मन्दिर के भीतर

मुझे मिले नहीं भगवान
हाय, मन्दिर के भीतर।
मैं बना रहा नादान
हाय, मन्दिर के भीतर।।
मातु-पिता सच्चे ईश्वर हैं
क्यों न तू पहचान करे।
जन्म दिया और पाला-पोषा
पल-पल हीं कल्याण करे।।
सेवा बिना नहीं उनके
सब दुखिया है संतान
हाय, जंजाल के भीतर।।
मुझे मिले नहीं भगवान
हाय मन्दिर के भीतर।।
गणपति को देखा जाके तो
दिखा मातु -पिता की भक्ति।
देखा जो श्रीराम प्रभु को
दिखी चरण अनुरक्ति
मातु-पिता को दे सम्मान
बने जगत पूज्य भगवान
हाय, मन्दिर के भीतर।।
मुझे मिले नहीं भगवान
हाय मन्दिर के भीतर।।
‘विनयचंद ‘नित कर सेवा तू
मातु-पिता की तन-मन से।
घर -बाहर नित दर्शन होंगे
न दूर रहो इन चरणन से ।।
सच्ची वाणी है ये जिसको
नित कहे सब वेद -पुराण
हाय, मन्दिर के भीतर।
मुझे मिले नहीं भगवान
हाय मन्दिर के भीतर।।

Comments

8 responses to “मन्दिर के भीतर”

  1. Geeta kumari

    सच ही तो है, भगवान तो स्वयं अपने घर में ही विराजमान होते है, माता पिता के रूप में। मंदिर में तो केवल उनकी छवि ही है। फ़िर भी लोग मंदिरों में जा कर भगवान को ढूंढते रहते हैं। पौराणिक कथा के अनुसार भी गणेश जी ने भी शिव – पार्वती की परिक्रमा लगा के कहा था कि हो गई पृथ्वी की परिक्रमा पूर्ण ।

  2. Geeta kumari

    बहुत ही सुन्दर रचना ।लेखनी को प्रणाम है भाई जी🙏

  3. Praduman Amit

    माता पिता के सेवा में ही स्वर्ग है। भगवान को किससे देखा है।
    हम जो देख रहे है वह तो एक फिल्म चित्र है। वास्तविक भगवान तो हमारे माता पिता है। जिसने हमें जन्म दिया है। इस संसार में सब से बड़ा तीर्थ माता पिता के सेवा है। इ स तीर्थ से बड़ा और कोई तीर्थ नहीं है।

  4. बहुत सुंदर अभिव्यक्ति

  5. काश! सबो की सोच ऐसी हो
    बुढापा बोझ क्यूँ कर हो

  6. प्रतिमा

    मुझे मिले नहीं भगवान
    हाय, मन्दिर के भीतर।
    मैं बना रहा नादान
    हाय, मन्दिर के भीतर।।
    मातु-पिता सच्चे ईश्वर हैं
    क्यों न तू पहचान करे।
    बहुत सुंदर पंक्तियां
    बहुत सुंदर भाव, उम्दा लेखनी

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