ऐ बेदर्द सर्दी ! तुम्हारा भी कोई हिसाब नहीं।
कहीं मंद शीतल हवाएँ ।
कहीं शबनम की ऱवाएँ ।।
दिन को रात किया कोहरे का कोई जवाब नहीं।
ऐ बेदर्द सर्दी ! तुम्हारा भी कोई हिसाब नहीं।।
कोई चिथड़े में लिपटा ।
कोई घर में है सिमटा ।।
कोई कोट पैंट में भी आके बनता नवाब नहीं।
ऐ बेदर्द सर्दी,,,, ,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,।।
रंग बिरंगे कपड़ों में बच्चे ।
आँगन में खेले लगते अच्छे ।।
दादा -दादी के पहरे का कोई हिसाब नहीं।
ऐ बेदर्द सर्दी ! तुम्हारा,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,।।
रंग -बिरंगी फूलों की क्यारी।
पीले खेत सरसों की न्यारी।।
मटर मूंगफली गाजर के खाने का कोई जवाब नहीं।
ऐ बेदर्द सर्दी…………………………………………………।।
खोज रही है धूप सुहानी ।
जड़-चेतन व सकल प्राणी।।
एक सहारा जिसका सबको ऐसा कोई लिहाफ नहीं।
मन की गर्मी रख “विनयचंद ” ऐसा कोई ताव नहीं।।
ऐ बेदर्द सर्दी!…………………………………………………।।
ऐ बेदर्द सर्दी! तुम्हारा भी कोई हिसाब नहीं
Comments
24 responses to “ऐ बेदर्द सर्दी! तुम्हारा भी कोई हिसाब नहीं”
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सुन्दर
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धन्यवाद
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अति सुन्दर
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धन्यवाद
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Vry gud
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Thanks
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Kamal hai
Kavita bemisaal hai-
धन्यवाद
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बहुत ही सुंदर कविता है
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धन्यवाद
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Wow
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Thanks
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Good
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Thanks
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Welcome
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Nice
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Thank you
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Previous collection mere yaar
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Thanking lot of u
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Accha h
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धन्यवाद
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सुन्दर रचना
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धन्यवाद
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Bahut bahut badhiya kabita
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