वृक्ष की व्यथा

धरती जल रही अम्बर जल रहा
जल रहा सकल जहान ।
हाल कहे क्या पशु-पक्षियों के
हैं व्याकुल सब इन्सान ।।
सघन छाँव करके मैं तरूवर
सबको पास बुलाया ।
खुद जलकर सूरज किरणों से
सब की जान बचाया ।।
खाया पीया बैठ यहाँ पर
सब भागे जल के भीतर ।
छम-छम छप-छप छपाक -छप-छप
केहरि मृग अहिगण और तीतर ।।
मस्त मगन हो नहा रहे सब
पशु पक्षी संग-संग इन्सान ।
‘विनयचंद’ कोई मुझे भी ले चल
बीच दरिया में करूँ स्नान ।।


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10 Comments

  1. Shuresh Singh - July 9, 2020, 11:28 pm

    सुंदर रचना

  2. Antima Goyal - July 9, 2020, 11:39 pm

    nice

  3. Anita Sharma - July 10, 2020, 9:02 am

    Sundar Abhivyakti

  4. Dhruv kumar - July 10, 2020, 4:54 pm

    Nyc

  5. Abhishek kumar - July 10, 2020, 8:32 pm

    सुंदर परंतु पंक्तियाँ कुछ उलट पलट हैं। अर्थात् तुकान्त के चक्कर में अपनी पहचान खो रही हैं

  6. महेश गुप्ता जौनपुरी - July 10, 2020, 11:58 pm

    बेहतरीन

  7. Satish Pandey - July 11, 2020, 9:01 am

    बहुत खूब,

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