कर प्रतिकार

दोष तुम्हारा क्या है अबले
तुम काहे को घबड़ाती हो।
मिले दण्ड अब उन दोषी को
जो तुझको हर पल तड़पाती हो।।
मर जाओगी खुद जाओगी
बस अपनी हस्ती मिटाकर।
तेरे जगह कोई और आएगी
बन काठ की पुतली चाकर।।
‘विनयचंद ‘क्या ऐसे कभी
खतम हो जाएगा अत्याचार।
हे अबले तू सबला बनकर
हार न मानो कर प्रतिकार ।।

Comments

10 responses to “कर प्रतिकार”

  1. Geeta kumari

    वाह, बहुत सुंदर और प्रेरक प्रस्तुति है भाई जी।
    अत्याचार सहना अत्याचार को बढ़ावा देना है ।

  2. लाजवाब
    👌✍✍

  3. मोहन सिंह मानुष Avatar
    मोहन सिंह मानुष

    बहुत सुंदर पंक्तियां
    बहुत सुंदर विचार

  4. बहुत ही प्रेरणादायक पंक्तियाँ

  5. बहुत बढ़िया, वाह

  6. Praduman Amit

    बहुत ही उतम विचार है।

  7. बहुत ही सुंदर विचार

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