए..

    थककर किसान ने जीवनभर जिस रोटी को था उपजाया,
    वो रोटी छोड़के कैसे अब झूठे शाहों में चले गए..

    अब तो किसान भी नज़रो में दोतरफा होकर रहते हैं
    कितने दुआओं में शामिल थे कितने आहों में चले गए..

    भोले-भाले कुछ किसान झूठे भावों में चले गए…

    – प्रयाग धर्मानी

    मायने :
    सफीने – नाव
    झूठे शाहों – झूठे बादशाह

  • *नेत्रदान*

    अंधा ना कहो आँखों वालों,
    मुझे नेत्रहीन ही रहने दो।
    आँख नहीं ग़म का सागर है,
    कुछ खारा पानी बहने दो।
    तुम क्या समझो आँखों का न होना,
    एक छड़ी सहारे चलता हूं।
    अपने ही ग़मों की अग्नि में,
    मैं अपने आप ही जलता हूं।
    कभी सड़क पार करवा दे कोई,
    मैं उसे दुआएं देता हूं।
    देख नहीं पाता हूं बेशक,
    महसूस सदा ही करता हूं।
    यह दुनिया कितनी सुंदर होगी,
    चाँद, सितारे सूरज इनके बारे में सुनता हूं।
    कभी देख पाऊं इनको मैं,
    ऐसे ख्वाब भी बुनता हूं।
    सुना है करने से नेत्र दान,
    दुनियां देख सके एक नेत्रहीन।
    क्या तुम भी करोगे नेत्रदान
    मैं भी देख सकूं इस संसार को,
    दूंगा ढेरों दुआएं तुम्हें
    और तुम्हारे परिवार को।।
    ____✍️गीता

  • कोई नहीं महान बना है

    फूलों के बिस्तर पर जन्मा पला बढ़ा उल्लासों में ।
    जिसको प्रचुर मिली सुविधाएं डूबा भोग विलासों में ।
    है भूमिका भाग्य की लेकिन अथक परिश्रम किए बिना,
    कोई नहीं महान बना है अब तक के इतिहासों में ।

    बड़े बड़ों के साथ खड़े होने में क्या महानता है ?
    हृदय तुच्छ तो हाथ बड़े होने में क्या महानता है ?
    है आकलन तुम्हारा इससे , किस पथ पड़ते पांव युगल ;
    जिस सीमा तक संकट सहते, मानो उसे वास्तविक बल ;

    गुणहीनों के गुणगानों में संगीत गुने तो क्या पाया?
    पदचिन्हों पर चलने वाले पथिक बने तो क्या पाया?
    नाविक हो तुम धारा के संग कभी बहाओ अपनी नौका!
    और कभी विपरीत दिशा में खेने का भी ढूंढो मौका!

    कभी हवा विपरीत देखकर भय के मारे मत रह जाना।
    कभी प्रतीक्षा में मुहूर्त की खड़े किनारे मत रह जाना।
    चाहे चलो दिशा धारा की, चाहो तो विपरीत चलो ,
    चलना तो प्रत्येक दशा में , किंतु सहारे मत बह जाना।।

    संजय नारायण

  • “किसान आन्दोलन”

    जो बादल सदैव ही निर्मल
    वर्षा करते थे
    निज तपकर अग्नि में
    तुमको ठण्डक देते थे
    वह आज गरजकर
    तुम्हें जगाने आये हैं
    ओ राजनीति के काले चेहरों !
    ध्यान धरो,
    हम ‘हल की ताकत’
    तुम्हें दिखाने आये हैं…
    ———————————
    धरती का सीना चीरकर
    जो उत्पन्न किया
    वह सफेदपोशों ने
    अपनी तिजोरियों में बंद किया
    हम वह ‘मेहनत का दाना’
    उनसे छीनने आये हैं…
    ———————————

    यह कैसा बिल लेकर आए
    तुम संसद में ?
    फूटा गुस्सा आ बैठ गये
    हम धरने में
    हम बीवी, बच्चे, खेत-खलिहान
    छोंड़कर आये हैं…..
    ————————————
    कितनी रातें सड़कों पर
    टेंण्ट में बीत गईं
    दो सौ से ज्यादा
    किसान भाईयों की
    मृत्यु हुई
    हम ‘भारत माँ के लाल’
    बचाने आये हैं……
    ——————————–
    हम खालिस्तानी और विपक्षी
    कहे गये
    कोहरा, बादल, बिजली, वर्षा
    से भी नहीं डरे
    आँसू गैसे के गोले,
    पीठ पे डण्डे खाए हैं…..
    ———————————–
    कुछ अराजक तत्वों ने
    इस आन्दोलन को अपवित्र किया
    दूध बहाया तो कभी
    लाल किले पर कुकृत्य किया
    हम हलधर ! वह बदनामी का दाग
    मिटाने आये हैं…….
    ————————————-
    तुम ढीठ बड़े !
    कुछ सुनने को तैयार नहीं
    हम भी पीछे हट जाने को
    तैयार नहीं
    हम तुमको अपनी व्यथा
    सुनाने आये हैं…
    ——————————————-
    आज देखकर
    अपनी थाली में सूखी रोटी
    हिल पड़ा कलेजा
    पगड़ी की भी हिम्मत टूटी
    कोई क्या जाने ! हमने कर जोड़ के
    कितने नीर बहाये हैं…

    कुछ ढुलक पड़े गालों पर
    कुछ थाली में टूट गिरे
    कुछ गटक लिए जो
    गले उतरकर आये हैं…
    हम सूखी रोटी का मान
    बढ़ाने आये हैं
    अन्नदाता की पीर’ को
    परिभाषित करने आये हैं…
    **********************

    काव्यगत् सौंदर्य एवं प्रतियोगिता के मापदण्ड:-

    इस कविता को मैंने फोटो प्रतियोगिता में दिखाये गये चित्र को ध्यान में रखकर लिखा है|
    जिसमें एक बुजुर्ग पगड़ीधारी किसान
    अपनी थाली में सूखी रोटी देखकर सिर झुकाए हुए कुछ सोंचने की मुद्रा में खड़ा है |
    उसकी खामोंशी को मैंने शब्दों के माध्यम से
    रेखांकित तथा जीवंत बनाने की छोटी-सी कोशिश की है |
    ***********************************
    प्रतियोगिता के मापदण्डों को ध्यान में रखते हुए मैंने सर्वप्रथम चित्र तथा किसान आन्दोलन की समग्रता तथा समाहार शक्ती का प्रयोग किया है जैसा कि चित्र का भाव है वैसा ही भाव व्यक्त करने का प्रयास किया है…
    काव्य के सभी तत्वों को समाहित करने के कारण तथा रचना का भावुक विषय काव्य परंपरा में कितना योगदान दे पाया यह तो निर्णायक मण्डल पर निर्भर है…

    समाज में अच्छा संदेश पहुंचाने तथा किसान आन्दोलन को सार्थक दृष्टिकोण प्रदान करते हुए मैंने विषय को गम्भीरता से लिया है तथा
    सरकार और किसान के बीच सार्थक वार्ता हो और मतभेद खत्म हो ऐसी कामना की है…
    कविता के अन्त में मैंने चित्र को उसी रूप में प्रस्तुत किया है जैसा वह मेरे कविमन को नजर आया…
    आपको मेरा प्रयास कैसा लगा जरूर बताइयेगा..
    कविता को अन्त तक पढ़ने के लिए धन्यवाद…

  • मैं किसान हूं|

    मैं किसान हूं , हां मैं किसान हूं |
    धरती मां की मैं ही आन बान शान हूं|
    मैं किसान हूं||
    धरती मां को चीर के तुम्हें खिलाया है,
    अपना पसीना पौछकर तुम्हें जिलाया है,
    अपनी नींदें भूलकर तुम्हें सुलाया है,
    तुमने मुझको आज क्यों इतना रुलाया है,
    यह मत भूलो मैं करता ,अन्न दान हूं
    मैं किसान हूं , हां मैं किसान हूं|
    मैं किसान हूं||
    मैं सड़कों पर आज हुआ क्यों,
    इतना मैं मजबूर हुआ क्यों,
    मुझको तुमने छोड़ दिया क्यों,
    लाके ऐसा मोड़ दिया क्यों,
    देश का दुश्मन बना दिया क्यों,
    खुद से हमको अलग किया क्यों,
    तुम राष्ट्रगीत हो तो मैं राष्ट्रगान हूं
    मैं किसान हूं हां मैं किसान हूं|
    मैं किसान हूं||

  • अन्नदाता

    मैं किसान हूं
    समझता हूं मैं अन्न की कीमत
    क्योंकि वो मैं ही हूं
    जो सींचता हूं फसल को
    अपने खून और पसीने से
    मरता हूं हर रोज
    अपने खेत की फ़सल को जिंदा रखने के लिये
    ताकि रहे न कोई भूखा
    कोई इस दुनिया में
    फिर भी तरसता हूं खुद ही
    रोटी के इक निवाले को
    ले जाता है कोई सेठ
    मेरी पूरी फ़सल को
    ब्याज के बहाने, कोढ़ियों के दाम
    लड़ता हूं अकेला
    आकर शहर की सड़्कों पर
    फिर भी नहीं हो
    तुम साथ मेरे
    अपने अन्नदाता के!

  • हलधर धरने पर

    हलधर धरने पर रहा, आस लगाये बैठ।
    मानेगी सरकार कब, सोच रहा है बैठ।
    सोच रहा है बैठ, मांग पूरी होगी कब।
    अकड़ ठंड से गया, ताप सब छीन गया अब।
    कहे लेखनी आज, व्यथित है कृषक भाई,
    कुछ तो मानो मांग, दिखाओ मत निठुराई।
    **************************
    ठीक नहीं थी बात वह, लालकिले में पैठ।
    आंदोलन धीमा पड़ा, सोच रहा है बैठ।
    सोच रहा है बैठ, सभी नाराज हो गये।
    जो अपने थे वही, पराये आज हो गये।
    कहे लेखनी सोच, समझकर कदम उठाओ।
    सत्य अहिंसा पर चल अपनी मांग उठाओ।
    **************************
    जनता तो समझी नहीं, आंदोलन का मर्म,
    लेकिन अपनी बात को, रखना सबका धर्म।
    रखना सबका धर्म, बात जो भी जायज हो।
    लोकराज का धर्म , कभी नहीं गायब हो।
    कहे लेखनी रखो, लचीलापन दोनों ही।
    थोड़ा थोड़ा झुको, आज झुक लो दोनों ही।
    **************************
    रोटी देता है किसान, सेकूँ रोटी आज,
    आंदोलन को चोंच दूँ, सोच रहा है बाज।
    सोच रहा है बाज, मुझे फायदा हो जाए।
    इधर उधर की बात, देख कृषक मुरझाये।
    कहे लेखनी आज, जरूरत आन पड़ी है,
    सुलह बने अब यही, जरूरत आन पड़ी है।
    **************************
    मांग उठाना देश में, नहीं कोई अपराध,
    लोकतंत्र की रीत है, रखना अपनी बात।
    रखना अपनी बात, और सुनना राजा को,
    यही बात जो मधुर बनाती है सत्ता को।
    कहे लेखनी इधर, मधुरिमा उधर मधुरिमा,
    मांग रही है यही, समन्वय अब भारत माँ।
    —— डॉ0 सतीश चंद्र पाण्डेय

  • बस एक दिन याद करो

    26 जनवरी, 15 अगस्त,
    देश भक्ति जगाओ, झण्डे फहराओ,
    बलिदान पर “उनके”, तुम इतराओ,
    फिर भूल जाओ भूल जाओ।।

    नारी दिवस, बालिका दिवस,
    कविता सुनाओ, मंच सजाओ,
    मौका मिले तो दानव बन जाओ,
    फिर भूल जाओ भूल जाओ।।

    जन्माष्टमी हनुमान जयंती,
    दुर्गा अष्टमी, गणेश चतुर्थी,
    झांकी सजाओ त्योहार मनाओ,
    गो माता का अपमान करो,
    दर से भिखारी भूखा भगाओ।।

    रामायण गीता जी पाठ कराओ,
    दशहरा आया, रावण जलाओ,
    अपने अंदर रावण पनपाओ,
    जीवन भर भ्रष्टाचार करो,
    पाप करो गंगा में बहाओ।।

    मृत्यु पश्चात याद करो,
    पंडित जिमाओ श्राद्ध करो,
    जीते जी अपमान करो,
    वृद्धाश्रम आबाद करो।।

    पूरे साल में बस एक दिन,
    दिवस मनाओ दिवस मनाओ,
    उत्सव मनाओ फर्ज निभाओ,
    फिर सब कुछ भूल जाओ,
    भूल जाओ भूल जाओ।।

    राकेश सक्सेना, बून्दी, राजस्थान
    9928305806

  • प्रदूषित पवन

    आज फ़िर चाँद परेशान है,
    प्रदूषण में धुंधली हुई चाँदनी
    तारे भी दिखते नहीं ठीक से,
    आज आसमान क्यों वीरान है।
    आज फिर चाँद परेशान है।
    प्रदूषण का असर,
    चाँदनी पर हुआ
    चाँदनी हो रही है धुआं-धुआं।
    घुट रही चाँदनी मन ही मन,
    यह कैसी है अशुद्ध सी पवन
    दम घोट रही सरेआम है,
    आज चाँद फ़िर परेशान है।
    प्रदूषित पवन में विष मिले हैं,
    यह सुनकर सभी हैरान हैं।
    चाँदनी ले रही है सिसकियां,
    आज चाँद फ़िर परेशान है।।
    _____✍️गीता

  • वर स्वरुप में बमबम : अनुदित रचना

    वर स्वरुप में बमबम
    मालतीमालया युक्तं सद्रत्नमुकुटोज्ज्वलम्।
    सत्कण्ठाभरणं चारुवलयाङ्गदभूषितम्।।
    वह्निशौचेनातुलेन त्वतिसूक्ष्मेण चारुणा।
    अमूल्यवस्त्रयुग्मेन विचित्रेणातिराजितम्।।
    चन्दनागरुकस्तूरीचारुकुङ्कुमभूषितम्।
    रत्नदर्पणहस्तं च कज्जलोज्ज्वललोचनम्।।
    . भाषा भाव
    मालती बड़ माल शोभित,रत्न मुकुट बड़ चमचम। कंगन बाजूवन्द मनोहर,हार गला में दमदम।।
    अगर लेप तन चंदन केशर,रेख त्रिपुण्ड ललाट में साजल। वसन अनूप रुप मनमोहक,नलिन नयन नव काजल।।
    कस्तूरी कुमकुम कें टीका,हाथ आरसी चमचम।।
    देख विनयचंद महादेव को,वर स्वरुप में बमबम।।

  • दुलहिन गिरिजा माता : अनुदित रचना

    दुलहिन गिरिजा माता

    सुचारुकबरीभारां चारुपत्रकशोभिताम्।
    कस्तूरीबिन्दुभिस्सार्धं सिन्दूरबिन्दुशोभिताम्।।
    रत्नेन्द्रसारहारेण वक्षसा सुविराजिताम्।
    रत्नकेयूरवलयां रत्नकङ्कणमण्डिताम्।।
    सद्रत्नकुण्डलाभ्यां च चारुगण्डस्थलोज्ज्वलाम्।
    मणिरत्नप्रभामुष्टिदन्तराविराजिताम्।।
    मधुबिम्बाधरोष्ठां च रत्नयावकसंयुताम्।
    रत्नदर्पणहस्तां च क्रीडापद्मविभूषिताम्।।

    भाषा भाव
    केशपाश कुसुमित सालि पत्र रचित बड़ सुन्दर।
    कस्तूरी सिन्दूर के टीका,भाल बीच नव दिनकर।।
    कंठहार उरोज विराजित,रत्न महामणि मंडित।
    कंगन बाजूबंद सुशोभित,कुंडल कलश अखंडित।।
    रत्न जड़ित कुंडल की कांति,गाल युगल पर छाई।
    सुघर बतीसी दमदम दमके,अधर सुफल बिम्बा की नांई।।
    रचित महावर युगल हस्त में,क्रीड़ा कमल मनोहर दर्पण।
    दुलहिन गिरिजा माता पर,सुन्दरता सब अर्पण।।

  • किसान की व्यथा

    अन्न उपजाऊं फिर खाना खाऊं,
    जन्म ले लिया किसान के
    देश कहे अन्नदाता मुझको,
    बैठा हूं सड़कों पर शान से।
    दिल्ली के बॉर्डर पर पड़ा हूं,
    अपने हक की खातिर मैं
    खेत छोड़ बॉर्डर पर बैठा,
    मैं भी हूं भारत मां का बेटा
    धरती पुत्र कह लो,
    या फिर कहो किसान रे
    अन्न उपजाऊं फिर खाना खाऊं,
    जन्म ले लिया किसान के
    पूरी सर्दी गुजर गई है,
    दिल्ली के ठंडे बॉर्डर पर
    थोड़ा सा ध्यान धरो तुम
    मेरी भी चंद आहों पर
    दुखी हुआ था तब ही आया,
    किसको राहों पर रहना भाया
    राजनीति ना करो म्हारे संग,
    मैं तो एक किसान रे।
    अन्न उपजाऊं फिर खाना खाऊं,
    जन्म ले लिया किसान के।।
    _____✍️गीता

New Report

Close